खरीफ सत्र के दौरान धान की बुवाई करने वाले काश्तकारों के लिए पोषण प्रबंधन एक बेहद अहम पहलू है। अक्सर बेहतर पैदावार हासिल करने की चाहत में खेतों में नाइट्रोजन की अधिकता हो जाती है, जबकि पोटाश जैसे जरूरी तत्व पीछे छूट जाते हैं। पौधों के समग्र विकास और स्वस्थ बालियों के लिए मिट्टी में उर्वरकों का सटीक तालमेल होना अनिवार्य माना जाता है।
पोषण का सही अनुपात क्यों है जरूरी
फसल की शुरुआती बढ़वार से लेकर दाना पकने तक पोषक तत्वों का एक निश्चित संतुलन बनाए रखना चाहिए। क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी के कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, धान में नत्रजन, फास्फेटिक और पोटाशिक खादों का सही अनुपात बनाए रखना आवश्यक है। सामान्य तौर पर इस व्यवस्था में चार भाग नत्रजन के साथ दो भाग फास्फोरस तथा एक भाग पोटाश का समायोजन सुझाया जाता है।
खेत में पोटाश की पर्याप्त मौजूदगी पौधों के तने को सुदृढ़ बनाती है। जब पौधे भीतर से मजबूत रहते हैं, तो दाना भराव का काम बिना किसी रुकावट के पूरा होता है और दाने सुडौल बनते हैं।
अत्यधिक यूरिया के इस्तेमाल से पैदा होने वाले खतरे
उपज में बढ़ोतरी की लालसा में कई किसान खेतों में केवल यूरिया की भारी खुराक झोंक देते हैं। इसके विपरीत फास्फोरस और पोटाश की मात्रा काफी घट जाती है। पोटाश का स्तर कम रहने पर पौधे संपूर्ण पोषण से वंचित रह जाते हैं, जिससे उनका ढांचा कमजोर पड़ जाता है।
असंतुलित पोषण का सीधा असर पौधों की प्राकृतिक मजबूती और बढ़वार पर नजर आता है। ऐसे कमजोर पौधों पर कीटों के हमले और कई तरह की बीमारियों का जोखिम काफी तेजी से बढ़ जाता है, जिससे अंततः उपज को नुकसान पहुंचता है।
चरणबद्ध तरीके से नत्रजन देने की सही तकनीक
नत्रजन को एक ही बार में पूरे खेत में बिखेरने के बजाय उसे टुकड़ों में देना अधिक कारगर साबित होता है। रोपाई संपन्न होने के 15 से 20 दिनों के भीतर नत्रजन की पहली खुराक के तहत लगभग एक तिहाई हिस्सा डालना चाहिए। इसके बाद दूसरा दौर 30 से 35 दिनों के अंतराल पर और तीसरा छिड़काव 40 से 50 दिनों के मध्य पूरा करने का सुझाव दिया जाता है।
स्थानीय कृषि परिस्थितियों और पौधों की विकास दर को ध्यान में रखते हुए इस खाद प्रबंधन में हल्का फेरबदल किया जा सकता है। टुकड़ों में खुराक मिलने से पौधा खाद को भली-भांति सोख पाता है और बर्बादी रुकती है।
गाबा बनते समय खाद प्रबंधन और छिड़काव का सही समय
उर्वरक प्रबंधन सिर्फ बुवाई अथवा रोपाई तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि जब पौधे में गाबा बनने लगता है तब भी इसकी महत्ता बनी रहती है। लगभग 90 दिन की अवधि वाली फसल में भी जरूरत की समीक्षा कर आवश्यक पोषक तत्व दिए जा सकते हैं।
खाद बिखेरते समय दिन के पहर का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सुबह के वक्त जब पत्तियों पर ओस जमी हो, तब छिड़काव से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। भीगी पत्तियों पर खाद के कण चिपक जाने से पत्तों को नुकसान पहुंचने का अंदेशा रहता है। इसी वजह से दोपहर बीत जाने के बाद खाद का बिखराव करना सबसे सुरक्षित माना जाता है।





















