रांची में पिछले एक महीने के दौरान लेप्टोस्पायरोसिस यानी रैट फीवर के मामलों में भारी उछाल दर्ज किया गया है। राजधानी के रानी चिल्ड्रन अस्पताल में पिछले एक महीने में ही इस बीमारी के 130 से अधिक मरीज इलाज के लिए पहुंच चुके हैं। अस्पताल की डायरेक्टर डॉक्टर सोनी सिंहा ने इस बात की पुष्टि करते हुए बताया कि जुलाई और अगस्त इन दोनों महीनों को मिलाकर मरीजों का यह आंकड़ा 130 के पार पहुंच गया है। इस बीमारी की चपेट में आने वाले अधिकांश मरीज 5 साल से 10 साल की आयु वर्ग के बच्चे हैं। हालांकि, कुछ चिकित्सीय रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि 8 महीने के शिशुओं से लेकर 16 साल तक के किशोर भी इस संक्रमण का शिकार हुए हैं। कई मामलों में संक्रमण की स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि वह बच्चों के फेफड़ों और मस्तिष्क तक फैल गया, जिसके चलते उन्हें गहन चिकित्सा कक्ष यानी आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा।
लेप्टोस्पायरोसिस बीमारी फैलने की वजह और संक्रमण का तरीका
यह खतरनाक बीमारी लेप्टोस्पाइरा नामक बैक्टीरिया के कारण फैलती है। डॉक्टर सोनी सिंहा के अनुसार, इस बीमारी का सबसे मुख्य वाहक चूहा होता है। दरअसल, संक्रमित चूहों के मूत्र में यह बैक्टीरिया मौजूद रहता है। बरसात के मौसम में जब चूहों के बिलों में पानी भर जाता है, तो वे बाहर निकलने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इन चूहों का मल-मूत्र आसपास के पानी, गीली मिट्टी और खुले में रखे फलों को दूषित कर देता है। जब लोग इस संदूषित पानी का उपयोग करते हैं, जूठे या बिना धुले फल खाते हैं, या फिर जलभराव वाले क्षेत्रों में नंगे पैर चलते हैं, तो यह बैक्टीरिया आसानी से मानव शरीर के भीतर प्रवेश कर जाता है। स्थिति तब और अधिक खतरनाक हो जाती है जब शरीर पर कोई खुला कट या घाव होता है, क्योंकि इससे बैक्टीरिया के शरीर के भीतर जाने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इस बैक्टीरिया की सबसे डरावनी बात यह है कि यह नमीयुक्त वातावरण में महीनों तक जीवित रहने की क्षमता रखता है।
रैट फीवर के प्रमुख लक्षण और स्वास्थ्य पर असर
रांची सदर अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. विमलेश कुमार सिंह ने इस बीमारी के लक्षणों के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि इसके शुरुआती संकेत सामान्य वायरल बुखार जैसे ही प्रतीत होते हैं। मरीजों में तेज बुखार, सिरदर्द, कंपकंपी के साथ ठंड लगना, मांसपेशियों में असहनीय दर्द, अत्यधिक कमजोरी, लगातार उल्टी होना और आंखों में लाली छा जाना इसके मुख्य लक्षण हैं। इसके अलावा, बच्चों में सांस लेने में गंभीर तकलीफ की शिकायत भी देखी जा रही है। यदि इस संक्रमण का समय रहते उचित इलाज न किया जाए, तो यह बीमारी जानलेवा रूप ले सकती है और पीलिया यानी जॉन्डिस के साथ-साथ किडनी और लिवर फेल्योर का कारण बन सकती है।
बच्चों को इस संक्रमण से सबसे ज्यादा खतरा क्यों है
डॉक्टर सोनी सिंहा ने स्पष्ट किया कि छोटे बच्चे अक्सर बारिश के पानी और जलजमाव वाले स्थानों पर नंगे पैर खेलने की जिद करते हैं। पानी से भरे इन इलाकों में खेलने के दौरान वे सीधे तौर पर दूषित कीचड़ और मिट्टी के संपर्क में आ जाते हैं। बच्चे अपने हाथों पर लगे छोटे-मोटे कट या खरोंच पर भी ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं। यही वजह है कि 5 से 10 वर्ष की आयु के बच्चों में यह बीमारी बहुत तेजी से फैल रही है। यदि शुरुआती चरणों में ही इस संक्रमण की पहचान न हो पाए, तो यह बच्चों के लिए घातक साबित हो सकता है.
बचाव के उपाय और डॉक्टरों की महत्वपूर्ण सलाह
चिकित्सकों ने अभिभावकों और आम जनता को सलाह दी है कि बच्चों को किसी भी कीमत पर जलजमाव वाले दूषित पानी में खेलने से रोकें। बारिश के दिनों में बच्चों को बिना जूतों या चप्पलों के बाहर न निकलने दें और घर में लाए जाने वाले फलों को अच्छी तरह धोने के बाद ही सेवन के लिए दें। सबसे अधिक सतर्कता पीने के पानी को लेकर बरतनी चाहिए और केवल पूरी तरह शुद्ध तथा साफ पानी का ही इस्तेमाल करना चाहिए। यदि शरीर पर किसी प्रकार का घाव या खरोंच है, तो उसे अच्छी तरह ढककर रखें और गंदे पानी के संपर्क में आने से पूरी तरह बचें। यदि लगातार तेज बुखार और बदन दर्द की शिकायत बनी रहे, तो बिना देर किए तुरंत किसी योग्य डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।


















