आधुनिक जीवनशैली में परवरिश का ढर्रा पूरी तरह बदल चुका है, जहाँ माता-पिता अपने बच्चों के दिनभर के हर एक मिनट को किसी न किसी काम या एक्टिविटी से पैक कर देना चाहते हैं। सुबह स्कूल से लेकर शाम को ट्यूशन, डांस क्लास, स्पोर्ट्स और बची हुई कसर स्क्रीन टाइम पूरी कर देती है। बच्चों का पूरा दैनिक कार्यक्रम पहले से तय साँचों में ढला रहता है, जिसमें उनके पास खुद से कुछ सोचने का अवकाश ही नहीं बचता। इसी दौड़-भाग के बीच अब परवरिश की दुनिया में एक नए विचार को प्रमुखता मिल रही है, जिसे अनस्ट्रक्चर्ड फ्री टाइम या बोरियत का खाली समय कहा जा सकता है। इसका मूल सिद्धांत यह है कि बच्चे को दिनभर में कुछ वक्त ऐसा मिले, जब कोई बड़ा उसे कोई खास काम करने का हुक्म न दे और वह खुद यह तय करने के लिए आजाद हो कि उसे अपने उस समय का क्या करना है।
यहाँ खाली समय या बोरियत देने का मतलब बच्चे को जबरन अकेला या उदास करना कतई नहीं है। इसका सीधा और सरल अर्थ यह है कि जब भी बच्चा खाली बैठे, तो फौरन उसके हाथ में स्मार्टफोन, टीवी का रिमोट, कोई खिलौना या कोई बंधी-बंधाई एक्टिविटी थमाने की होड़ से बचा जाए। यह वह शांत वक्त हो सकता है जब बच्चा बस चुपचाप बैठकर कुछ सोचे, कमरे में यूँ ही टहले, किसी किताब के पन्ने पलटे, सादे कागज पर लकीरें खींचे या अपने मन से कोई नया खेल गढ़ ले। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, बड़ों के निर्देशों और दखल के बिना खेला जाने वाला खुला खेल बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास की सबसे मजबूत बुनियाद है। इस तरह के खेल में बच्चा किसी के बनाए नियमों पर चलने के बजाय अपनी खुद की जिज्ञासा और पसंद से आगे बढ़ता है।
हर बार बोरियत की शिकायत पर स्क्रीन देना क्यों नुकसानदेह है
जैसे ही बच्चा यह कहता है कि उसे बोरियत महसूस हो रही है, अधिकांश अभिभावक घबराकर फौरन उसे मोबाइल फोन थमा देते हैं, टीवी ऑन कर देते हैं या कोई नया गैजेट सामने रख देते हैं। इस त्वरित कदम से बच्चा उस क्षण तो शांत और व्यस्त हो जाता है, लेकिन इससे उसकी वह स्वाभाविक क्षमता कुंद होने लगती है जिसके जरिए वह बिना किसी रेडीमेड मनोरंजन के अपने समय का सदुपयोग करना सीखता है। जब मनोरंजन हर वक्त एक क्लिक पर परोसा जाता रहेगा, तो बच्चा अपने भीतर से कोई नया विचार पैदा करने की कोशिश ही नहीं करेगा।
अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स भी लगातार इस बात पर जोर देती है कि बच्चों के जीवन में डिजिटल स्क्रीन और वास्तविक दुनिया के अनुभवों के बीच एक संतुलित तालमेल होना जरूरी है। संस्था के अनुसार, जब बच्चों को अपनी निजी रुचियों के हिसाब से खुद खेलने और नई चीजें तलाशने की खुली छूट मिलती है, तो उनका सीखने का दायरा बढ़ता है और साथ ही उनका सामाजिक विकास भी कहीं बेहतर ढंग से होता है। तैयार मनोरंजन बच्चों को केवल उपभोक्ता बनाता है, जबकि खाली समय उन्हें निर्माता बनने की प्रेरणा देता है।
खालीपन से किस तरह जन्म लेती है रचनात्मकता और समस्या समाधान
जब किसी बच्चे के सामने कोई तयशुदा टास्क या नियम नहीं होते, तब उसका दिमाग नए रास्ते तलाशने के लिए सक्रिय हो जाता है। उदाहरण के तौर पर, घर में पड़ा एक साधारण खाली डिब्बा बच्चे की कल्पना में उड़ने वाली कार बन सकता है, सोफे के तकियों को जोड़कर वह एक शानदार किला या घर तैयार कर सकता है, और सादे कागज पर खींची गई कुछ टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें किसी दिलचस्प कहानी की शुरुआत बन सकती हैं।
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार, बिना किसी तय दिशा या बाहरी दबाव वाले ऐसे स्वतंत्र खेल बच्चों को लीक से हटकर रचनात्मक सोचने, रोजमर्रा की पेचीदा समस्याओं को खुद हल करने और दूसरों के साथ संवाद साधने के बेहतरीन अवसर उपलब्ध कराते हैं। चूँकि इस खेल के दौरान कोई बड़ा व्यक्ति हर कदम पर निर्देश देने के लिए मौजूद नहीं होता, इसलिए बच्चे को खुद फैसले लेने, गलतियों से सीखने और अपनी सीमाओं को परखने की पूरी आजादी महसूस होती है।
दैनिक दिनचर्या में बोरियत का यह समय कैसे शामिल करें अभिभावक
बच्चों को यह अनस्ट्रक्चर्ड समय देने के लिए घर के भीतर किसी बड़े तामझाम या भारी बदलाव की आवश्यकता नहीं होती। माता-पिता को बस इतना करना है कि बच्चे की दिनचर्या में एक निश्चित समय और कोना ऐसा तय कर दें जहाँ वह अपनी मर्जी का मालिक हो। इस दौरान उसे कुछ बेहद साधारण और बुनियादी साधन दिए जा सकते हैं, जैसे सादे कागज, रंग-बिरंगी पेंसिलें, बिल्डिंग ब्लॉक्स, किताबें, पुराने खाली गत्ते के डिब्बे या रोजमर्रा के सुरक्षित घरेलू सामान।
सबसे अहम बात यह है कि अभिभावक बच्चे को यह न समझाएँ कि उन चीजों से क्या बनाना है या उन्हें कैसे खेलना है। बच्चे की अपनी कल्पनाशक्ति को पूरी उड़ान भरने दें। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स भी इसी बात का समर्थन करती है कि बच्चों को साधारण वस्तुओं के साथ खेलने दिया जाए और खेल की दिशा व नियम उन्हें खुद तय करने दिए जाएँ। जब बच्चे बिना किसी तय पैटर्न के सामान का इस्तेमाल करते हैं, तो उनकी मौलिक सोच विकसित होती है।
खाली समय देने का यह अर्थ नहीं कि बच्चे को अकेला छोड़ दिया जाए
अभिभावकों को यह स्पष्ट रूप से समझना होगा कि खाली समय देने का अर्थ बच्चे को पूरी तरह से नजरअंदाज करना या उसकी देखरेख छोड़ देना बिल्कुल नहीं है। बच्चे की उम्र और उसके स्वभाव के आधार पर सुरक्षा के नियमों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। विशेषकर छोटे बच्चों के मामले में यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि उनका खेल का परिवेश हर तरह से सुरक्षित हो और कोई खतरनाक चीज आसपास न हो।
माता-पिता बच्चे के कमरे में या उसके नजदीक बैठकर भी पूरे खेल की कमान उसके हाथों में सौंप सकते हैं। इसका आशय यह है कि हर चीज में अपनी राय देने या दिशा तय करने के बजाय बच्चे की पसंद और उसकी कल्पना को नेतृत्व करने का मौका दिया जाए। असल में, बच्चे के दिन का हर खाली मिनट किसी उपयोगी काम से भरना जरूरी नहीं होता। कभी-कभी थोड़ी सी बोरियत ही बच्चे के भीतर सोचने, नया रचने और दुनिया को अपने नजरिए से तलाशने की सबसे खूबसूरत शुरुआत साबित होती है। इसी वजह से आज की व्यस्त जीवनशैली में समझदार परवरिश के तहत खाली समय को भी बाल विकास के एक जरूरी हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।



















