तेज रफ्तार गाड़ियां, दबदबे की नुमाइश और रास्तों पर अचानक भड़कने वाला गुस्सा अक्सर कई गंभीर हादसों का सबब बनता है। गुरुग्राम में हाल ही में घटी एक घटना ने इसी पहलू को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया, जब सुरक्षा गियर से लैस महिला बाइक सवार सिया अपने समूह के साथ सड़क पर निकली थीं। उसी दौरान कार में सवार पलवल निवासी कल्याण बैंसला से उनका आमना-सामना हुआ। तेज रफ्तार से बगल से गुजरने के बाद पैदा हुआ विवाद इतना बढ़ा कि उसने टकराव का रूप ले लिया। बाद में दिए गए एक साक्षात्कार में कल्याण बैंसला ने दावा किया कि गति को बार-बार घटाकर और बढ़ाकर उकसाया जा रहा था, जबकि उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को महज एक दुर्घटना करार दिया। यह वाकया केवल सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस गहरे मनोवैज्ञानिक सवाल को उजागर करता है जिसे अक्सर पुरुष अहं के रूप में देखा जाता है।
चाहे अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में बड़े फैसलों का टकराव हो या आम सड़कों पर एक-दूसरे से आगे निकलने की जिद, इंसान का आचरण कई बार अपनी छवि को साबित करने की जद्दोजहद से तय होता है। इसे समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि विज्ञान और मनोविज्ञान इस मानसिक ढांचे की व्याख्या किस तरह करते हैं।
पुरुष अहं की मानसिक और सामाजिक परिभाषा
मनोविज्ञान के नजरिए से देखें तो पुरुष अहं कोई बीमारी या चिकित्सीय विकार नहीं है। आम बातचीत में इस शब्द का इस्तेमाल उस वक्त किया जाता है जब किसी पुरुष के आत्मसम्मान, नियंत्रण की भावना, व्यक्तिगत सामर्थ्य या मर्दानगी की सामाजिक छवि के सामने कोई चुनौती खड़ी होती है। वास्तव में यह किसी व्यक्ति द्वारा अपने बारे में बनाई गई वह आंतरिक मानसिक तस्वीर है जिसमें वह खुद को कितना सक्षम, सफल, सम्मानित और मजबूत मानता है।
हर व्यक्ति अपने परिवार, सिनेमा, साहित्य और सामाजिक माहौल के बीच बड़ा होते हुए अपनी एक खास पहचान गढ़ता है। बचपन से ही यह धारणा पुख्ता की जाती है कि उसे घर का संबल बनना है, हमेशा ताकतवर रहना है और समाज में अपनी धाक बनाए रखनी है। जब भी कोई बाहरी परिस्थिति या घटना इस तय सांचे को तोड़ती है अथवा उसे किसी मामले में कमजोर या नाकाम साबित करती है, तो उसकी इसी आत्म-छवि को ठेस पहुंचती है। अहं की भावना किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं होती और यह सभी में मौजूद रहती है, लेकिन सामाजिक अपेक्षाओं के चलते इसे संभालने के तौर-तरीके अलग हो जाते हैं। नियंत्रित रहने पर यही आत्मसम्मान व्यक्ति को निर्णय लेने और आगे बढ़ने की शक्ति देता है, मगर अनियंत्रित होने पर टकराव की वजह बन जाता है।
पहचान पर चुनौती और वैज्ञानिक शोध के नतीजे
जब किसी पुरुष को लगता है कि उसकी क्षमता, ताकत या पारंपरिक भूमिका पर सवाल उठाया जा रहा है, तो मनोविज्ञान में इसे मर्दानगी पर खतरा माना जाता है। यह चुनौती वास्तविक भी हो सकती है और केवल मन का वहम भी। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी काम में किसी महिला से मदद लेनी पड़े या शारीरिक अथवा मानसिक सामर्थ्य पर संदेह जताया जाए, तो कुछ लोग असहज होकर अपनी श्रेष्ठता साबित करने के प्रयास में लग जाते हैं।
इस मनोवैज्ञानिक पहलू की पड़ताल के लिए 123 अलग-अलग प्रयोगों और करीब 19,448 पुरुष प्रतिभागियों के आंकड़ों की समीक्षा की गई थी। इस विस्तृत विश्लेषण में पाया गया कि जब पुरुषों को अपनी पारंपरिक छवि खतरे में नजर आती है, तो उनमें बेवजह जोखिम उठाने, आक्रामक रुख अपनाने, दूसरे समूहों को नीचा दिखाने और वर्चस्ववादी विचारों का समर्थन करने का झुकाव बढ़ जाता है। हालांकि हर व्यक्ति का इस पर प्रतिक्रिया देने का ढंग एक जैसा नहीं होता। कुछ लोग अंदर ही अंदर घुटकर पूरी तरह खामोश हो जाते हैं और अपनी भावनाओं को दबा लेते हैं। कुछ तीखी बहस, गुस्सा और अपनी उपलब्धियों का बार-बार बखान करने लगते हैं। वहीं कुछ लोग सड़क पर बेहद तेज रफ्तार में गाड़ी चलाने, हाथापाई पर उतरने या बिना सोचे-समझे आर्थिक जोखिम लेने जैसी हरकतों के जरिए अपनी ताकत दिखाने की कोशिश करते हैं।
परवरिश और पारंपरिक मान्यताओं का दोहरा असर
इस तरह की मानसिकता को आकार देने में समाज के वे नियम बड़ी भूमिका निभाते हैं जिन्हें पारंपरिक मानदंड कहा जाता है। बचपन से ही लड़कों को यह सिखाया जाता है कि दर्द होने पर रोना कमजोरी है, डरना मना है और घर की तमाम जिम्मेदारियों का बोझ केवल उन्हीं के कंधों पर है। इन अपेक्षाओं के साये में बड़े होने के कारण कई बार हर स्थिति पर पूरा नियंत्रण रखने, लगातार प्रतिस्पर्धा की दौड़ में बने रहने और किसी भी हाल में खुद को कमजोर न दिखने देने की जिद उनके स्वभाव का स्थायी हिस्सा बन जाती है।
हालांकि इन पारंपरिक सामाजिक मान्यताओं का एक सकारात्मक पहलू भी है। ये नियम कई बार कठिन परिस्थितियों में साहस, जिम्मेदारी, अनुशासन और धैर्य जैसे मजबूत मानवीय गुण भी पैदा करते हैं। परेशानी का दौर तब शुरू होता है जब व्यक्ति यह मान बैठता है कि किसी से मदद मांगना, आंसू बहाना, अपनी गलती स्वीकार करना या संवेदनशील होना कमजोरी की निशानी है। शोधों से यह बात भी सामने आई है कि हमेशा खुद को मजबूत दिखाने और भावनाएं छिपाने की यही सख्त भूमिका पुरुषों के मानसिक तनाव को समय रहते पहचानने और जरूरी परामर्श लेने के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बन जाती है।


















