गर्मी के दिनों में पसीना निकलना एक स्वाभाविक शारीरिक प्रक्रिया है, लेकिन जब इसी पसीने से असहनीय दुर्गंध आने लगे तो यह किसी के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर देता है। कई बार लोगों को इस गंध की वजह से सामाजिक मेलजोल से बचने की नौबत आ जाती है। यदि महंगे इत्र या सुगंधित डियोड्रेंट लगाने के बाद भी यह परेशानी जस की तस बनी हुई है, तो इसके पीछे की मुख्य वजह को समझना और सही उपाय अपनाना जरूरी है। त्वचा विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि पसीना अपने आप में पूरी तरह गंधरहित होता है। असल दुर्गंध तब उत्पन्न होती है जब त्वचा की सतह पर पहले से मौजूद सूक्ष्म बैक्टीरिया पसीने के संपर्क में आते हैं और उसे विघटित करने लगते हैं। इस बुनियादी कारण को ध्यान में रखकर यदि कुछ आवश्यक आदतें अपनाई जाएं, तो दिनभर तरोताजा और आत्मविश्वास से भरपूर रहा जा सकता है।
बेंजोयल पेरोक्साइड वॉश का प्रयोग और रात के समय एंटीपर्सपिरेंट लगाने की आदत
पसीने की तेज दुर्गंध से निपटने के लिए डर्मेटोलॉजिस्ट सबसे पहले जीवाणुरोधी उपायों की सलाह देते हैं। अत्यधिक बदबू से जूझ रहे लोगों के लिए बेंजोयल पेरोक्साइड युक्त क्लींजर, वॉश या जेल का उपयोग बेहद प्रभावी सिद्ध होता है। यह एक शक्तिशाली एंटी-बैक्टीरियल घटक है जो त्वचा पर दुर्गंध पैदा करने वाले बैक्टीरिया को पनपने से रोकता है और उन्हें समाप्त करता है। इसके साथ ही एंटीपर्सपिरेंट का इस्तेमाल करने के समय में भी बदलाव करने की आवश्यकता है। अधिकांश लोग सुबह तैयार होते समय इसे लगाते हैं, जबकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसे रात को सोने से ठीक पहले अंडरआर्म्स पर लगाना चाहिए। रात के समय शरीर शांत अवस्था में होता है और पसीना बहुत कम निकलता है। इस वजह से एंटीपर्सपिरेंट के सक्रिय तत्व त्वचा की पसीने वाली ग्रंथियों के भीतर गहराई तक पहुंच पाते हैं और उन्हें प्रभावी ढंग से अवरुद्ध कर देते हैं, जिससे अगले पूरे दिन पसीने का बहाव काफी कम रहता है।
एंटी-बैक्टीरियल साबुन से रोजाना स्नान और त्वचा को पूरी तरह सुखाना
शरीर की समुचित स्वच्छता इस समस्या का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। चूंकि गंध का वास्तविक स्रोत बैक्टीरिया हैं, इसलिए नियमित रूप से त्वचा को साफ रखना अनिवार्य है। दिन में कम से कम एक या दो बार किसी सौम्य अथवा एंटी-बैक्टीरियल साबुन से अच्छी तरह नहाना चाहिए। स्नान के दौरान शरीर के उन संवेदनशील हिस्सों की विशेष सफाई करनी चाहिए जहां नमी और पसीना सबसे अधिक जमा होता है, जैसे कि अंडरआर्म्स और गर्दन के आसपास का क्षेत्र। स्नान करने के बाद एक और जरूरी बात का ध्यान रखना होता है, जो है शरीर को तौलिए से अच्छी तरह पोंछकर सुखाना। यदि त्वचा पर नमी बची रह जाती है, तो बैक्टीरिया को तेजी से पनपने के लिए अनुकूल वातावरण मिल जाता है, जिससे दुर्गंध की समस्या और विकट हो सकती है।
प्राकृतिक डियोड्रेंट और एसेंशियल ऑयल का विकल्प
बाजार में उपलब्ध कई तरह के रासायनिक डियोड्रेंट केवल कुछ घंटों के लिए तेज खुशबू बिखेरकर बदबू को दबाने का काम करते हैं। इसके अतिरिक्त, बार-बार केमिकल वाले स्प्रे लगाने से त्वचा में जलन या नुकसान का खतरा भी रहता है। ऐसे में प्राकृतिक तत्वों की ओर रुख करना अधिक सुरक्षित और टिकाऊ माना जाता है। उदाहरण के तौर पर, टी ट्री ऑयल में स्वाभाविक रूप से एंटी-बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं। टी ट्री ऑयल की कुछ बूंदों को शुद्ध नारियल तेल में मिलाकर प्रभावित हिस्सों पर लगाने से बैक्टीरिया का खात्मा होता है और पसीने की गंध से तुरंत राहत मिलती है। नारियल तेल त्वचा को पोषण देता है जबकि टी ट्री ऑयल सूक्ष्म जीवों को नष्ट करने का काम करता है।
ढीले और सांस लेने योग्य सूती वस्त्रों का चयन
व्यक्ति के पहनावे का पसीने और उसकी गंध पर सीधा प्रभाव पड़ता है। पॉलिएस्टर, नायलॉन या अन्य सिंथेटिक कपड़ों से बने परिधान पसीने को बिल्कुल नहीं सोखते। ऐसे वस्त्र शरीर से चिपके रहते हैं, जिससे वहां गर्मी और नमी का ऐसा घेरा बन जाता है जिसमें बैक्टीरिया बहुत तेजी से वृद्धि करते हैं। इसके विपरीत, हमेशा ढीले-ढाले और सांस लेने योग्य सूती यानी कॉटन के कपड़े पहनने की सलाह दी जाती है। सूती वस्त्र पसीने को आसानी से अवशोषित कर लेते हैं और खुली हवा के संपर्क में आने से वे तेजी से सूखते भी हैं। जब पसीना त्वचा पर जमा नहीं रहता, तो बदबू पैदा होने की संभावना स्वतः ही काफी घट जाती है।
खानपान की आदतों में सुधार और पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन
दैनिक आहार का सीधा संबंध पसीने की गंध से जुड़ा हुआ है। जो चीजें खाई और पी जाती हैं, उनके चयापचय तत्व पसीने के माध्यम से भी बाहर आते हैं। बहुत अधिक मिर्च-मसालेदार व्यंजन, लहसुन, प्याज या कैफीन युक्त पेय पदार्थों का भारी मात्रा में सेवन करने से पसीने की गंध अत्यधिक तीखी और दुर्गंधयुक्त हो जाती है। इसलिए अपने भोजन में हरी पत्तेदार सब्जियां, ताजे मौसमी फल और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करने चाहिए। इसके साथ ही, दिनभर में कम से कम 8 से 10 गिलास पानी पीने का नियम बनाना बेहद जरूरी है। पर्याप्त पानी पीने से शरीर के हानिकारक टॉक्सिन्स यानी विषैले तत्व मूत्र और सामान्य मार्ग से सुचारू रूप से बाहर निकल जाते हैं, जिससे पसीने की तीव्रता और गंध में उल्लेखनीय कमी आती है। यह समस्या लाइलाज नहीं है, केवल इन पांच आदतों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाकर इससे पूरी तरह निजात पाई जा सकती है।



















