हस्तकला और रचनात्मकता के संगम से न केवल सांस्कृतिक पहचान को नई दिशा दी जा सकती है, बल्कि आत्मनिर्भरता का मजबूत मंच भी तैयार किया जा सकता है। जमशेदपुर के निवासी राजा पोद्दार ने इसी सोच को हकीकत में तब्दील कर दिखाया है। वे लकड़ी और कुदरती पत्थरों पर ऐसी महीन कारीगरी करते हैं जो पहली ही नजर में मन मोह लेती है। उनके काम की सबसे बड़ी खासियत ब्रश की वह खास तकनीक है, जिसमें बिना दोबारा हाथ घुमाए, एक ही झटके में पूरी आकृति उभरकर सामने आ जाती है।
लकड़ी के दैनिक उपयोग और सजावटी सामान को नया रूप
राजा पोद्दार साधारण लकड़ी के टुकड़ों से घर को सजाने वाले और रोजमर्रा के काम आने वाले कई अनूठे उत्पाद बनाते हैं। उनके संग्रह में पारंपरिक सिंदूर की कंघी, चाय-नाश्ते के लिए सजावटी कप ट्रे और आकर्षक नक्काशीदार वुडन लैंप प्रमुखता से शामिल हैं। इन सभी कृतियों में प्राचीन लोक कला की सादगी और आधुनिक इंटीरियर डिजाइनिंग की जरूरतों का बेहतरीन तालमेल दिखता है। पारंपरिक स्वरूप में नयापन होने के कारण लोग अपने ड्राइंग रूम और लिविंग स्पेस को सजाने के लिए इनके बनाए सामान को काफी पसंद कर रहे हैं।
समुद्र तट के साधारण पत्थरों पर रंगीन आकृतियों का जादू
कारीगरी का यह दायरा सिर्फ लकड़ी के सांचों तक ही सीमित नहीं है। समुद्र किनारे से मिलने वाले गोल और चिकने पत्थरों को भी राजा पोद्दार अपनी कला से एक नया जीवन देते हैं। इन पत्थरों की स्वाभाविक बनावट पर जब ब्रश का एक सधा हुआ स्ट्रोक पड़ता है, तो वे बेहद सुंदर पेपर वेट और टेबल डेकोर के नमूनों में बदल जाते हैं। जिस पत्थर को आम तौर पर लोग अनदेखा कर देते हैं, उस पर प्राकृतिक रंगों और सधे हुए हाथों की कलाकारी उसे एक कीमती कलाकृति का दर्जा दिला देती है।
साधना और अभ्यास से साधी गई सिंगल स्ट्रोक तकनीक
पेंटिंग की दुनिया में सिंगल स्ट्रोक विधा बेहद कठिन मानी जाती है। इसमें ब्रश को बार-बार चलाने या गलतियों को सुधारने की कोई गुंजाइश नहीं होती। एक ही बार में सटीक दबाव और सही कोण के साथ पूरे फूल, पत्ती या डिजाइन को पूरा करना होता है। इसके लिए निरंतर अभ्यास, एकाग्रता और हाथों की गजब की सफाई की दरकार होती है। राजा पोद्दार ने वर्षों के पसीने से इस तकनीक पर महारत हासिल की है और अब वे लगातार नए-नए प्रयोगों के जरिए अपने उत्पादों का दायरा बढ़ा रहे हैं।
सामूहिक आजीविका का जरिया बने करीब 12 कारीगर
इस कला यात्रा का सबसे प्रेरक पहलू यह है कि राजा पोद्दार की सफलता की परिधि केवल उन तक सीमित नहीं है। उनके इस उपक्रम से करीब 12 स्थानीय कारीगर जुड़े हुए हैं, जो नियमित रूप से काम कर अपने परिवारों का पालन-पोषण कर रहे हैं। राजा का स्पष्ट मानना है कि यदि हम अपनी पुरानी और पारंपरिक विधाओं को आज के बाजार की पसंद और मॉडर्न टच के साथ पेश करें, तो स्थानीय स्तर पर आजीविका के असीमित अवसर पैदा किए जा सकते हैं। मशीनी दौर की आपाधापी के बीच हाथ की यह सधी हुई कारीगरी आज स्वावलंबन की जीवंत मिसाल बन चुकी है।

















