बिहार के बेगूसराय जिले में केले की खेती से निकलने वाले जैविक कचरे का बेहतरीन सदुपयोग सामने आया है। आमतौर पर फल तोड़ने और पौधों से रेशा निकालने के बाद तने के अवशेष खेतों में यूं ही फेंक दिए जाते हैं, लेकिन अब इसी कचरे को खास प्रक्रिया से गुजारकर पोषक तत्वों से भरपूर वर्मी कंपोस्ट में बदला जा रहा है। यह जैविक खाद खेतों में रासायनिक उर्वरकों जैसे यूरिया और NPK के असरदार विकल्प के तौर पर उभरी है। केले के पौधे की यह विशेषता मानी जाती है कि इसके फल, तने से लेकर जड़ों तक हर हिस्से का अलग-अलग रूपों में लाभकारी उपयोग संभव है।
फाइबर प्रोसेसिंग के बाद बचे अवशेषों का पुनर्चक्रण
केले के तनों से प्राकृतिक रेशा निकालने वाली इकाइयों में भारी मात्रा में बायो-वेस्ट या जैविक अपशिष्ट उत्पन्न होता है। राकेश कुमार के अनुसार, प्रसंस्करण के दौरान निकलने वाले इस ढेर को बेकार समझकर फेंकने के बजाय सही तरीके से संसाधित किया जाए तो यह उत्कृष्ट वर्मी कंपोस्ट का आधार बन जाता है। इस कचरे से तैयार खाद को कृषि उत्पादन और मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए अत्यंत गुणकारी माना गया है। रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने के उद्देश्य से केले के बागानों के साथ-साथ अन्य पारंपरिक फसलों और घरेलू बागवानी में भी इसका उपयोग किया जा रहा है। टिकाऊ खेती और जैविक उत्पादों के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते स्थानीय बाजार में इस जैविक खाद की मांग लगातार बढ़ रही है।
45 दिनों में तैयार होती है उच्च गुणवत्ता वाली वर्मी कंपोस्ट
केले के अपशिष्ट से परिपक्व केंचुआ खाद बनाने का चक्र लगभग 45 दिनों में पूरा होता है। इसे व्यवस्थित चरणों में अंजाम दिया जाता है ताकि खाद की गुणवत्ता और पोषक तत्व बरकरार रहें
- प्रारंभिक चरण: सबसे पहले एकत्र किए गए केले के गीले कचरे को लगभग 15 दिनों तक खुली धूप में रखा जाता है। इस अवधि में सामग्री में आवश्यक तापमान और ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिससे अतिरिक्त नमी सूखती है और अपशिष्ट आगे के अपघटन के लिए उपयुक्त बनता है।
- केंचुआ अपघटन चरण: धूप में उपचारित सामग्री को वर्मी कंपोस्ट बेड में स्थानांतरित किया जाता है, जहां केंचुओं की मदद से जैव अपघटन की मुख्य प्रक्रिया पूरी की जाती है।
- छनाई और अंतिम तैयारी: लगभग 45 दिनों की कुल अवधि समाप्त होने पर खाद को छानकर बारीक और शुद्ध रूप में अलग किया जाता है। फिल्ट्रेशन की इस प्रक्रिया से अवांछित रेशे छंट जाते हैं और इस्तेमाल के लिए तैयार दानेदार खाद प्राप्त होती है।
व्यावसायिक खेती से लेकर घरों की बालकनी तक उपयोग
राकेश कुमार का कहना है कि तैयार वर्मी कंपोस्ट बहुउद्देश्यीय है और इसका उपयोग बड़े कृषि जोतों से लेकर छोटे आवासीय परिसरों तक किया जा सकता है। वर्तमान में शहरी और ग्रामीण इलाकों में गृह बागवानी का रुझान तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। नागरिक अपने मकानों की छतों, बालकनियों और लॉन में गमलों के भीतर हरी सब्जियां, सजावटी पौधे और मौसमी फूल उगा रहे हैं। गमलों की सीमित मिट्टी में रासायनिक खाद डालने से मिट्टी के जलने का खतरा रहता है, इसलिए इस प्रकार की जैविक खाद उनके लिए सबसे सुरक्षित विकल्प बनकर सामने आई है। इसके अलावा जो किसान रासायनिक खेती से जैविक खेती की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, उनके लिए भी यह खाद रासायनिक खादों के साथ या स्वतंत्र रूप से इस्तेमाल करने का एक मजबूत माध्यम बनी है।
मूल्य निर्धारण और बाजार में आय की संभावनाएं
केले के कचरे से खाद बनाने का मॉडल कृषि अपशिष्ट प्रबंधन के साथ-साथ ग्रामीण रोजगार और अतिरिक्त कमाई का मजबूत जरिया बन चुका है। राकेश कुमार के अनुसार, इस कंपोस्ट की थोक बाजार में कीमत ₹7 से ₹12 प्रति किलोग्राम के बीच दर्ज की गई है। वहीं खुदरा बाजार में छोटे पैकेटों में यह खाद लगभग ₹15 प्रति किलोग्राम की दर से आसानी से बिकती है। बाजार की खपत संरचना को देखें तो इसके दो मुख्य ग्राहक वर्ग स्पष्ट दिखाई देते हैं। पहला वर्ग उन प्रगतिशील किसानों का है जो खेतों की उर्वरता बढ़ाने के लिए थोक में जैविक खाद खरीदते हैं। दूसरा वर्ग शहरों और कस्बों के उन शौकिया बागवानों का है जो बालकनी और गमलों के लिए खुदरा दरों पर गुणवत्तापूर्ण खाद की तलाश में रहते हैं। इस प्रकार एक बेकार समझा जाने वाला तना आर्थिक मूल्य उत्पन्न करने वाली संपत्ति में बदल रहा है।




















