झारखंड के पलामू जिले में यादों को पत्थर पर उकेरने की एक अनूठी कला लोगों का ध्यान खींच रही है। मेदिनीनगर में बिसफुटा के पास स्थित श्रीराम मूर्ति कला केंद्र में तस्वीरों के आधार पर हुबहू संगमरमर की मूर्तियां तैयार की जा रही हैं। लोग अपने दिवंगत दादा-दादी, नाना-नानी या परिवार के अन्य सदस्यों की पुरानी फोटो देकर उनकी आदमकद या छोटी प्रतिमाएं बनवा रहे हैं। मूर्तिकार तस्वीर में दिख रहे चेहरे की बनावट, हाव-भाव, आंख-नाक और पहनावे का बारीक अध्ययन कर पत्थर पर वही रूप ढाल देते हैं। इस तरह कागज की तस्वीरों में कैद स्मृतियों को पत्थर की प्रतिमाओं के माध्यम से पीढ़ियों तक सहेजने का काम किया जा रहा है।
तस्वीरों से आकार लेती यादें और संजीव चौधरी का 20 साल का सफर
इस कला केंद्र का संचालन संजीव कुमार चौधरी कर रहे हैं, जो पिछले करीब 20 वर्षों से पलामू में मूर्ति निर्माण के कार्य से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि दो दशक पहले मूर्तियों की लागत बहुत कम हुआ करती थी और साधारण मूर्तियां 100 रुपये से लेकर 500 रुपये के बीच में भी तैयार हो जाती थीं। समय बीतने के साथ-साथ संगमरमर, पत्थर और नक्काशी में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्रियों के दाम काफी बढ़ चुके हैं। पहले यह काम अघोर आश्रम के समीप किया जाता था, लेकिन अब इसका संचालन बिसफुटा के पास नए परिसर में हो रहा है। इस केंद्र में केवल तस्वीरों से ही मूर्तियां नहीं बनतीं, बल्कि यहां भगवान गणेश, भगवान शंकर, देवी दुर्गा और मां काली सहित विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं भी अलग-अलग कलात्मक डिजाइनों में तैयार की जाती हैं।
जयपुर के मकराना संगमरमर को तराशने की जटिल प्रक्रिया
प्रतिमाओं के निर्माण के लिए उपयोग किया जाने वाला पत्थर विशेष रूप से राजस्थान के जयपुर स्थित मकराना से मंगाया जाता है। मकराना का संगमरमर अपनी मजबूती और चमक के लिए जाना जाता है। संजीव कुमार चौधरी बताते हैं कि मूर्ति बनाने की शुरुआत जरूरत के मुताबिक सही आकार के पत्थर के चुनाव से होती है। इसके बाद पारंपरिक औजारों जैसे छैनी और हथौड़ी की मदद से पत्थर के अतिरिक्त हिस्सों को काटकर अलग किया जाता है और एक प्रारंभिक ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद कलाकार तस्वीर को सामने रखकर बेहद सावधानी से काम शुरू करते हैं। फोटो में देखकर आंख, नाक, होंठ, बाल और चेहरे के विशिष्ट भावों को पत्थर पर उकेरा जाता है। बारीक औजारों से नक्काशी पूरी होने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण सतह की घिसाई और फिनिशिंग का होता है। पत्थर को पूरी तरह चिकना करने के बाद मूर्ति की सफाई और रंग-रोगन कर उसे अंतिम रूप दिया जाता है।
एक प्रतिमा बनने का समय और लागत का पूरा ब्योरा
एक सुंदर और सटीक प्रतिमा तैयार करने में कलाकार को करीब 10 दिन का समय लग जाता है। पत्थर की गुणवत्ता और नक्काशी की मेहनत के हिसाब से इनकी कीमतें तय की जाती हैं। आम धार्मिक मूर्तियों की शुरुआती कीमत लगभग 5 हजार रुपये से प्रारंभ होती है। यदि कोई ग्राहक तस्वीर के आधार पर 1.5 फीट की कस्टमाइज्ड मूर्ति बनवाता है, तो उसका खर्च लगभग 17 हजार रुपये आता है। वहीं भगवान की 2 से 2.5 फीट ऊंची मूर्तियां 15 हजार रुपये से लेकर 20 हजार रुपये तक के बजट में बनकर तैयार हो जाती हैं। मकराना के पत्थर की अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के कारण मूर्तियों के दाम में भी बीते सालों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
पलामू से निकलकर कोलकाता, रायपुर और कानपुर तक बढ़ा दायरा
श्रीराम मूर्ति कला केंद्र की बनी मूर्तियों की मांग अब केवल पलामू या आसपास के इलाकों तक सीमित नहीं रह गई है। संजीव कुमार चौधरी द्वारा तराशी गई मूर्तियों के ऑर्डर अब पश्चिम बंगाल के कोलकाता, छत्तीसगढ़ के रायपुर और उत्तर प्रदेश के कानपुर जैसे बड़े शहरों से भी आ रहे हैं। अलग-अलग आकार और कलात्मक डिजाइनों में बनने वाली इन प्रतिमाओं को लोग दूर-दूर से मंगवा रहे हैं। यह कला अब सिर्फ मंदिरों और पूजा-पंडालों के लिए देवी-देवताओं की मूर्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनों की याद में कस्टमाइज्ड स्मारक प्रतिमाएं बनवाने का एक बड़ा माध्यम बन चुकी है।



















