जरा कल्पना कीजिए कि गर्मियों की छुट्टियों के दौरान बच्चे अपने दोस्तों के साथ खेलने या गैजेट्स का आनंद लेने के बजाय खेतों में पसीना बहा रहे हैं। उनके हाथों में मिट्टी लगी हुई है, वे भारी काम कर रहे हैं और किसी भी तरह अपने घर वापस जाने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। सुनने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, लेकिन चीन में इन दिनों कुछ बच्चों की छुट्टियां कुछ इसी तरह से बीत रही हैं। चीन में हार्डशिप समर कैंप यानी कठिन परिस्थितियों का सामना करने वाले कैंप बहुत तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इन कैंपों में माता-पिता खुद अपने बच्चों को भेज रहे हैं ताकि वे कृषि और शारीरिक श्रम के जरिए मेहनत का असली मूल्य समझ सकें और अपने परिवार द्वारा दी जा रही सुविधाओं की कद्र करना सीख सकें।
चीन के सिचुआन, गुइझोउ और युन्नान जैसे क्षेत्रों में इन कैंपों का मुख्य रूप से आयोजन किया जा रहा है। इन जगहों पर बच्चों को पूरी तरह से ग्रामीण जीवन शैली का अनुभव कराया जाता है। कैंप में पहुंचते ही बच्चों के मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान जमा करा लिए जाते हैं। इसके अलावा, बच्चों को मिलने वाली रोजमर्रा की सुविधाएं और जरूरत का सामान भी उनके द्वारा किए गए काम के आधार पर ही तय किया जाता है। सोशल मीडिया पर इस तरह के कई वीडियो तेजी से वायरल हो चुके हैं, जिनमें बच्चे रोते हुए नजर आते हैं और अपने घर लौटने की गुहार लगाते दिखाई देते हैं। कुछ बच्चे तो यहां तक कहते हैं कि वे घर पर चुपचाप पढ़ाई करने को तैयार हैं, बस उन्हें खेती के इन कठिन कामों से मुक्ति दिला दी जाए।
इन कैंपों में बच्चों से कौन-कौन से काम कराए जाते हैं?
इन अनूठे कैंपों के दौरान बच्चों से आलू खोदने और उन्हें बाजार में बेचने, पेड़ों की छाल उतारने तथा सूअरों को चारा खिलाने जैसे तमाम ग्रामीण काम कराए जाते हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन तमाम कठिन कामों को करने के लिए बच्चों को कोई पारिश्रमिक नहीं मिलता है, बल्कि इसके उलट माता-पिता को अपनी जेब से भारी रकम चुकानी पड़ती है। इन कैंपों में केवल 10 दिन बिताने के लिए माता-पिता को 4,000 युआन यानी भारतीय मुद्रा में लगभग 58,000 रुपये से अधिक का शुल्क देना होता है। वहीं अगर कोई बच्चा पूरे एक महीने तक इस कैंप में रहता है, तो उसके रहने की फीस 10,000 युआन से भी अधिक हो सकती है। इन जगहों पर नियम भी बेहद कड़े रखे जाते हैं। यदि कोई बच्चा अपने हिस्से का काम समय पर पूरा नहीं कर पाता है, तो उसे सजा के तौर पर केवल उबले या सादे आलू खाने के लिए दिए जाते हैं।
माता-पिता आखिर क्यों भेज रहे हैं अपने बच्चों को?
इन कैंपों का संचालन करने वालों का तर्क है कि इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को यह अहसास कराना है कि असल जिंदगी में धन कमाना और रोजमर्रा के खर्चे चलाना कितना चुनौतीपूर्ण होता है। आधुनिक युग में शहरों में रहने वाले कई बच्चों को बेहद आरामदायक जीवनशैली मिलती है, जिसके कारण वे मेहनत की सच्चाई से कोसों दूर रहते हैं। इन कैंपों की गतिविधियों के तहत कई बार बच्चों से अपने माता-पिता के नाम पर भावनात्मक चिट्ठियां भी लिखवाई जाती हैं। इन पत्रों और वीडियो को देखकर कई अभिभावक भावुक हो जाते हैं और अन्य लोगों को भी ऐसे कैंपों का हिस्सा बनने की सलाह देते हैं। हालांकि, हर माता-पिता का अनुभव एक जैसा नहीं रहा है। एक पिता ने साझा किया कि उनकी बेटी पूरे कैंप के दौरान लगातार शिकायतें करती रही, लेकिन अंत में उसे खेतों में काम करना थोड़ा बहुत रास आने लगा। वहीं शंघाई शहर की एक मां ने बताया कि 10 दिन के कड़े कैंप के बाद भी उनकी सात साल की बेटी की कुछ पुरानी आदतें नहीं बदलीं, लेकिन वे इस बात से संतुष्ट थीं कि उनकी बेटी ने अपनी आरामदायक दुनिया से बाहर निकलकर कुछ नया और अलग अनुभव हासिल किया।
इस अनोखे ट्रेंड पर शुरू हो गई है तीखी बहस
इन कड़े समर कैंपों के चलन में आने के बाद समाज में एक लंबी बहस भी छिड़ गई है। एक वर्ग का ऐसा मानना है कि बच्चों को जीवन की कुछ कठिनाइयों का सामना जरूर करना चाहिए ताकि वे अपने पास मौजूद सुविधाओं का महत्व समझ सकें। दूसरी ओर, आलोचकों की चिंताएं भी कम गंभीर नहीं हैं। उनका साफ तौर पर कहना है कि बच्चों पर इस तरह से जरूरत से ज्यादा शारीरिक और मानसिक दबाव डालना उनके समग्र विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।



















