हल्की ठंडक की आहट के साथ ही सितंबर का महीना घर पर बागवानी करने वालों के लिए सबसे मुफीद वक्त लेकर आता है। इस दौरान वातावरण में तेज गर्मी का असर कम होने लगता है और सुबह तथा शाम के समय मौसम काफी खुशनुमा हो जाता है। यह ऐसा अनुकूल समय होता है जब मिट्टी में बोए गए बीज बिना किसी बाधा के बहुत तेजी से अंकुरित होने लगते हैं। अगर किसी को अपने घर में ही ताजी और कीटनाशकरहित सब्जियां पैदा करने की इच्छा है, तो इसकी बुनियादी तैयारी इसी महीने से शुरू कर देनी चाहिए। इसके लिए किसी बड़े खेत या विस्तृत जमीन की कतई दरकार नहीं होती, बल्कि घर की बालकनी या छत के किसी छोटे से कोने में भी व्यवस्थित क्यारी बनाई जा सकती है।
सही जगह और धूप की मौजूदगी की पहचान
घर में सब्जी उगाने के पूरे सिलसिले में सबसे पहला कदम एक सटीक स्थान का चुनाव करना होता है। किसी भी पौधे की सेहतमंदी के लिए यह बेहद जरूरी है कि उसे रोजाना कम से कम 4 से 6 घंटे की सीधी प्राकृतिक धूप मिलती रहे। जिन घरों में कच्ची जमीन या आंगन का खुला हिस्सा नहीं है, वे गमलों, बड़े ग्रो बैग अथवा लकड़ी के मजबूत बक्सों का इस्तेमाल कर सकते हैं। इन सभी बर्तनों के तल में अतिरिक्त पानी की निकासी के लिए छेद का होना सबसे बुनियादी शर्त है। यदि पानी निकलने की जगह बंद हो या वहां जमाव बना रहे, तो पौधों की जड़ें भीतर ही भीतर सड़ सकती हैं। इसलिए किसी भी तरह की बुवाई से पहले सही आकार के कंटेनर और धूप वाली जगह का बंदोबस्त कर लेना चाहिए।
मिट्टी की संरचना और उर्वरक का संतुलन
सर्दियों की क्यारी की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि उसके लिए मिट्टी किस तरह तैयार की गई है। सामान्य उपजाऊ मिट्टी के साथ बराबर अनुपात में कंपोस्ट या पुरानी जैविक खाद मिलाना मिट्टी को पोषण से भरपूर बना देता है। यह मिश्रण मिट्टी को भुरभुरा बनाए रखता है, जिससे जड़ों को फैलने और हवा लेने में आसानी होती है। भारी और सख्त मिट्टी के मामले में उसमें थोड़ी बालू रेत या कोकोपीट मिला देने से उसकी बनावट हल्की और जल निकासी के अनुकूल हो जाती है। बीजों को डालने से पूर्व पूरी मिट्टी को खुरपी से उलट-पलट लेना चाहिए, ताकि पुरानी सूखी जड़ें, कंकड़ और अनचाही घास पूरी तरह बाहर निकल जाएं और नए अंकुरों को पनपने के लिए साफ जमीन मिल सके।
हरी पत्तेदार सब्जियों की बुवाई और देखरेख
सितंबर के दिनों में पालक, मेथी और हरी धनिया की खेती बहुत आसानी से शुरू की जा सकती है। इस किस्म की पत्तेदार फसलों की जड़ें ज्यादा गहराई तक नहीं जातीं, इसलिए इनके लिए बहुत गहरे बर्तनों की जरूरत नहीं पड़ती। बीजों को डालते समय ध्यान रखना चाहिए कि वे मिट्टी में बहुत नीचे न दबें, बल्कि बीजों पर मिट्टी की एक बेहद पतली परत ही बिछाई जाए। शुरुआती दिनों में नमी बनाए रखना आवश्यक होता है, लेकिन पानी का छिड़काव इतना ही करें कि मिट्टी नम रहे, न कि दलदली बन जाए। कुछ ही दिनों के भीतर बीजों से छोटे-छोटे हरे अंकुर बाहर झांकने लगते हैं और क्यारी में हरियाली दिखने लगती है।
जड़ वाली सब्जियों के लिए गहरी मिट्टी का प्रबंध
मूली और गाजर उगाने की तकनीक पत्तेदार सब्जियों से काफी अलग होती है, क्योंकि इनका खाने योग्य हिस्सा जमीन के भीतर बढ़ता है। इसके लिए गहरे गमले या लंबे ग्रो बैग की आवश्यकता होती है, जिसमें मिट्टी पूरी तरह नरम और कंकड़-पत्थर से मुक्त हो। यदि मिट्टी में कठोर ढेले या पत्थर मौजूद होंगे, तो गाजर और मूली की जड़ें टेढ़ी-मेढ़ी हो जाएंगी और उनका समुचित विकास रुक जाएगा। बुवाई के उपरांत हल्का पानी छिड़कना चाहिए और सतह को सूखने से बचाना चाहिए। जब नन्हे पौधे बाहर निकल आएं और उनके बीच भीड़ ज्यादा दिखे, तो कमजोर पौधों को सावधानी से उखाड़कर अलग कर देना चाहिए ताकि स्वस्थ पौधों को जड़ फैलाने का खुला दायरा मिल सके।
मटर के पौधे और शलजम के लिए विशेष व्यवस्था
मटर की फसल को क्यारी में जगह देने के लिए थोड़ी अतिरिक्त तैयारी करनी पड़ती है। मटर की प्रकृति बेलदार होती है और वह ऊपर की दिशा में सहारा पाकर बढ़ती है। इसलिए बुवाई के साथ ही पौधे के सहारे के लिए बांस की खपच्ची, मजबूत लकड़ी या सुतली की जाली पहले से ही लगा देनी चाहिए। बीजों को उपयुक्त नमी वाली मिट्टी में रोपें और पानी की अधिकता से बचें, क्योंकि अधिक गीलापन बीजों को सड़ा देता है। एक बार जब बेल मजबूत होने लगे, तो उसे सहारे पर चढ़ा देने से वह बेहद कम जगह घेरकर ऊपर फैलने लगती है। इसी प्रकार शलजम की बुवाई करते समय पैकेट पर लिखी दूरी और निर्देशों का पालन करना चाहिए। पौधों को परस्पर बहुत सटाकर लगाने से उनमें धूप और पोषण की कमी हो जाती है, साथ ही क्यारी में समय-समय पर उगने वाले खरपतवार को लगातार साफ करते रहना चाहिए।



















