झारखंड राज्य के जमशेदपुर अंतर्गत आने वाले चाकुलिया प्रखंड में रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण का एक अनूठा उदाहरण सामने आया है। भातकुंडा पंचायत के सुनसुनिया जंगल में एकत्र होकर स्थानीय ग्रामीणों ने विशाल पेड़ों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा और जीवनभर उनकी रक्षा करने की सौगंध उठाई। इस सामूहिक पहल के दौरान ग्रामीणों ने स्पष्ट रूप से व्यक्त किया कि वृक्ष केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि वे परिवार के अभिन्न सदस्यों और सहोदर भाइयों के समान इंसानी जीवन को सुरक्षा प्रदान करते हैं।
पेड़ों को भाई मानने का अनोखा संदेश
स्थानीय समुदाय के अनुसार, जिस प्रकार एक भाई विपरीत परिस्थितियों में अपनी बहन की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ा रहता है, ठीक उसी तरह वृक्ष भी प्रत्येक मौसम में मानवता की रक्षा करते हैं। आंधी, भीषण तूफान और मूसलाधार बारिश के दौरान पेड़ मजबूती से डटे रहकर बस्तियों को सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं। इसके साथ ही भीषण गर्मी के दिनों में ठंडी छाया देने के अलावा वातावरण को स्वच्छ बनाए रखने में पेड़ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी निस्वार्थ सेवा के प्रति अपना गहरा आभार व्यक्त करने के लिए रक्षाबंधन के पावन अवसर पर पेड़ों को राखी बांधने की परंपरा निभाई गई।
पद्मश्री जमुना टुडू की मौजूदगी और पर्यावरण संकल्प
इस विशेष आयोजन में पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाली पद्मश्री जमुना टुडू की उपस्थिति ने ग्रामीणों के उत्साह को कई गुना बढ़ा दिया। लंबे समय से जंगलों को कटाई से बचाने के लिए जन-जागरण अभियान चला रहीं जमुना टुडू ने खुद पेड़ों को रक्षासूत्र बांधा। उन्होंने जनसमूह को संबोधित करते हुए आह्वान किया कि हर मांगलिक और सांस्कृतिक अवसर को प्रकृति के साथ जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि केवल नए पौधे लगाना ही काफी नहीं है, बल्कि रोपे गए पौधों और पुराने जंगलों का निरंतर संरक्षण करना उससे भी अधिक आवश्यक है।
पर्यावरण संतुलन और वन्यजीवों की सुरक्षा का मुद्दा
समारोह में उपस्थित ग्रामीणों ने जंगलों की अंधाधुंध कटाई से पैदा होने वाले गंभीर संकट पर गहरी चिंता जताई। लोगों का मानना है कि किसी पेड़ को काटना केवल एक पौधे का विनाश नहीं है, बल्कि इससे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन गड़बड़ा जाता है। जंगलों का क्षेत्रफल घटने से वर्षा चक्र, मृदा अपरदन, वायु शुद्धता और क्षेत्रीय तापमान पर अत्यंत विपरीत प्रभाव पड़ता है, जिसका सीधा असर आम इंसान के स्वास्थ्य और आजीविका पर दिखाई देता है।
इसके अतिरिक्त, ग्रामीणों ने रेखांकित किया कि जंगल केवल मानव जाति के लिए ही नहीं, बल्कि विभिन्न जंगली जानवरों का प्राकृतिक आवास भी हैं। जब जंगलों को नुकसान पहुंचाया जाता है, तो वन्यजीवों के रहने का ठिकाना और भोजन का मुख्य स्रोत समाप्त हो जाता है। ऐसी संकटपूर्ण स्थिति में वन्यप्राणी भोजन और पानी की तलाश में आबादी वाले गांवों और कस्बों का रुख करते हैं, जिससे मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव की घटनाएं बढ़ती हैं। इन्हीं खतरों को देखते हुए ग्रामीणों ने जंगल की सुरक्षा को अपनी सर्वोच्च जिम्मेदारी माना है।



















