दीपावली के आगमन के साथ ही चारों तरफ उत्सव की रौनक नजर आने लगी है और लोग अपने घरों को संवारने में जुट गए हैं। पर्यावरण के अनुकूल और पारंपरिक तरीके से पर्व मनाने की चाह रखने वाले लोगों के लिए जमशेदपुर के ग्राम नाला में एक विशेष बाजार लगा है। झारखंड के प्रसिद्ध चंदनक्यारी क्षेत्र से पहुंचे हुनरमंद शिल्पकार यहाँ गंगा की मिट्टी से तैयार किए गए बेहद आकर्षक और पारंपरिक घरौंदे लेकर आए हैं।
200 रुपये से शुरुआत और चार मंजिला तक के विकल्प
इस बाजार में मिल रहे घरौंदों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें पूर्ण रूप से प्राकृतिक मिट्टी की मदद से गढ़ा गया है। यह न केवल त्योहार पर घर के आंगन को पारंपरिक रूप देते हैं, बल्कि बच्चों के उत्साह को भी दोगुना करते हैं। यहाँ खरीदारों के लिए 200 रुपये की शुरुआती कीमत में घरौंदे उपलब्ध कराए गए हैं। विभिन्न परिवारों की पसंद और जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कारीगरों ने एक मंजिल से लेकर चार मंजिल तक की भव्य बनावट वाले घरौंदे तैयार किए हैं, जिन्हें लोग अपने बजट के अनुसार चुन सकते हैं।
दीयों और सजावटी सामानों की भी विस्तृत श्रृंखला
घरौंदों के अतिरिक्त इस बाजार में गंगा मिट्टी से गढ़े गए दीये और गृह सज्जा से जुड़ी कई सामग्रियां भी मिल रही हैं। इनकी बनावट और सूक्ष्म नक्काशी इतनी आकर्षक है कि यहाँ आने वाले ग्राहक बरबस ही इनकी ओर खिंचे चले आ रहे हैं। दीपावली के अवसर पर अपने आशियाने को सादगी और प्राकृतिक खूबसूरती से सजाने के इच्छुक परिवारों के लिए यह बाजार एक आदर्श स्थान साबित हो रहा है।
चंदनक्यारी के शिल्पकारों की पूरे साल की मेहनत
कारीगर सुबोध के अनुसार उनका परिवार झारखंड के चंदनक्यारी इलाके का रहने वाला है और वे पूरे वर्ष मिट्टी के ऐसे ही उत्पाद बनाने के काम में लगे रहते हैं। दिवाली के दिनों में मिट्टी के इन पारंपरिक घरौंदों की मांग में भारी उछाल आता है और जमशेदपुर के नागरिक भी इनके काम को खूब सराह रहे हैं। प्रत्येक घरौंदे को हाथों से गढ़ने में लंबा समय और विशेष धैर्य लगता है, जिससे यह देखने में सुंदर लगने के साथ-साथ टिकाऊ और मजबूत भी बने रहते हैं।
थर्माकोल और प्लास्टिक के मुकाबले प्राकृतिक मिट्टी की पहचान
सुबोध बताते हैं कि आधुनिक समय में बाजार थर्माकोल और प्लास्टिक से बने चमकीले घरौंदों से भरे रहते हैं, लेकिन जो बात और पहचान प्राकृतिक मिट्टी के बने उत्पादों में है, वह कृत्रिम चीजों में नहीं मिल सकती। उनका मानना है कि अभिभावकों को अपने बच्चों को त्योहारों की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के लिए इस बार प्लास्टिक या थर्माकोल के बजाय मिट्टी के घरौंदे उपहार में देने चाहिए। इससे नई पीढ़ी अपनी लोक परंपराओं को करीब से समझ पाएगी और अपनी कला को जीवित रखने वाले पारंपरिक कारीगरों के परिश्रम को भी सीधा सम्मान मिलेगा। इस दिवाली मिट्टी के इन उत्पादों को चुनना पर्यावरण सुरक्षा के साथ स्थानीय हुनर को मजबूती देने की दिशा में एक सार्थक कदम है।


















