झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली लक्ष्मी अपनी अनूठी कारोबारी सोच के कारण खासी चर्चा में हैं। वह किसी एक उत्पाद पर टिके रहने के बजाय हर तीसरे महीने अपनी व्यावसायिक रणनीति और सामान में बदलाव करती हैं। वर्तमान में उनका पूरा ध्यान आगामी त्योहारों जैसे जन्माष्टमी और तीज पर केंद्रित है। इसके अलावा वह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई का हुनर भी सिखा रही हैं।
मौसम और त्योहारों के हिसाब से बदलता है कारोबार
लक्ष्मी के काम करने का तरीका पूरी तरह से मांग पर आधारित है। वह सालभर एक ही चीज बेचने के बजाय मौसम और आने वाले त्योहारों को ध्यान में रखकर अपने उत्पाद चुनती हैं। उदाहरण के लिए, जब ठंड का मौसम आता है तो वह रागी के लड्डू और गर्म कुर्तियों का व्यापार करती हैं, जबकि गर्मियों में मौसम के अनुकूल अन्य सामान बेचती हैं। फिलहाल उनका पूरा फोकस जन्माष्टमी और तीज के बाद आने वाले नवरात्रि और दीवाली जैसे बड़े त्योहारों पर है।
गुजरात से मंगाती हैं सामान और खुद तैयार करती हैं डिजाइन
व्यापार को आगे बढ़ाने के लिए लक्ष्मी गुजरात से कच्चा सामान मंगाती हैं। इसके अलावा उन्हें सिलाई का 40 साल का लंबा अनुभव है, जिसका फायदा उन्हें अपने उत्पादों को एक अनूठा रूप देने में मिलता है। जन्माष्टमी के अवसर पर वह छोटे बच्चों के लिए राधा-रानी के विशेष कपड़े, लड्डू गोपाल की पोशाकें और डिजाइनर बांसुरी जैसी चीजें खुद अपने हाथों से तैयार करती हैं। उनके इस एक्सक्लूसिव और लेटेस्ट कलेक्शन की बाजार में काफी मांग है।
खुद का स्टोर और शानदार कमाई
उनका अपना खुद का ब्रांड और स्टोर है जिसका नाम लक्ष्मी कलेक्शन है। ग्राहकों को उनकी सिलाई और यूनीक डिजाइन इतनी पसंद आते हैं कि एक बार सामान खरीदने वाला व्यक्ति उनका स्थायी ग्राहक बन जाता है। इस पूरे कारोबार से वह हर महीने आराम से ₹50000 तक की कमाई कर लेती हैं। काम के साथ-साथ वह अपने घर-परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों को भी बखूबी संभालती हैं।
दूसरों के लिए बनीं प्रेरणा
64 साल की उम्र में भी लक्ष्मी का जज्बा युवाओं के लिए मिसाल है। वह अकेले रहते हुए अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बना चुकी हैं कि वे आज अपने पैरों पर खड़े हैं। परिवार की जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद अब वह आसपास की महिलाओं को सिलाई का प्रशिक्षण दे रही हैं ताकि वे भी आत्मनिर्भर बन सकें।



















