तकनीकी विकास और आधुनिक जीवनशैली के इस दौर में भी लखीमपुर खीरी जिले के ग्रामीण आंचल में पुरानी रवायतें और सादगी भरा देसी रहन-सहन अपनी जगह बनाए हुए है। समय के बदलाव के साथ गांवों के कई घरों में बिजली के उपकरण और नए संसाधन जरूर पहुंच चुके हैं, मगर आज भी अनेक परिवार ऐसे हैं जहां सदियों पुरानी पारंपरिक वस्तुएं केवल सजावट का सामान नहीं, बल्कि दैनिक दिनचर्या का सक्रिय अंग बनी हुई हैं। मथनी, सिकहरा, चकरी, मूसर, सूप, मिट्टी का चूल्हा, मिट्टी की डेहरी और चलना जैसे घरेलू साधन किसी जमाने में देहाती जीवन की मूल पहचान हुआ करते थे। इनमें से कई वस्तुएं आज भी पूरी उपयोगिता के साथ ग्रामीणों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं।
दही से मक्खन निकालने का पारंपरिक साधन मथनी
देहात के पुराने घरों में लकड़ी से तैयार मथनी का हमेशा से विशेष महत्व रहा है। इसका प्राथमिक कार्य दही को मथकर उससे ताजा मक्खन और छाछ तैयार करना होता था। पुराने दौर में जिस भी घर में गाय या भैंस का दूध होता था और नियमित रूप से दही जमाया जाता था, वहां मथनी अनिवार्य रूप से मौजूद रहती थी। सुबह सवेरे घर की महिलाएं बड़े बर्तनों में जमे हुए दही को डालकर लकड़ी की मथनी से मथने का काम करती थीं। यह प्रक्रिया न केवल घर के सदस्यों को शुद्ध मक्खन उपलब्ध कराती थी, बल्कि सुबह की घरेलू दिनचर्या का एक प्रमुख हिस्सा भी हुआ करती थी।
सामान और खाद्य सामग्री के सुरक्षित रखरखाव का आधार सिकहरा
ग्रामीण जीवनशैली में सिकहरा जैसी पारंपरिक रचना का भी अपना एक खास मुकाम रहा है। भौगोलिक इलाकों के अनुसार इसके स्वरूप, बनावट और उपयोग के तरीकों में थोड़ा बहुत अंतर देखने को मिल सकता है। परंपरागत घरों में इसका मुख्य उपयोग रसोई के बर्तन, बची हुई खाद्य सामग्री और अन्य महत्वपूर्ण घरेलू चीजों को व्यवस्थित ढंग से ऊपर टांगकर रखने के लिए किया जाता था। पुराने समय में आज की भांति आधुनिक अलमारियां, मॉड्यूलर रैक या प्लास्टिक के बने स्टोरेज डिब्बे सुलभ नहीं थे, ऐसे में सिकहरा चीजों को जमीन से ऊपर सुरक्षित और हवादार रखने का सबसे कारगर देसी उपाय माना जाता था।
फसल को थाली तक पहुंचाने में सूप और चलने की भूमिका
खेतों से कटकर घर आने वाले अनाज की सफाई का सारा दारोमदार पहले पूरी तरह से घर की महिलाओं और पारंपरिक औजारों पर टिका होता था। अनाज को भोजन या लंबे समय तक भंडारण योग्य बनाने के लिए कई अलग-अलग चरणों से गुजरना पड़ता था, जिसमें सूप और चलने की केंद्रीय भूमिका होती थी। बांस या सरकंडों से बने सूप का उपयोग गेहूं, चावल, दाल और अन्य मोटे अनाजों में मौजूद भूसी, तिनकों, हल्के कचरे और अनचाहे कणों को हवा के सहारे फटककर अलग करने में किया जाता था। इसके अलावा अनाज की बारीकी से सफाई के लिए चलने का उपयोग किया जाता था। चलने में अनाज डालकर छाना जाता था, जिससे छोटे कंकड़ या अनुपयोगी अशुद्धियां बाहर निकल जाती थीं। हालांकि अब बाजार में अनाज साफ करने वाली अनेक आधुनिक मशीनें आ चुकी हैं, फिर भी कई घरों में यह देसी तरीका आज भी देखा जा सकता है।
मिट्टी का चूल्हा और अनाज सहेजने वाली विशाल डेहरी
देसी ग्रामीण घर की तस्वीर मिट्टी के चूल्हे के बिना हमेशा अधूरी समझी जाती रही है। पुराने समय में लगभग हर ग्रामीण रसोई या घर के खुले आंगन में मिट्टी से लिपा-पुता चूल्हा प्रमुखता से नजर आता था। इसे स्थानीय मिट्टी से बड़ी कुशलता से बनाया जाता था और इसमें खाना पकाने के लिए लकड़ी, सूखी टहनियों, उपलों और आसपास सहज रूप से उपलब्ध प्राकृतिक ईंधन का इस्तेमाल होता था। इसके साथ ही लखीमपुर खीरी के गांवों में मिट्टी की डेहरी का भी अपना विशिष्ट स्थान रहा है। उस जमाने में जब प्लास्टिक के बड़े ड्रम, लोहे की टंकियां या आधुनिक गोदाम सुलभ नहीं थे, तब पूरे साल का अनाज सुरक्षित रखने के लिए मिट्टी के विशालकाय पात्र यानी डेहरी बनाई जाती थी। परिवार की जरूरत और उपलब्ध जगह के अनुसार डेहरी का आकार छोटा या बड़ा रखा जाता था, जो अनाज को नमी और कीटों से बचाने का प्राकृतिक साधन था।
ओखली-मूसर से धान की कुटाई और मांगलिक परंपराएं
आधुनिक राइस मिलों और कुटाई मशीनों के चलन से पहले गांवों में धान से चावल अलग करने का काम विशुद्ध रूप से शारीरिक श्रम पर निर्भर था। इसके लिए ओखली और भारी मूसर का सहारा लिया जाता था। महिलाएं दोनों हाथों से मूसर को लयबद्ध तरीके से उठाकर ओखली में भरे धान पर प्रहार करती थीं, जिससे धान का छिलका अनाज से अलग हो जाता था और घर पर ही शुद्ध चावल तैयार हो जाता था। मूसर का जुड़ाव सिर्फ अनाज कूटने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारतीय विवाह संस्कारों और पारंपरिक मांगलिक रस्मों में भी इसका प्रतीकात्मक उपयोग किया जाता रहा है। भले ही मशीनों के आने से दैनिक उपयोग में मूसर का चलन घटा हो, लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों और रस्मों में इसका मान आज भी कायम है।



















