झारखंड हाईकोर्ट ने एक ऐसे मामले में अहम टिप्पणी की है जो अक्सर अदालतों में देखने को मिलता है, जब लंबे समय तक साथ रहने के बाद रिश्ता टूटता है तो एक पक्ष रेप का केस दर्ज करा देता है. कोर्ट ने साफ कहा कि दो बालिग लोगों के बीच सात साल तक चला सहमति से बना शारीरिक संबंध सिर्फ इसलिए अपराध नहीं बन जाता क्योंकि आखिर में शादी नहीं हो पाई. इसी आधार पर कोर्ट ने महिला की शिकायत पर दर्ज हुई पूरी एफआईआर और कार्यवाही रद्द कर दी.
सात साल का साथ, फिर टूटा रिश्ता
जानकारी के मुताबिक याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता महिला करीब सात वर्षों तक लिव-इन में रहे. महिला का कहना था कि पूरे इस दौरान युवक शादी का वादा करता रहा. अप्रैल 2023 में अचानक स्थिति बदल गई, जब युवक ने अपना फोन बंद कर लिया और उसके घरवालों ने भी शादी के लिए हामी भरने से इनकार कर दिया. इसके बाद महिला ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई, जिस पर पुलिस ने धारा 376 के तहत मामला दर्ज करते हुए जांच पूरी कर चार्जशीट अदालत में पेश कर दी. आरोपी युवक ने इस पूरी कार्यवाही को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और एफआईआर व आगे की कार्यवाही रद्द करने की मांग की. मामले की सुनवाई जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ में हुई.
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला, वादे और नीयत का फर्क
अपने आदेश में जस्टिस चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने फैसलों का जिक्र किया, जिनमें महेश दामु खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य का मामला भी शामिल है. इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है कि शादी के वादे को कानूनी तौर पर 'झूठा वादा' तभी माना जाएगा जब वादा करने वाले व्यक्ति की नीयत उसी वक्त उसे पूरा न करने की रही हो. अगर वादा ईमानदारी से किया गया था और बाद में किन्हीं परिस्थितियों या रिश्ते में खटास आने की वजह से पूरा नहीं हो सका, तो इसे रेप का अपराध नहीं ठहराया जा सकता. हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को इस मामले पर लागू करते हुए कहा कि भले ही महिला के सारे आरोपों को सही मान लिया जाए, तब भी अधिक से अधिक यह दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बना संबंध ही साबित होता है. कोर्ट के मुताबिक ऐसे तथ्यों से धारा 376(2)(एन) के तहत दंडनीय अपराध बनने के लिए जरूरी कानूनी तत्व पूरे नहीं होते. कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है जो यह साबित करे कि आरोपी की नीयत शुरुआत से ही धोखा देने की थी. सात साल तक बिना किसी विरोध या शिकायत के चला रिश्ता खुद इस बात का संकेत है कि यह संबंध सहमति पर आधारित था.
सहमति बनाम धोखा, कानून की बारीक रेखा
भारतीय कानून में सहमति की परिभाषा साफ है, दो वयस्क अपनी मर्जी से शारीरिक संबंध बना सकते हैं और इसमें कोई अपराध नहीं है. लेकिन अगर यह सहमति धोखे, गलतफहमी या जबरदस्ती पर टिकी हो तो उसे कानूनी तौर पर वैध सहमति नहीं माना जाता. यही महीन रेखा है जिस पर शादी के वादे पर रेप के ज्यादातर मामले टिके होते हैं. अक्सर देखा गया है कि लंबे समय तक चले रिश्ते में जब विवाद या दूरी आती है, तो एक पक्ष रेप का मामला दर्ज करा देता है. अदालतें ऐसे मामलों में बेहद सावधानी बरतती हैं ताकि कानून का गलत इस्तेमाल रोका जा सके, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होता है कि अगर सच में किसी के साथ धोखा हुआ है तो उसे न्याय मिले. इस मामले में कोर्ट ने पाया कि सात साल की अवधि खुद सहमति के पक्ष को मजबूत करती है. आरोपी की ओर से एडवोकेट सुदीप रंजन ने पैरवी की और अंततः केस जीत लिया. कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा कि ऐसे हालात में आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, इसलिए दर्ज एफआईआर, संज्ञान आदेश और उससे जुड़ी हर आगे की कार्यवाही रद्द कर दी गई.
लिव-इन रिलेशनशिप के बढ़ते चलन पर असर
यह फैसला सिर्फ एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि लिव-इन रिलेशनशिप और शादी के वादे पर दर्ज होने वाले रेप के मामलों के लिए एक अहम मिसाल बन सकता है. बदलते समाज में बड़ी संख्या में युवा जोड़े शादी से पहले साथ रहना पसंद कर रहे हैं, लेकिन जब यह रिश्ता किसी वजह से टूटता है तो अक्सर कानूनी विवाद खड़े हो जाते हैं. झारखंड हाईकोर्ट का यह रुख स्पष्ट संदेश देता है कि सालों तक चले सहमति वाले रिश्ते को रिश्ता टूटने के बाद आसानी से आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता, जब तक शुरुआत से ही धोखे की नीयत साबित करने वाले ठोस सबूत मौजूद न हों.


















