भारतीय रसोई का अभिन्न अंग और बदलती उत्पादन प्रक्रिया
सरसों का तेल भारतीय रसोई का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, जिसका उपयोग केवल खाना पकाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों की मालिश और अन्य कई घरेलू कार्यों में भी यह सहायक होता है. आयुर्वेद के विशेषज्ञ और डॉक्टर भी इसके उपयोग की सलाह देते हैं. हालांकि, समय के साथ उत्पादन के तरीकों में बड़ा बदलाव आया है. बढ़ती आबादी की मांग को पूरा करने के लिए आधुनिक मशीनें कम समय और मानव शक्ति में अधिक तेल का उत्पादन करती हैं, जिससे प्राचीन, धीमी गति वाली परंपराएं लगभग खत्म हो गई हैं.
बिहार में जीवित एक अनूठी परंपरा
इस आधुनिक दौर में भी बिहार का एक हिस्सा अपनी प्राचीन विरासत को संजोए हुए है. जहानाबाद जिला मुख्यालय के पास मल्लहचक मोड़ पर आज भी बैल कोल्हू से सरसों का तेल निकाला जाता है. यह विधि गर्मियों में कम और सर्दियों में अधिक प्रचलित होती है, जहां दिनभर पारंपरिक तरीके से तेल पेराई का काम चलता है. राम रतन साव का परिवार कई सदियों से इस कार्य से जुड़ा हुआ है और उनके घर पर ही यह बैल कोल्हू लगा हुआ है.
मशीनी तेल बनाम बैल कोल्हू का तेल: मूल्य और गुणवत्ता
राम रतन साव बताते हैं कि आज मशीनों का दौर है, जिसने कई पुरानी परंपराओं को विलुप्त कर दिया है. एक समय था जब उनके स्थान पर आधा दर्जन बैल मिलकर दिनभर में क्विंटल भर तेल निकालते थे, लेकिन अब केवल एक ही बैल बचा है, जिसका उपयोग सरसों के साथ-साथ अन्य प्रकार के तेल निकालने के लिए भी किया जाता है. बैल कोल्हू से निकले तेल की गुणवत्ता और शुद्धता के कारण इसका बाजार मूल्य काफी अधिक होता है. जहां साधारण मशीनी सरसों का तेल लगभग ₹200 प्रति किलो बिकता है, वहीं बैल कोल्हू से निकला तेल बाजार में ₹400 प्रति किलो और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर तो ₹500 प्रति किलो तक पहुंच जाता है.
स्वास्थ्य लाभ और आयुर्वेदिक सिफारिशें
इस उच्च कीमत का मुख्य कारण तेल की उत्पादन प्रक्रिया और उसके स्वास्थ्य लाभ हैं. राम रतन साव के अनुसार, मशीनों से तेल निकालते समय गर्मी उत्पन्न होती है, जिससे सरसों के अधिकांश प्राकृतिक गुण नष्ट हो जाते हैं. इसके विपरीत, बैल कोल्हू धीमी गति से चलता है और तेल को गर्म नहीं होने देता, जिससे सरसों के सभी पोषक तत्व और औषधीय गुण बरकरार रहते हैं. यही कारण है कि आयुर्वेद के कई डॉक्टर बैल कोल्हू से निकले सरसों के तेल का उपयोग करने की सलाह देते हैं, क्योंकि यह शरीर के लिए अधिक फायदेमंद होता है.
सीमित उत्पादन और बढ़ती मांग
यह पारंपरिक विधि धीमी होती है, जिससे उत्पादन भी सीमित रहता है. गर्मियों के दौरान, दिनभर की मेहनत से लगभग 4 किलो तेल निकलता है, जो घंटों में ही बिक जाता है. सर्दियों में यह उत्पादन बढ़कर लगभग 8 किलो तक पहुंच जाता है. यह दर्शाता है कि शुद्ध और पारंपरिक रूप से तैयार किए गए उत्पादों की मांग आज भी बनी हुई है और लोग इनकी गुणवत्ता के लिए अधिक कीमत चुकाने को भी तैयार हैं.













