झारखंड के देवघर जिले में स्थित गोपीडीह गांव के किसान अम्बिका के लिए खेती अब घाटे का सौदा नहीं रही। उनके पास लगभग 4 से 5 एकड़ कृषि योग्य भूमि मौजूद है, लेकिन कुछ वर्ष पहले तक यह पूरी जमीन पानी के अभाव में बेकार साबित हो रही थी। खेतों तक पानी पहुंचाने का कोई स्थायी साधन न होने के कारण उन्हें पूरी तरह मानसूनी बारिश पर ही निर्भर रहना पड़ता था। जिन फसलों को नियमित पटवन की आवश्यकता होती थी, किसान चाहकर भी उन्हें अपने खेतों में नहीं लगा पाते थे। जमीन का मालिकाना हक होने के बावजूद पर्याप्त सिंचाई नेटवर्क न होने से उसका वाजिब आर्थिक लाभ परिवार को नहीं मिल पा रहा था।
मनरेगा और सिंचाई योजना से हुआ तीन कुओं का निर्माण
जल संकट के इस लंबे दौर के बीच सरकारी योजनाओं के तालमेल ने किसान की तकदीर बदलने की नींव रखी। अम्बिका को महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) और सरकारी सिंचाई योजना के संयुक्त प्रावधानों के जरिए तीन पक्के कुओं की सुविधा उपलब्ध कराई गई। इन कुओं का निर्माण कार्य पूरा होते ही खेतों तक नियमित पानी पहुंचाने की व्यवस्था पूरी तरह सुदृढ़ हो गई। खेतों के पास ही जल स्रोत तैयार हो जाने से अब फसलों की बुआई के लिए आकाश की ओर टकटकी लगाकर बारिश का इंतजार करने की मजबूरी समाप्त हो गई। जब भी फसल को पानी की जरूरत होती है, किसान तुरंत पटवन का प्रबंध कर लेते हैं।
पारंपरिक ढर्रे से हटकर नकदी फसलों का चुनाव
सिंचाई की पुख्ता सुविधा मिलने के बाद अम्बिका ने अपनी 4 से 5 एकड़ जमीन पर फसल चक्र को पूरी तरह बदल दिया है। अब वे अपने खेतों में पारंपरिक खेती के स्थान पर बाजार की मांग और मौसम के अनुकूल नकदी फसलें उगा रहे हैं। वर्तमान में उनके खेतों में गन्ने की खेती के साथ-साथ बड़े पैमाने पर पपीता भी लगाया गया है। इसके अलावा उन्होंने अतिरिक्त आमदनी सुनिश्चित करने के लिए हल्दी की खेती भी सफलतापूर्वक शुरू की है। विभिन्न प्रकार की इन फसलों के उत्पादन से किसान के लिए साल भर कमाई के कई स्वतंत्र रास्ते खुल गए हैं।
गोपीडीह क्षेत्र में 45 से 50 एकड़ भूमि पर बढ़ा भरोसा
अम्बिका के अनुसार, सरकारी मदद का सबसे बड़ा सकारात्मक असर यह हुआ है कि अब किसी भी मौसम में खेत को परती या बेकार छोड़ने की नौबत नहीं आती। पानी का स्थायी बंदोबस्त होने से खेती में पूंजी और श्रम लगाने का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ गया है। इस सफल बदलाव की गूंज पूरे इलाके में सुनाई दे रही है और गोपीडीह में 45 से 50 एकड़ के दायरे में फैली कृषि भूमि पर भी काश्तकारी की गतिविधियों में तेजी आई है। जो जमीन कभी सिंचाई के अभाव में वीरान नजर आती थी, आज उसी मिट्टी से गन्ना, पपीता और हल्दी जैसी उपज लेकर किसान बेहतर मुनाफे की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।



















