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जमशेदपुर में इस बार बड़ी नहीं, छोटी गणेश प्रतिमाओं का जलवा, मूर्तिकारों के पास ऑर्डर की भरमारझारखंड
5 सित॰ 2026, 2:24 pm (1 दिन पहले)· 3

जमशेदपुर में इस बार बड़ी नहीं, छोटी गणेश प्रतिमाओं का जलवा, मूर्तिकारों के पास ऑर्डर की भरमार

जमशेदपुर में गणेश चतुर्थी से पहले मूर्तिकार प्रतिमाओं को अंतिम रूप दे रहे हैं, इस बार घर पर पूजा करने वाले परिवारों में छोटी और आसानी से विसर्जित होने वाली प्रतिमाओं की मांग तेजी से बढ़ी है।

जमशेदपुर में गणेश चतुर्थी की रौनक शुरू हो चुकी है और शहर भर के मूर्तिकार भगवान गणेश की प्रतिमाओं को आखिरी रूप देने में जुटे हैं। शहर के अलग-अलग इलाकों में कारीगर दिन-रात मेहनत कर रहे हैं, ताकि तय समय पर सारी मूर्तियां तैयार हो जाएं। इस बार सबसे दिलचस्प बदलाव यह दिख रहा है कि बड़ी प्रतिमाओं के साथ-साथ छोटी गणेश प्रतिमाओं की मांग में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है, खासकर उन परिवारों में जो घर पर ही पूजा का आयोजन करते हैं।

क्यों बदल रही है लोगों की पसंद

मूर्तिकार अर्जुन बताते हैं कि लोगों की पसंद में साफ बदलाव आया है। पहले ज्यादातर लोग बड़े आकार की प्रतिमाएं पसंद करते थे, लेकिन अब घर में पूजा करने वाले परिवार छोटी और आकर्षक मूर्तियों की तरफ ज्यादा झुकाव दिखा रहे हैं। इसकी वजह भी सीधी है, छोटी प्रतिमाओं को घर के छोटे पूजा स्थल में रखना आसान होता है और विसर्जन के वक्त भी कोई दिक्कत नहीं आती। यही वजह है कि शहर के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे मूर्तिकारों के पास छोटी मूर्तियों के ऑर्डर लगातार आ रहे हैं और उनकी मांग थमने का नाम नहीं ले रही।

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कीमत कितनी, और तय कैसे होती है

अर्जुन के मुताबिक भगवान गणेश की मूर्तियों की शुरुआती कीमत करीब ₹3,000 से होती है। इसके बाद कीमत मूर्ति के आकार, डिजाइन की बारीकी और फिनिशिंग के हिसाब से बढ़ती चली जाती है। यानी मूर्ति जितनी बड़ी होगी और उसमें जितना महीन काम और सजावट होगी, उसका दाम भी उतना ही ज्यादा चुकाना पड़ेगा। ग्राहक अपने बजट और पूजा स्थल की जगह के हिसाब से मूर्तिकारों से बातचीत कर मूर्ति तय करवा रहे हैं।

गंगा मिट्टी से तैयार हो रहीं खास प्रतिमाएं

इस साल मूर्तिकारों का खास ध्यान गंगा मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमाओं पर है। यह मिट्टी बंगाल में गंगा नदी के किनारे से खासतौर पर मंगाई जाती है। मूर्तिकारों के मुताबिक इस मिट्टी से मूर्ति बनाने की अपनी एक अलग परंपरा और खासियत है, जो इसे बाकी मिट्टी से बनी मूर्तियों से अलग बनाती है। सबसे पहले मिट्टी को तैयार किया जाता है, फिर उससे प्रतिमा को आकार दिया जाता है। इसके बाद मूर्ति को कई चरणों में धीरे-धीरे सुखाया जाता है और फिनिशिंग का काम किया जाता है। आखिर में रंग भरने और सजावट का काम होता है, जिससे तैयार मूर्तियां देखने में बेहद आकर्षक लगती हैं।

छोटे आकार में बारीक काम की चुनौती

गंगा मिट्टी से मूर्ति तैयार करना आसान काम नहीं है, इसमें काफी मेहनत और वक्त दोनों लगते हैं। अर्जुन बताते हैं कि मिट्टी की गुणवत्ता, मूर्ति की मजबूती और उसकी फिनिशिंग, हर चीज़ पर बारीकी से नजर रखनी पड़ती है। छोटी प्रतिमाओं में यह काम और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है, क्योंकि कम जगह में भगवान गणेश की आंखें, मुकुट, आभूषण और बाकी हिस्सों को बारीकी और खूबसूरती से उकेरना पड़ता है। इसके बावजूद, छोटी प्रतिमाओं की बढ़ती मांग को देखते हुए मूर्तिकार पूरी लगन के साथ इन्हें तैयार करने में जुटे हुए हैं, ताकि गणेश चतुर्थी से पहले हर ऑर्डर वक्त पर पूरा हो सके।

सवाल-जवाब

जमशेदपुर में इस बार गणेश प्रतिमाओं की कीमत कितनी है?
मूर्तिकार अर्जुन के मुताबिक कीमत करीब ₹3,000 से शुरू होती है और आकार, डिजाइन व फिनिशिंग के हिसाब से बढ़ती है।
इस बार किस तरह की प्रतिमाओं की मांग ज्यादा है?
बड़ी प्रतिमाओं के साथ-साथ छोटी और आसानी से स्थापित होने वाली गणेश प्रतिमाओं की मांग उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, खासकर घर पर पूजा करने वाले परिवारों में।
गंगा मिट्टी कहां से लाई जाती है?
यह मिट्टी बंगाल में गंगा नदी के किनारे से मंगाई जाती है।
छोटी प्रतिमाएं बनाना क्यों चुनौतीपूर्ण होता है?
कम जगह में भगवान गणेश की आंखें, मुकुट और आभूषण जैसे बारीक हिस्से खूबसूरती से उकेरने पड़ते हैं, जो काफी मेहनत का काम है।
लोग छोटी प्रतिमाएं ज्यादा क्यों पसंद कर रहे हैं?
छोटी प्रतिमाओं को घर के छोटे पूजा स्थल में रखना आसान होता है और विसर्जन में भी सुविधा रहती है।
मूर्ति की कीमत किन बातों पर निर्भर करती है?
मूर्ति की कीमत उसके आकार, डिजाइन की बारीकी और फिनिशिंग के आधार पर तय होती है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 दिन पहले

पारंपरिक बड़े आयोजनों से हटकर घरों में होने वाले छोटे आयोजनों की यह प्राथमिकता पर्यावरण और कानून-व्यवस्था दोनों के दृष्टिकोण से एक सकारात्मक बदलाव है। जब लोग कॉम्पैक्ट और आसानी से विसर्जित होने वाली मूर्तियों का चयन करते हैं, तो विसर्जन के दौरान जुलूस प्रबंधन, ट्रैफिक नियंत्रण और कृत्रिम घाटों पर भीड़भाड़ से जुड़े प्रशासनिक दबाव में उल्लेखनीय कमी आती है। इस तरह की प्रवृत्तियां यह दर्शाती हैं कि नागरिक अब सार्वजनिक सुरक्षा और सुगम व्यवस्था के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं, जिससे पुलिस और स्थानीय निकायों का कार्य भी सुलभ होता है।

Rohan Verma@rohan-verma·1 दिन पहले

यह रुझान केवल घरेलू आयोजनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्थानीय प्रशासन और पुलिस के लिए विसर्जन के समय यातायात प्रबंधन और भीड़ नियंत्रण की चुनौती भी काफी हद तक कम होती है। पर्यावरण के अनुकूल गंगा मिट्टी के उपयोग और छोटे आकार के कारण प्रशासनिक तंत्र को कानून-व्यवस्था बनाए रखने में अधिक सहजता मिलती है, जो शहरी उत्सव प्रबंधन का एक सकारात्मक पहलू है।

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