मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में 2 से 4 नवंबर के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों का एक विशेष वैचारिक समागम आयोजित हुआ। इस तीन दिवसीय चिंतन बैठक में वर्तमान सामाजिक तथा राजनीतिक चुनौतियों को रेखांकित करते हुए संगठन की भावी कार्यप्रणाली के लिए छह अहम स्तंभ तय किए गए। इस महत्वपूर्ण मंथन सत्र में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष के अलावा विभिन्न राज्यों के संगठन मंत्रियों ने भी हिस्सा लिया, जिससे स्पष्ट संकेत मिला कि इन निष्कर्षों का सीधा सरोकार सत्ताधारी दल के आगामी कदमों से भी है। बैठक का व्यापक फलक नई पीढ़ी को अपने साथ लाने से लेकर उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरणों और सीमावर्ती पंजाब की जटिल परिस्थितियों तक फैला रहा।
डिजिटल विमर्श पर पैनी निगरानी की तैयारी
संगठन के नेताओं ने माना कि वर्तमान दौर में इंटरनेट मंच जनभावनाओं को दिशा देने का सबसे शक्तिशाली साधन बन चुके हैं। दिल्ली में सामने आए 'कॉकरोच जनता पार्टी' के उभार का उल्लेख करते हुए चर्चा की गई कि किस तरह पारंपरिक धरना प्रदर्शनों की तुलना में यह तरीका बिल्कुल अलग था। इतने बड़े स्तर पर खड़े हुए विरोध तंत्र ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक माध्यमों के जरिए जनमत को बहुत तेजी से मोड़ा जा सकता है। इसी स्थिति से निपटने और इंटरनेट माध्यमों पर दिखने वाली अशांति पर अंकुश लगाने की रणनीति को बैठक में सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई।
कार्यकर्ताओं को हिदायत दी गई कि वे सोशल मीडिया के भ्रमजाल में उलझने से बचें, पर इससे दूरी भी न बनाएं। तय किया गया कि जब भी कोई विमर्श संगठन की मूल विचारधारा के विपरीत चलता दिखाई दे, तो उसका खंडन केवल ऑनलाइन प्रतिक्रिया देकर नहीं, बल्कि धरातल पर उतरकर ठोस रूप से किया जाए। विमर्श पर नजर बनाए रखने के लिए प्रचार विभाग के दायरे से बाहर एक समर्पित और स्वतंत्र निगरानी दल गठित करने पर भी विचार हुआ, जिसकी रूपरेखा और संगठनात्मक ढांचा अभी प्रारंभिक स्तर पर है।
जेन जेड पीढ़ी को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने का संकल्प
नौजवानों के बदलते रुख को देखते हुए संघ ने तय किया है कि युवा पीढ़ी को रचनात्मक दिशा दी जाए। हालिया आंदोलनों में नई उम्र के युवाओं की बड़ी हिस्सेदारी रही, जिसे देखते हुए संगठन ऐसे देशभक्त युवाओं का एक मजबूत समूह तैयार करना चाहता है जो समस्याओं पर सवाल तो उठाएं, लेकिन अराजकता का रास्ता न चुनें। यह नौजवान अपनी जायज मांगे रखने और आवश्यकता पड़ने पर सत्ता की नीतियों का विरोध करने के लिए स्वतंत्र होंगे, बशर्ते उनकी हर गतिविधि का मूल उद्देश्य राष्ट्र को सशक्त बनाना हो और उनका नियंत्रण किसी बाहरी तत्व के हाथों में न जाए।
बैठक में सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि विदेशी और राष्ट्रविरोधी ताकतें युवाओं को आगे कर देश के खिलाफ साजिश रच रही हैं, इसलिए देशभक्त नई पीढ़ी तैयार करनी होगी। उन्होंने जोर दिया कि स्वयंसेवकों को नौजवानों के बीच खुद जाना होगा, उनकी भाषा को अपनाना होगा और उनकी प्राथमिकताओं को सहानुभूतिपूर्वक समझना होगा।
प्रदर्शनों की फंडिंग पर नजर और कड़े कानून की मांग
देश के भीतर अलग अलग मौकों पर भड़कने वाले असंतोष के पीछे मिलने वाली बाहरी वित्तीय मदद की पड़ताल तीसरा बड़ा विषय रहा। जांच एजेंसियां इस समय देश में होने वाले आंदोलनों और विदेशों से आने वाले धन के बीच संबंधों की छानबीन में जुटी हैं। सरकारी सूत्रों के हवाले से संकेत मिले हैं कि कई अहम साक्ष्य जुटाए जा चुके हैं, जिन्हें शीघ्र ही एक विस्तृत दस्तावेज के रूप में सार्वजनिक मंच पर प्रस्तुत करने की तैयारी है।
बैठक में यह मांग उठी कि विदेशों से धन जुटाने वाली संस्थाओं के कामकाज की कड़ी जांच की जाए और ऐसे वित्तीय लेन-देन को रोकने के लिए एक कड़ा कानून बनाया जाए। इसके साथ ही पिछले दिनों हुए विभिन्न प्रदर्शनों के वास्तविक उद्देश्यों की गहराई से पड़ताल करने की जरूरत बताई गई।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों पर असंतोष और उत्तर प्रदेश की चिंता
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के इरादे से लाए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नए नियमों को लेकर उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी दल के पारंपरिक मतदाताओं में नाराजगी की बात सामने आई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दिशा निर्देशों पर रोक लगा रखी है, फिर भी कई राज्यों में इसका विरोध जारी है। उत्तर प्रदेश में फरवरी और मार्च के दौरान विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, इसलिए दोनों संगठनों को अंदेशा है कि यह विवाद चुनावी संभावनाओं पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है।
संघ ने पहले ही साफ कर दिया था कि वह इन नियमों के पक्ष में नहीं है। इंदौर बैठक में भी यह राय बनी कि संबंधित परिपत्र संतुलित नहीं था और इससे समाज के भीतर आपसी सौहार्द तथा संतुलन बिगड़ने का खतरा पैदा हो सकता था।
पंजाब में जीत से ज्यादा समस्याओं को मुद्दा बनाने पर जोर
फरवरी महीने में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनावों को लेकर संघ ने अपनी जमीनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जो बीते छह महीनों के अध्ययन पर आधारित थी। इस रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पंजाब के हालात बाकी राज्यों से बिल्कुल भिन्न हैं और वहां पश्चिम बंगाल जैसी रणनीति कारगर नहीं हो सकती।
वहां एक अलग वैचारिक पृष्ठभूमि वाली सरकार काबिज है और राज्य नशीले पदार्थों के निर्माण व आपूर्ति, कानून व्यवस्था, हथियारों की तस्करी, मतांतरण और अलगाववादी रुझानों जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। तय हुआ कि भारतीय जनता पार्टी नशाखोरी को मुख्य चुनावी विषय बनाएगी, जबकि स्वयंसेवक कानून व्यवस्था की स्थिति पर जनजागरण करेंगे। एक सूत्र के अनुसार, इस बार का लक्ष्य महज सीट जीतना नहीं, बल्कि पंजाब के बुनियादी संकटों को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बनाना है।
राम मंदिर के बाद पुराने और नाराज कार्यकर्ताओं को साधने की मुहिम
बैठक का अंतिम अहम विषय संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं से पुनः संपर्क साधना रहा। सरसंघचालक ने निर्देश दिए कि जो स्वयंसेवक किसी वजह से संगठन से अलग हो गए हैं या असंतुष्ट हैं, उनके पास जाकर उनका मार्गदर्शन लिया जाए। उनकी चिंताओं और सुझावों को गंभीरता से सुनकर उनका निवारण किया जाना चाहिए।
राम जन्मभूमि से जुड़े घटनाक्रमों के बाद कई पुराने सहयोगियों द्वारा संगठन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जाने की बातें सामने आई थीं। विरोधियों ने भी दूरी बना चुके इन कार्यकर्ताओं के बयानों का सहारा लेकर अभियान चलाए। इसी परिप्रेक्ष्य में यह निर्णय लिया गया कि निष्ठावान और पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मानपूर्वक वापस मुख्यधारा में लाने के लिए एक विशेष अभियान शुरू किया जाएगा।

















