आज के आधुनिक और मशीनी युग में जहां बाजार प्लास्टिक के उत्पादों से पूरी तरहटे पटे हुए हैं, वहीं ग्रामीण भारत की महिलाएं अपनी प्राचीन हस्तकला को पूरी शिद्दत के साथ सहेजने में जुटी हुई हैं। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के गांवों में महिलाएं प्राकृतिक मूंज घास के जरिए बेहद आकर्षक डलियां और अन्य उपयोगी सामग्रियां अपने हाथों से तैयार कर रही हैं। यह कला सिर्फ हमारी समृद्ध ग्रामीण संस्कृति और परंपरा की पहचान ही नहीं है, बल्कि आधुनिक दौर में ग्रामीण महिलाओं के लिए अतिरिक्त कमाई का एक मजबूत जरिया भी साबित हो रही है।
मूंज घास से तैयार होती हैं पारंपरिक वस्तुएं
मूंज मुख्य रूप से एक प्रकार की प्राकृतिक घास होती है, जिसे विशेष तौर पर सुखाकर और व्यवस्थित करके घरेलू इस्तेमाल की कई वस्तुएं बनाई जाती हैं। यहां की महिलाएं इस घास को बेहद बारीकी के साथ बुनकर खूबसूरत डलियां तैयार करती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में काफी मेहनत और धैर्य की जरूरत होती है। मूंज की पट्टियों को एक-दूसरे में करीने से पिरोया जाता है, जिससे धीरे-धीरे एक निश्चित आकार बनता है और अंत में इसका मजबूत किनारा तैयार किया जाता है। प्राकृतिक सामग्री से निर्मित होने के कारण यह सामग्रियां पर्यावरण के अनुकूल भी मानी जाती हैं।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है यह कला
गांवों में रहने वाली महिलाएं अपने घर-परिवार के दैनिक कामकाज से समय निकालकर मूंज से डलिया और अन्य सामान बुनने का काम करती हैं। कई ग्रामीण महिलाओं के लिए यह कला किसी वरदान से कम नहीं है क्योंकि यह पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपरा का एक अहम हिस्सा है। परिवार की बुजुर्ग महिलाओं से इस हुनर को सीखकर अब नई पीढ़ी की युवतियां और महिलाएं भी इस प्राचीन हस्तकला को आगे बढ़ा रही हैं। ग्रामीण अंचलों में मूंज से बनी इन डलियों का उपयोग मुख्य रूप से अनाज, कपड़े और अन्य जरूरी घरेलू सामान को संभालकर रखने के लिए किया जाता है।
एक डलिया को तैयार होने में लगता है पूरा एक हफ्ता
देखने में मूंज की डलिया बनाना भले ही एक आसान काम लग सकता है, लेकिन इसकी वास्तविकता काफी श्रमसाध्य है। सबसे पहले कच्ची मूंज को इकट्ठा करके अच्छी तरह सुखाया जाता है, जिसके बाद इसे साफ करके जरूरत के अनुसार तैयार किया जाता है। इसके बाद महिलाएं अपने हाथों से इसकी जटिल बुनाई का काम शुरू करती हैं। एक-एक पट्टी को सही दिशा में पिरोकर डलिया को मनचाहा आकार दिया जाता है। बुनाई के दौरान यदि जरा सी भी लापरवाही हो जाए तो पूरा डिजाइन बिगड़ सकता है। यही मुख्य कारण है कि अनुभवी महिलाओं के हाथों से बनी मूंज की चीजों की बाजार और समाज में एक अलग ही पहचान होती है।
मंजू साझा करती हैं इस पारंपरिक हुनर का अनुभव
इस कला से जुड़ी मंजू बताती हैं कि वे आज भी अपने घर के सभी जरूरी कामकाज निपटाने के बाद मूंज और काश की मदद से सुंदर डलियां तैयार करती हैं। उनके अनुसार, एक अकेली डलिया को मुकम्मल तौर पर तैयार करने में करीब एक हफ्ते का समय लग जाता है। मंजू ने यह पारंपरिक हुनर अपनी मां से विरासत के तौर पर सीखा है। मंजू का कहना है कि एक समय था जब ग्रामीण इलाकों में मूंज और काश से निर्मित वस्तुओं का इस्तेमाल घर-घर में आम बात हुआ करती थी, लेकिन बदलते वक्त के साथ प्लास्टिक और बाजार में मिलने वाले अन्य कृत्रिम सामानों का चलन तेजी से बढ़ गया है। इन सबके बावजूद गांवों की कई महिलाएं आज भी अपनी इस प्राचीन परंपरा को अपने हुनरमंद हाथों से पूरी शिद्दत के साथ जिंदा रखे हुए हैं। जब भी महिलाओं को घरेलू जिम्मेदारियों से फुर्सत मिलती है, वे इस कला को संवारने में जुट जाती हैं।



















