अक्सर देखा जाता है कि कई बच्चे किसी के सामने आते ही असहज हो जाते हैं और अपनी बात कहने में भारी झिझक महसूस करते हैं। यह संकोच केवल घर के सदस्यों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शिक्षकों और सहपाठियों के सामने भी वे नजरें चुराने लगते हैं। माता-पिता के लिए अपने बच्चे का ऐसा व्यवहार स्वाभाविक रूप से चिंता की वजह बन जाता है। उन्हें लगने लगता है कि यह झिझक आगे चलकर बच्चे के भविष्य और सामाजिक विकास में रुकावट न बन जाए। हालांकि, मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक स्तर पर यह कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसे सुलझाया न जा सके। सकारात्मक और समझदारी भरी पेरेंटिंग के जरिए बच्चों के भीतर यह भरोसा जगाया जा सकता है कि उनकी आवाज भी उतनी ही अहम है।
संवाद का दायरा बढ़ाएं और राय को सम्मान दें
संकोची स्वभाव को बदलने की पहली सीढ़ी रोजाना की खुली बातचीत है। जब माता-पिता अपने व्यस्त दिनचर्या में से वक्त निकालकर बच्चे के साथ मित्रवत चर्चा करते हैं, तो बच्चे का मानसिक तनाव कम होने लगता है। उससे यह जानने का प्रयास करें कि स्कूल में उसका दिन कैसा रहा, दोस्तों के साथ कौन से खेल खेले गए या उसे किन चीजों में आनंद आता है। बातचीत केवल एकतरफा उपदेश न हो, बल्कि बच्चे को भी अपनी पूरी बात रखने की पूरी आजादी मिलनी चाहिए। उसकी छोटी-छोटी बातों को धैर्य से सुनें और उसकी राय को भी अहमियत दें। जब बच्चे को यह एहसास होता है कि उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुना जा रहा है, तो उसका संकोच अपने आप दूर होने लगता है।
परिणाम से ज्यादा मेहनत और कोशिशों को सराहें
आमतौर पर जब बच्चा किसी परीक्षा में अच्छे अंक लाता है या खेल में जीत दर्ज करता है, तभी उसकी प्रशंसा की जाती है। लेकिन झिझक दूर करने के लिए जरूरी है कि माता-पिता उसके प्रयासों और कड़ी मेहनत की भी खुलकर तारीफ करें। यदि बच्चे ने किसी काम के लिए ईमानदारी से कोशिश की है, तो परिणाम चाहे जो भी रहा हो, उसकी लगन को पहचानें। जब आप बच्चे को यह सिखाते हैं कि सिर्फ जीतना ही सब कुछ नहीं है बल्कि सीखने की ललक अधिक महत्वपूर्ण है, तो उसमें असफलता का डर खत्म हो जाता है और खुद पर भरोसा मजबूत होता है।
गलती होने पर डांटने के बजाय सुधार का अवसर दें
गलतियों पर मिलने वाली तीखी डांट या फटकार बच्चे को अंदर से डरा देती है, जिससे वह अगली बार कुछ भी नया करने या बोलने से पीछे हटने लगता है। जब भी बच्चे से कोई भूल हो, तो उस पर गुस्सा निकालने के बजाय यह समझाएं कि गलतियां सीखने की प्रक्रिया का एक सामान्य हिस्सा हैं। उसे यह विश्वास दिलाएं कि गलती सुधारने का रास्ता हमेशा खुला रहता है। जब घर का माहौल ऐसा होगा जहां गलतियों पर सजा नहीं बल्कि मार्गदर्शन मिलता है, तो बच्चा बिना किसी भय के अपनी बात सामने रखना शुरू कर देगा।
भावनाओं को नजरअंदाज न करें और सुरक्षा का माहौल दें
यदि बच्चा कभी उदास, क्रोधित या डरा हुआ महसूस कर रहा हो, तो उसकी मनःस्थिति को सामान्य मानकर खारिज न करें। बच्चों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि नकारात्मक भावनाएं भी इंसानी स्वभाव का हिस्सा हैं। उन्हें आश्वस्त करें कि वे अपनी हर चिंता और परेशानी बिना किसी संकोच के आपके साथ साझा कर सकते हैं। जब बच्चों को माता-पिता से पूरा भावनात्मक सहारा और सुरक्षा का माहौल मिलता है, तो वे बाहरी दुनिया के सामने भी खुलकर और निडर होकर पेश आने लगते हैं।



















