दैनिक खानपान में फलों का सेवन शरीर को तरोताजा और स्वस्थ रखने के लिए बेहद आवश्यक माना जाता है। हालांकि, मौजूदा दौर में बाजार में कई फल विक्रेता जल्दी मुनाफा कमाने और फलों को समय से पहले बेचने के लिए हानिकारक रसायनों का सहारा ले रहे हैं। ऊपरी तौर पर चमकीले और आकर्षक नजर आने वाले ऐसे फल पोषण के लिहाज से प्राकृतिक रूप से पके फलों का मुकाबला कतई नहीं कर सकते। यदि घर लाते समय थोड़ी सतर्कता न बरती जाए, तो ये फल सेहत को संवारने के बजाय परिवार की तंदुरुस्ती को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए खरीदारी के दौरान कुछ बुनियादी वैज्ञानिक और व्यावहारिक पहलुओं को समझना जरूरी हो जाता है।
रंग की बनावट और असमानता पर रखें नजर
पेड़ पर प्राकृतिक रूप से पकने वाले फलों की पहली पहचान उनका एकसमान और स्वाभाविक रंग होता है। जब किसी फल को पेड़ की धूप और हवा में पकने दिया जाता है, तो उसका पूरा छिलका समान रंगत हासिल करता है। इसके विपरीत, कृत्रिम रसायनों से पकाए गए फलों में अक्सर रंग का भारी असंतुलन दिखाई देता है। उदाहरण के तौर पर, यदि आम का एक हिस्सा गहरा पीला दिख रहा हो और दूसरा हिस्सा अचानक बिल्कुल हरा छूट गया हो, तो यह रासायनिक क्रिया का संकेत है। इसी तरह केलों में भी पीली त्वचा के बीच अजीब से हरे चकत्ते या धब्बे अक्सर कृत्रिम पकाव के कारण ही उभर आते हैं।
प्राकृतिक महक और सुगंध से करें असली फल की पहचान
फलों को परखने का एक और अचूक माध्यम उनकी ताजी और स्वाभाविक खुशबू है। प्राकृतिक तौर पर पकने पर आम, केला, पपीता और खरबूजा जैसे फल एक मीठी, सौंधी और ताजगी भरी महक छोड़ते हैं। यदि बाजार में कोई फल देखने में तो बाहर से पूरी तरह पका हुआ प्रतीत हो रहा हो, लेकिन उसे करीब से सूंघने पर उसमें से कोई विशेष भीनी खुशबू न आए, तो पूरी आशंका है कि उसे पकाने में रसायनों का दखल रहा है। रासायनिक प्रक्रिया फल के छिलके का रंग तो बदल देती है, परंतु उसकी नैसर्गिक सुगंध पैदा नहीं कर पाती।
गूदे की कठोरता और अंदरूनी हिस्से का कच्चापन
अक्सर रासायनिक रूप से उपचारित फल बाहर से तो तैयार और पके हुए जान पड़ते हैं, लेकिन अंदर से उनके पकने की रफ्तार रुक जाती है। जब आप ऐसे आम, पपीते या केले को घर लाकर काटते हैं, तो उनका गूदा अंदर से सख्त, सूखा या रंग में फीका नजर आता है। प्राकृतिक फल भीतर से बाहर तक समान रूप से नरम और रसदार होते हैं। यदि गूदा असमान बनावट का दिखे या बीच में से कच्चा निकले, तो यह स्पष्ट करता है कि फल को जबरन पकाया गया था।
स्वाद और मिठास में आने वाला अंतर
फल के प्राकृतिक मिठास और रस के संतुलन से भी उसकी गुणवत्ता तुरंत समझ आ जाती है। प्राकृतिक धूप में पके फल जबान पर रखते ही भरपूर रस और संतुलित मिठास का अहसास कराते हैं। वहीं रसायनों के प्रभाव में आए फलों का स्वाद फीका, अजीब सा या कम मीठा होता है। कई बार ऐसे फलों में रस की भारी कमी होती है और वे चबाने में बेजान महसूस होते हैं।
जरूरत से ज्यादा चमक से सावधान रहें और जरूरी एहतियात बरतें
खरीदारी करते समय अत्यधिक चमकदार और बेदाग दिखने वाले फलों के जाल में फंसने से बचना चाहिए। हालांकि हर चमकदार फल रासायनिक नहीं होता, फिर भी अप्राकृतिक चमक अक्सर कृत्रिम प्रक्रियाओं की ओर इशारा करती है। प्राकृतिक फलों पर हल्के-फुल्के दाग या रंग का मामूली अंतर होना बिल्कुल स्वाभाविक प्रक्रिया है। अपनी टोकरी भरते समय इन जरूरी बातों का पालन अवश्य करें
- फल सदैव किसी जाने-पहचाने और विश्वसनीय स्थानीय विक्रेता से ही खरीदें।
- बेमौसम बिकने वाले फलों की जगह वर्तमान मौसम के ताजे फलों को प्राथमिकता दें।
- असामान्य रूप से बहुत सस्ते दामों में मिल रहे या अस्वाभाविक रूप से चमकते फलों को खरीदने से परहेज करें।
- फलों को खाने से पहले साधारण नल के साफ पानी से अच्छी तरह धोना कभी न भूलें।
- सतह से रासायनिक अंश साफ करने के लिए फलों को नमक अथवा बेकिंग सोडा मिले पानी में कुछ मिनट भिगोकर रखें और फिर दोबारा धो लें।
















