मानसून की विदाई का दौर शुरू होते ही घरों के बगीचों और छतों पर सर्दियों की ताजी फसलें लेने की कवायद तेज हो जाती है। कंटेनर, गमलों या क्यारियों में बागवानी करने वालों के लिए सितंबर का महीना बेहद खास माना जाता है। इस अवधि में सही फसलों का चयन करके समय पर बुवाई और रोपाई कर ली जाए, तो पूरे शीतकाल में घर की छत से ही ताजी और कीटनाशक मुक्त हरी सब्जियां हासिल की जा सकती हैं।
फूलगोभी की रोपाई और सही तापमान का ध्यान
सर्दियों के भोजन की प्रमुख पहचान मानी जाने वाली फूलगोभी की पौध रोपाई के लिए अगस्त और सितंबर के हफ्तों को सबसे अनुकूल माना गया है। वरिष्ठ उद्यानिकी विभाग अधिकारी प्रतिक्षा मिश्रा के अनुसार, फूलगोभी की तैयारी इसी समय से शुरू कर देनी चाहिए, क्योंकि इसके पौधों को 15 से 25 डिग्री सेल्सियस के बीच का शीतल वातावरण पसंद आता है। यदि इस दौर में समय पर पौधे लगा दिए जाएं, तो ठंड का आगमन होते-होते फसल पूरी तरह विकसित होकर फलने-फूलने लगती है।
मिट्टी का चुनाव और पौधों के बीच फासला
उत्तम उत्पादन प्राप्त करने के लिए मिट्टी की प्रकृति पर विशेष ध्यान देना चाहिए। फूलगोभी के लिए हल्की बलुई दोमट मिट्टी बेहतरीन मानी जाती है, जिसमें से अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल सके। खेत हो या फिर छत पर रखे बड़े गमले और ग्रो बैग, पौधों के मध्य लगभग 40 से 50 सेंटीमीटर का फासला छोड़ना अनिवार्य है। ऐसा करने से पौधों को फैलने के लिए पर्याप्त विस्तार, धूप और शुद्ध हवा की आवाजाही उपलब्ध हो पाती है।
गाजर, मूली, पत्ता गोभी और पालक की बुवाई
कंद वाली सब्जियों में गाजर और मूली को भी इस मौसम में बड़े आराम से ग्रो बैग या गमलों में उगाया जा सकता है। गाजर के बीज डालने के तकरीबन 15 दिनों के भीतर छोटे पौधे अंकुरित होकर दिखने लगते हैं, जबकि पूरी तरह फसल को पकने में 80 से 90 दिन का वक्त लग जाता है। इसके विपरीत, मूली बहुत जल्द तैयार होने वाली फसल है। क्यारियों या बर्तनों में सीधे बीज डालकर इसे चरणबद्ध तरीके से बोया जाए, तो लंबे समय तक रसोई के लिए ताजी मूली मिलती रहती है। इसके अतिरिक्त पत्ता गोभी की नर्सरी तैयार कर सही वक्त पर रोपाई करनी चाहिए, जबकि पालक बेहद आसानी से उगने वाली सब्जी है जिसकी पत्तियों को बार-बार काटकर ताजा इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
नमी का लाभ और जलजमाव से बचाव
सितंबर माह में बारिश के चलते जमीन में प्राकृतिक नमी बनी रहती है, जो बीजों के तेजी से अंकुरण में सहायक सिद्ध होती है। इसके बावजूद सबसे अहम सावधानी जलभराव को रोकने की है। गमले, क्यारी अथवा क्यारीनुमा संरचना में पानी ठहरने से जड़ों में सड़न की समस्या पैदा हो सकती है, जिससे पौधे नष्ट हो सकते हैं। इसी कारण से बुवाई शुरू करने से पहले मिट्टी की गुड़ाई और जल निकासी के पुख्ता प्रबंध करना बेहद आवश्यक है।

















