आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की खोज से हिला कंप्यूटर साइंस, एक्सपोनेंशियल टाइम हाइपोथिसिस पर उठे सवाललाइव: चक्रवात अर्णब का ओडिशा और आंध्र प्रदेश में भारी तांडव, 55 हजार से अधिक लोग सुरक्षित स्थानों पर शिफ्टहजारों साल पुराना है कंडोम का इतिहास, कभी भेड़ की आंत और कछुए के खोल से तैयार होते थे ये कवरपेरेंट्स की ये 5 गलतियां घर में बढ़ाती हैं भाई-बहनों के बीच मनमुटाव, ताउम्र रिश्तों में आ जाती है कड़वाहटरिवाइव हुआ समझौता: वोक्सवैगन ग्रुप के साथ एआई असिस्टेंट साझा करेगी रिवियनडोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद कैसे बढ़ी ट्रांसजेंडर बच्चों के माता-पिता की मानसिक चिंता?स्पेन ट्रेन हादसा: 69 लोगों की मौत, युवा एथलीट और पूर्व मंत्री भी शामिलनीट-यूजी और नेट विवादों के साये में एनटीए का कायापलट, सीआईएसएफ को सौंपी गई सुरक्षा और हटाए गए 600 विशेषज्ञराशिद खान ने टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में रचा नया इतिहास, बने 200 विकेट लेने वाले दुनिया के पहले गेंदबाजद डेविल्स रिव्यू (2026): कैसे आधी सदी पुराना कल्ट क्लासिक इस हेलोवीन सीजन का सबसे बड़ा सिनेमाई धमाका बन गया
पूजा से लेकर खेत तक: उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में चीड़ की राख का सदियों पुराना इस्तेमालजीवनशैली
22 जुल॰ 2026, 10:20 am (100 दिन पहले)· 2

पूजा से लेकर खेत तक: उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में चीड़ की राख का सदियों पुराना इस्तेमाल

उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में चीड़ की लकड़ी जलाने के बाद बची राख सिर्फ कचरा नहीं, बल्कि पेट के कीड़ों के घरेलू नुस्खे से लेकर खेत की खाद, पूजा-पाठ और बर्तन साफ करने तक हर काम में बरसों से इस्तेमाल होती आ रही है.

पहाड़ के गांवों में चीड़ की लकड़ी जलाने के बाद बचने वाली राख महज कचरा नहीं, बल्कि सदियों से रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा रही है. उत्तराखंड के कई इलाकों में इसी राख से पेट के कीड़े भगाने की कोशिश की जाती है, खेतों को खाद दी जाती है, देवी-देवताओं की पूजा में तिलक लगाया जाता है और बर्तन भी चमकाए जाते हैं.

पेट दर्द और कीड़ों के लिए घरेलू नुस्खा

पहाड़ के कई गांवों में चीड़ की लकड़ी से बनी साफ राख को परंपरागत तरीके से खाया जाता रहा है, ऐसा माना जाता है कि इससे पेट के कीड़ों से राहत मिलती है. यह नुस्खा बुजुर्गों के बरसों के अनुभव से चला आ रहा है, न कि किसी वैज्ञानिक शोध से. आज मेडिकल साइंस में पेट के कीड़ों के लिए सुरक्षित और असरदार दवाएं मौजूद हैं, जबकि चीड़ की राख को इलाज के तौर पर अब तक कोई वैज्ञानिक मान्यता नहीं मिली है. यही वजह है कि डॉक्टर की सलाह के बिना इस राख का सेवन करने से बचना चाहिए.

ये भी पढ़ें

खेत की मिट्टी सुधारने वाली खाद

गांवों में किसान चीड़ की राख को सिर्फ खेतों में ही नहीं, घर के किचन गार्डन में भी खाद के तौर पर डालते हैं. इस राख में पोटाश और कैल्शियम जैसे खनिज मौजूद होते हैं, जो मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर करने में मदद करते हैं. कई किसान इसे गोबर की खाद में मिलाकर खेतों में इस्तेमाल करते हैं. यह राख मिट्टी की अम्लीयता कम करने में भी कारगर मानी जाती है, लेकिन इसकी मात्रा ज्यादा हो जाए तो मिट्टी का संतुलन बिगड़ने का खतरा भी रहता है. इसलिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि पहले मिट्टी की जांच करा ली जाए, उसके बाद ही तय मात्रा में राख डाली जाए ताकि फसल को सही फायदा मिल सके.

पूजा-पाठ और जागर में आस्था का प्रतीक

उत्तराखंड की लोक संस्कृति में चीड़ की राख का एक धार्मिक पहलू भी है. कई गांवों में देवी-देवताओं के जागर, पूजा या खास अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालुओं को यही राख तिलक के रूप में लगाई जाती है या आशीर्वाद स्वरूप दी जाती है. इसे शुभता और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है, और यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी कई इलाकों में निभाई जा रही है. यह पूरी तरह आस्था का मामला है, इसका कोई चिकित्सीय या वैज्ञानिक आधार नहीं है, फिर भी यह उत्तराखंड की समृद्ध लोक विरासत की झलक जरूर दिखाती है.

बर्तन चमकाने का पुराना नुस्खा

एक दौर था जब बाजार में साबुन और डिटर्जेंट आसानी से नहीं मिलते थे, तब गांव के परिवार पीतल, तांबे और लोहे के बर्तन साफ करने के लिए चीड़ की राख का इस्तेमाल करते थे. राख के महीन कण बर्तनों की चिकनाई हटाने में मदद करते हैं, जिससे बर्तन अच्छी तरह चमक उठते हैं. आज के आधुनिक क्लीनर ज्यादा सुरक्षित और असरदार माने जाते हैं, फिर भी कुछ गांवों में यह पुराना तरीका आज भी अपनाया जाता है. इसे प्राकृतिक संसाधनों के समझदारी भरे इस्तेमाल की एक पुरानी मिसाल माना जा सकता है.

जैविक खेती में सीमित इस्तेमाल

बागेश्वर के रमेश पर्वतीय बताते हैं कि जैविक खेती करने वाले कुछ किसान पौधों के आसपास सीमित मात्रा में चीड़ की राख डालते हैं, जिससे कुछ कीटों और घोंघों की गतिविधि कम हो सकती है, साथ ही पौधों को पोटाश भी मिल सकता है. हालांकि यह असर हर फसल पर एक जैसा नहीं दिखता, और वैज्ञानिक परीक्षण भी हर परिस्थिति में इसकी पुष्टि नहीं करते. यही वजह है कि कृषि वैज्ञानिक इसे संतुलित मात्रा में और दूसरी जैविक खादों के साथ मिलाकर ही इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं. ज्यादा राख डालने से मिट्टी का पीएच बढ़ सकता है, जिससे कुछ पौधों की बढ़त पर उल्टा असर पड़ सकता है.

ईंधन की बची राख भी बेकार नहीं

पहाड़ में चीड़ की सूखी लकड़ी और पिरूल लंबे समय से ईंधन के तौर पर इस्तेमाल होते आए हैं. इस ईंधन से बची राख को फेंकने के बजाय ग्रामीण इसे खेतों या घर के दूसरे कामों में इस्तेमाल कर लेते हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का पूरा उपयोग हो जाता है. इससे अपशिष्ट भी कम होता है और परंपरागत जीवनशैली में संसाधनों के दोबारा इस्तेमाल की झलक भी मिलती है. हालांकि जंगल से चीड़ की कटाई हमेशा तय नियमों के दायरे में ही होनी चाहिए, यानी सिर्फ गिरी हुई लकड़ी या अधिकृत स्रोतों से मिली लकड़ी का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए.

पारंपरिक ज्ञान बनाम वैज्ञानिक पुष्टि

उत्तराखंड में चीड़ की राख से जुड़े ऐसे कई घरेलू नुस्खे और मान्यताएं आज भी प्रचलित हैं. ये सारी बातें लोक ज्ञान का हिस्सा हैं और बरसों के अनुभव पर टिकी हैं, लेकिन इनमें से हर दावे की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है. इसलिए किसी भी घरेलू उपाय को गंभीर बीमारी का इलाज मान लेना ठीक नहीं. त्वचा, पेट, सांस या किसी और सेहत से जुड़ी दिक्कत के लक्षण दिखें तो डॉक्टर से सलाह लेना ही सही रास्ता है. परंपरागत ज्ञान का सम्मान करते हुए आधुनिक चिकित्सा की सलाह को भी उतनी ही अहमियत देनी चाहिए, ताकि सेहत से समझौता न हो.

नई पीढ़ी से दूर होती परंपरा

आधुनिक जीवनशैली अपनाने की वजह से आज की युवा पीढ़ी कई पारंपरिक जानकारियों से कटती जा रही है, और चीड़ की राख से जुड़ी ये परंपराएं भी धीरे-धीरे कम होती दिख रही हैं. गांव के बुजुर्ग चाहते हैं कि उनका यह अनुभव अगली पीढ़ी तक जरूर पहुंचे. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे पारंपरिक ज्ञान पर वैज्ञानिक शोध होना चाहिए, ताकि जिन इस्तेमाल का सच में फायदा है उन्हें प्रमाणित किया जा सके, और जिन दावों का कोई ठोस आधार नहीं है उन्हें साफ तौर पर बताया जा सके. इससे लोक विरासत भी सुरक्षित रहेगी और लोग सही व सुरक्षित जानकारी के आधार पर फैसला ले पाएंगे.

सवाल-जवाब

चीड़ की राख का इस्तेमाल किन-किन कामों में होता है?
पेट के कीड़ों के घरेलू नुस्खे, खेतों की खाद, पूजा-पाठ में तिलक और बर्तन साफ करने जैसे कई कामों में चीड़ की राख का इस्तेमाल होता है.
क्या चीड़ की राख पेट के कीड़ों का वैज्ञानिक रूप से मान्य इलाज है?
नहीं, यह सिर्फ पारंपरिक घरेलू नुस्खा है, इसे वैज्ञानिक मान्यता नहीं मिली है, इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना इसका सेवन नहीं करना चाहिए.
खेतों में चीड़ की राख डालने से क्या फायदा होता है?
इसमें मौजूद पोटाश और कैल्शियम मिट्टी की गुणवत्ता सुधारते हैं और अम्लीयता कम करते हैं, लेकिन ज्यादा मात्रा मिट्टी का संतुलन बिगाड़ सकती है.
बागेश्वर के रमेश पर्वतीय ने जैविक खेती को लेकर क्या बताया?
उन्होंने बताया कि कुछ जैविक किसान पौधों के आसपास सीमित मात्रा में राख डालते हैं, जिससे कीट-घोंघों की गतिविधि कम होती है और पौधों को पोटाश मिलता है.
क्या पूजा में चीड़ की राख का धार्मिक महत्व है?
हां, कई गांवों में जागर और अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालुओं को यह राख तिलक या आशीर्वाद के रूप में दी जाती है.
चीड़ की राख से जुड़ी परंपराएं आज किस हाल में हैं?
आधुनिक जीवनशैली के चलते युवा पीढ़ी में यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है, और बुजुर्ग इसे अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चाहते हैं.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR
Chamar no WhatsApp