बिहार में बाढ़ का प्रकोप कोई नई बात नहीं है, क्योंकि हर साल मानसून के दौरान गंगा और अन्य नदियों का जलस्तर बढ़ने से निचले इलाकों के बाशिंदों की परेशानियां बढ़ जाती हैं। कई जगहों पर लोगों को अपने घरों में पानी भरने या नदी के कटाव के कारण अपना आशियाना तक गंवाना पड़ता है। भागलपुर जिले में भी हर साल बाढ़ और कटाव का भयंकर असर देखने को मिलता है। लेकिन इसी जिले के सुल्तानगंज इलाके में आने वाला कल्याणपुर गांव एक ऐसी जगह है, जहां हालात इतने जुदा हैं कि बाढ़ के बाद यहां के लोगों की पूरी दिनचर्या करीब तीन महीने तक पानी के बीच कैद होकर रह जाती है। गांव के लोग इस विकट स्थिति के कारण खुद को जल कैदी मानने पर मजबूर हैं।
चारों तरफ पानी और नाव ही एकमात्र सहारा
जैसे ही गंगा नदी का जलस्तर ऊपर चढ़ता है, कल्याणपुर गांव चारों तरफ से पानी के अथाह विस्तार से घिर जाता है। इसके बाद बाहरी दुनिया से संपर्क बनाए रखने और गांव से बाहर कदम रखने का एकमात्र साधन केवल नाव ही बचती है। चाहे बाजार जाना हो, घर का कोई जरूरी सामान खरीदना हो या फिर किसी बीमार मरीज को तुरंत अस्पताल पहुंचाकर उसका इलाज कराना हो, हर छोटे-बड़े काम के लिए पानी के रास्ते ही सफर तय करना पड़ता है। नदी के बहाव की तेज धार इस सफर को कई बार बेहद खतरनाक बना देती है, जिससे हर पल जान का जोखिम भी बना रहता है।
ढाई किलोमीटर की दूरी तय करने में लगे ढाई घंटे
इस गांव के धरातलीय हालातों और लोगों के संघर्ष को करीब से देखने के लिए वहां की यात्रा की गई, जिसमें पाया गया कि महज ढाई किलोमीटर का छोटा सा रास्ता तय करने में लगभग ढाई घंटे का लंबा समय लग जाता है। छोटी नाव और पानी के बहाव का तेज वेग होने के कारण आगे बढ़ना काफी कठिन हो जाता है। कई बार नाव अनियंत्रित होकर तेज बहाव की दिशा में खींचने लगती है, जिससे खतरा और बढ़ जाता है। स्थानीय ग्रामीणों के बहुमूल्य सहयोग से ही किसी तरह उस पार तक पहुंचना संभव हो पाता है।
चारों तरफ जलभराव और ग्रामीणों के चेहरे पर चिंता
गांव के भीतर प्रवेश करते ही हर तरफ केवल पानी ही पानी नजर आता है। कई घरों की दहलीज और उनके आसपास भारी पानी जमा रहता है, जिससे लोगों का सामान्य जनजीवन पूरी तरह ठप पड़ जाता है। ग्रामीण अपने घरों के ऊंचे हिस्सों या दरवाजों पर मायूस बैठे दिखाई देते हैं। एक-स्टे दूसरे को देखते ही इन लोगों के चेहरों पर साफ चिंता झलकने लगती है। ऐसा प्रतीत होता है कि हर ग्रामीण के मन में बस यही एक सवाल बार-बार घूमता रहता है कि आखिर उन्हें कब तक इसी तरह पानी के बीच अपनी जिंदगी गुजारनी होगी।
तीन महीने पहले ही जुटाना पड़ता है राशन
गांव के लोग बताते हैं कि बाढ़ का खतरा मंडराने से पहले ही उन्हें अपने परिवार के लिए कम से कम तीन महीने का राशन पहले से ही इकट्ठा करके रखना पड़ता है। एक बार गांव में पानी भर जाने के बाद स्थानीय बाजारों तक पहुंचना और सामान लाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। यही मुख्य कारण है कि ग्रामीण लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले सूखे राशन को अपनी पहली प्राथमिकता बनाते हैं। ग्रामीणों का यह भी कहना है कि इस दौरान खाना पकाना भी अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाता है, क्योंकि कई घरों में पानी घुस जाने से चूल्हा जलाने और जलावन लकड़ी रखने के लिए कोई सूखी जगह नहीं बचती। ऐसे हालात में सूखा भोजन ही उनके जीवन का मुख्य आधार बनता है और साफ पीने के पानी का इंतजाम करना भी किसी संघर्ष से कम नहीं होता।
खेती और पशुपालन पर निर्भरता और शादियों का संकट
कल्याणपुर के अधिकांश परिवार अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से खेती और पशुपालन पर ही निर्भर रहते हैं। लेकिन बाढ़ आते ही खेती का काम बुरी तरह प्रभावित होता है और मवेशियों के लिए चारे की व्यवस्था करना भी बहुत कठिन हो जाता है। गांव से बाहर आने-जाने का रास्ता बंद होने के कारण रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर चिकित्सा तक हर जरूरत एक बड़ी समस्या बन जाती है। ग्रामीणों का दर्द यह भी है कि उनके बच्चों की शादी की बात चलाने में भी उन्हें भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। गांव तक पहुंचने का रास्ता पानी के बीच से होने के कारण दूसरे इलाकों के लोग यहां अपनी बेटियों या बेटों के रिश्ते करने से पहले कई बार सोचते हैं। ऐसे में अपने बच्चों के लिए योग्य जीवनसाथी की तलाश करना भी उनके लिए एक कठिन चुनौती बना रहता है.
स्थायी समाधान के रूप में बांध की मांग
इन तमाम परेशानियों से जूझ रहे ग्रामीणों की सबसे बड़ी और मुख्य मांग इस इलाके को हर साल आने वाली बाढ़ से स्थायी रूप से निजात दिलाने की है। उनका स्पष्ट कहना है कि अगर सरकार या प्रशासन की ओर से यहां एक पक्के बांध का निर्माण करवा दिया जाए, तो उन्हें इस वार्षिक त्रासदी से काफी हद तक राहत मिल सकती है। फिलहाल वे हर साल बाढ़ आने से पहले अपनी तरफ से तमाम तैयारियां करते हैं और पानी के पूरी तरह उतर जाने तक किसी तरह अपनी जिंदगी काटने को मजबूर हैं।



















