बिहार के शहरी क्षेत्रों में लगातार हो रहे विस्तार की वजह से रिहायशी इलाकों में खेती और बागवानी के लिए खाली जमीन का दायरा घटता जा रहा है। इस स्थिति में मकान की खुली छत को एक व्यवस्थित रूफटॉप गार्डन के रूप में तैयार करके घरेलू जरूरत के लिए सब्जियां, मौसमी फल, ताजे मसाले और औषधीय पौधे आसानी से उपजाए जा सकते हैं। सही देखभाल और प्रबंधन के साथ टमाटर, हरी मिर्च, बैंगन, भिंडी, लौकी, करेला, खीरा, पालक, हरा धनिया और मेथी जैसी नियमित हरी सब्जियों की पैदावार ली जा सकती है। इसके अतिरिक्त उचित आकार के बर्तनों में अमरूद, नींबू तथा पपीता जैसे फल देने वाले छोटे पेड़ भी सफलता से विकसित किए जा सकते हैं।
रूफटॉप फार्मिंग के लिए अनुकूल परिस्थितियां
गया जिले में मौजूद दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय के कृषि विभाग ने छत पर पौधों के रोपण और प्रबंधन का एक विशेष मॉडल स्थापित किया है, जिसके तहत कई प्रकार की बागवानी फसलों को उगाया जा रहा है। कृषि विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ पंकज कुमार राय के मुताबिक जो लोग अपनी छत पर पौधों की खेती शुरू करना चाहते हैं, उन्हें सबसे पहले ऐसी छत का चुनाव करना चाहिए जहां हर दिन कम से कम 5 से 7 घंटे की सीधी धूप पहुंचती हो। पौधों के स्वस्थ विकास और प्रकाश संश्लेषण के लिए यह धूप अनिवार्य होती है। इसके साथ ही छत की सतह पर पानी की निकासी यानी ड्रेनेज का पूरा बंदोबस्त होना आवश्यक है, जिससे बरसात के मौसम में अतिरिक्त पानी छत पर रुके बिना नालियों से तुरंत बाहर बह सके।
कंटेनर चुनाव और ड्रेनेज से जुड़ी सावधानियां
छत पर बागवानी करते समय शुरुआती स्तर पर सबसे आम भूल ऐसे बर्तनों या गमलों का उपयोग करना होती है जिनमें पानी निकलने का कोई रास्ता नहीं होता। हर कंटेनर के निचले हिस्से में पर्याप्त संख्या में छेद होने चाहिए, ताकि सिंचाई या बारिश का गैर-जरूरी पानी बाहर जा सके। बर्तनों में जमा रहने वाला पानी मिट्टी में हवा का संचार रोक देता है, जिसके परिणामस्वरूप पौधों की जड़ें गलने लगती हैं और उनमें घातक फफूंद का संक्रमण फैल जाता है। इसके अलावा छत की मजबूती और भार क्षमता को ध्यान में रखते हुए भारी वजन वाले सीमेंट के गमलों की बहुत बड़ी तादाद से बचना चाहिए। सीमेंट के गमलों के विकल्प के रूप में जरूरत के अनुसार हल्के ग्रो बैग और प्लास्टिक के हल्के कंटेनर का चयन करना ज्यादा सुरक्षित उपाय है। कंटेनर केवल मिट्टी भरने का साधन नहीं है, बल्कि उसका आकार, सामग्री, जल निकासी और कुल भार पौधों के पनपने की प्रक्रिया को सीधा प्रभावित करते हैं।
मिट्टी का मिश्रण और पौधों की रोपाई का तरीका
कंटेनर में भरने के लिए सही पोषक माध्यम तैयार करना बहुत महत्वपूर्ण है। इसके लिए 2 भाग कोकोपीट, एक भाग केंचुआ खाद यानी वर्मी कंपोस्ट और एक भाग उपजाऊ मिट्टी को अच्छी तरह आपस में मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है, जिसे कंटेनर में भरा जाना चाहिए। यदि लौकी, करेला या खीरे जैसी लताओं वाली बेलें लगानी हैं, तो उनके बीजों को सीधे बड़े ग्रो बैग में बोया जा सकता है। वहीं बैंगन या मिर्च जैसी फसलों के छोटे पौधे तैयार करने के लिए पहले अलग से नर्सरी बनाई जानी चाहिए। नर्सरी में पौधे तैयार होने के 20 से 25 दिनों बाद उन्हें बड़े कंटेनर में रोपा जा सकता है। पौधों को हमेशा ग्रो बैग के फैलाव और आकार के अनुकूल ही लगाना चाहिए। रोपाई पूरी होने के बाद समय-समय पर इस बात की नियमित निगरानी करनी चाहिए कि मिट्टी में नमी संतुलित रहे और जरूरत से ज्यादा पानी न दिया जाए।
पोषण, सुरक्षा और समय पर तुड़ाई
नियमित जांच के दौरान पौधों की पत्तियों के रंग पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए ताकि यदि पत्तियां पीली पड़ रही हों या किसी कीट व रोग के लक्षण दिखें, तो उनके मुताबिक आवश्यक दवाओं का छिड़काव किया जा सके। छत के लिए हमेशा ऐसे पौधों का चयन करना समझदारी है जो सीमित कंटेनर में आसानी से बढ़ सकें, जिनकी जड़ें बहुत ज्यादा गहराई तक न जाती हों और जिन्हें सीमित स्थान में नियंत्रित रखा जा सके। जब पौधों में फल लगना शुरू हो जाए, तो उनके पूरी तरह पकते ही तुरंत तुड़ाई कर लेनी चाहिए। समय पर तुड़ाई करने से पौधे को नई ऊर्जा मिलती है और उसके बाद शाखाओं पर आने वाले नए फल भी स्वस्थ तथा पुष्ट होते हैं। इसके साथ ही पौधों में फलों की संख्या और पैदावार में वृद्धि के लिए नियमित अंतराल पर वर्मी कंपोस्ट और नीम की निर्धारित मात्रा का प्रयोग पोषण देने के लिए किया जाना चाहिए।


















