झारखंड में संगठित अपराध गिरोहों की कार्यशैली में आए खतरनाक बदलाव ने सुरक्षा एजेंसियों और समाज के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। पारंपरिक तौर पर सामान्य चोरी और पॉकेटमारी तक सीमित रहने वाले तीनपहाड़ और गुलगुलिया गिरोह अब बच्चों के अपहरण और मानव तस्करी के संगठित नेटवर्क में शामिल पाए गए हैं। हालिया घटनाओं के खुलासे के बाद कानून व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों ने त्योहारों के मौसम में अतिरिक्त सतर्कता बरतने की हिदायत दी है, क्योंकि मेलों और बाजारों की भीड़ का फायदा उठाकर ऐसे आपराधिक तत्व सक्रिय हो जाते हैं।
पुलिस का अलर्ट और जिलों के कप्तानों को निर्देश
अपराध नियंत्रण शाखा के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आईजी ऑपरेशन नरेंद्र कुमार सिंह ने स्पष्ट किया है कि पुलिस बल इस पूरे खतरे को लेकर पूरी तरह चौकस है। त्योहारों के दौरान राजधानी रांची समेत विभिन्न जिलों में बच्चों के अपहरण की घटनाओं की आशंका को देखते हुए सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को कड़े सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने के निर्देश भेजे गए हैं। पुलिस प्रशासन ने आम नागरिकों और विशेषकर अभिभावकों से पुरजोर अपील की है कि वे बाजारों, स्टेशनों और भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों पर अपने बच्चों को अकेला न छोड़ें ताकि किसी भी अप्रिय घटना से पहले ही बचाव किया जा सके।
हालिया खुलासे और काम करने का शातिर तरीका
जांच के क्रम में दोनों गिरोहों की कार्यप्रणाली का एक जैसा स्वरूप सामने आया है। रांची पुलिस ने इससे पहले अंश और आंशिका से जुड़े चर्चित मामले में गुलगुलिया गिरोह के तंत्र को बेनकाब किया था। वहीं, छत्तीसगढ़ के बालक विवान के रांची रेलवे स्टेशन से रहस्यमय तरीके से अगवा होने के मामले की कड़ियां सुलझाते हुए तीनपहाड़ गिरोह की सक्रियता को डिकोड किया गया। दोनों ही गिरोह बहुत सोच-समझकर आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित परिवारों के बच्चों को अपना निशाना बनाते हैं। उनका मानना होता है कि साधनहीन परिवारों के बच्चों की गुमशुदगी पर त्वरित या व्यापक खोजबीन की संभावना कम रहती है, जिससे वे आसानी से बच निकलते हैं।
अपराध, भीख और अंतरराष्ट्रीय सीमा पार तस्करी
अपहरण के बाद बच्चों का इस्तेमाल कई तरह के गैरकानूनी कामों में किया जाता है। गुलगुलिया गिरोह छोटे बच्चों से मुख्य रूप से सार्वजनिक स्थानों पर भीख मंगवाने और छोटी-मोटी चोरियां करवाने का काम लेता है। ठीक इसी तर्ज पर तीनपहाड़ गिरोह भी बच्चों को चोरी और भीड़ में पॉकेटमारी करने के धंधे में झोंक देता है। यह गिरोह बच्चों का उपयोग खासकर कीमती मोबाइल फोन की पॉकेटमारी कराने में करता है। इस नेटवर्क की अंतरराष्ट्रीय कड़ियां भी सामने आई हैं, जिसके तहत चोरी किए गए ज्यादातर मोबाइल फोनों को सीमा पार बांग्लादेश के अवैध बाजारों में खपाया जाता है। इन गिरोहों की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि इनके सदस्य किसी एक ठिकाने पर स्थायी रूप से नहीं रहते, बल्कि पुलिस से बचने के लिए कुछ ही दिनों में अपना ठिकाना बदल लेते हैं।
नाबालिग लड़कियों की तस्करी और देह व्यापार का अंधेरा
चाइल्ड ट्रैफिकिंग की रोकथाम के क्षेत्र में जमीनी स्तर पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता बैजनाथ ने इन गिरोहों की गतिविधियों को अत्यंत क्रूर और खतरनाक करार दिया है। उनके अनुसार ये गिरोह मासूम लड़कों को जबरन अपराध के दलदल में धकेलते हैं, जबकि अपहृत और चोरी की गई बच्चियों का सौदा कर दिया जाता है। इन नाबालिग लड़कियों को जबरन देह व्यापार के अंधेरे और अवैध धंधे में धकेल दिया जाता है। बच्चा चोरी की सबसे ज्यादा वारदातें उन जगहों पर अंजाम दी जाती हैं जहां लोगों की भारी आवाजाही होती है। इनमें साप्ताहिक बाजार, रेलवे स्टेशन, धार्मिक स्थल, मेले और पिकनिक स्पॉट प्रमुख हैं। त्योहारों के मौसम में इन स्थलों पर लोगों की संख्या बढ़ने से जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
कड़ी कार्रवाई और सामाजिक जागरूकता की पुकार
वरिष्ठ पत्रकार शंभू नाथ चौधरी के अनुसार, गुलगुलिया गिरोह के बाद अब तीनपहाड़ गिरोह का बच्चों के अपहरण में शामिल होना बेहद गंभीर विषय है। उन्होंने रेखांकित किया कि पुलिस मुख्यालय को तीनपहाड़ गिरोह की जड़ों पर प्रहार करने के लिए सख्त और निर्णायक अभियान चलाना चाहिए। इसके साथ ही तीनपहाड़ इलाके को अपराधमुक्त बनाने के लिए व्यापक स्तर पर सामाजिक जागरूकता और पुनर्वास के प्रयास भी जरूरी हैं। वर्तमान हालात यह मांग करते हैं कि गिरोहों के अंतरराज्यीय नेटवर्क, बच्चों की तस्करी के गुप्त रास्तों और गिरोह में नए सदस्यों की भर्ती के तौर-तरीकों की गहन जांच की जाए, ताकि बच्चों की सुरक्षा पुख्ता हो सके।





















