बिहार के मधुबनी जिले में आज भी पारंपारिक खपरैल के मकान बड़ी संख्या में देखने को मिलते हैं। मिट्टी को पकाकर बनाए गए खपरैल के घर मौसम के लिहाज से बेहद अनुकूल माने जाते हैं, लेकिन इनकी देखभाल और मरम्मत एक कठिन चुनौती होती है। पक्की मिट्टी से बने होने के कारण ये खपरैल आसानी से टूट जाते हैं, जिससे बारिश के दिनों में छत से पानी टपकने और सीपेज की गंभीर समस्या खड़ी हो जाती है।
खपरैल मकानों की बनावट और पानी टपकने की मुख्य वजहें
खपरैल के घरों की छत की बनावट काफी खास होती है। अंदरूनी हिस्से में बांस, लकड़ी और खर-पतवार का ढांचा तैयार किया जाता है, जिसके ऊपर पकी हुई मिट्टी की खपरैल की परत बिछाई जाती है। चारकोण आकार की छत होने के कारण इनकी मरम्मत करना साधारण कारीगरों के बस की बात नहीं होती। ग्रामीण इलाकों में अक्सर छतों पर बंदरों की आवाजाही या किसी भारी वस्तु के गिरने से खपरैल टूट जाती हैं। जरा सी दरार या टूट-फूट होते ही बारिश का पानी सीधे घर के अंदर टपकने लगता है।
गिलेवे के घोल से मरम्मत करने का पारंपरिक तरीका
खपरैल छत को सीपेज और पानी के रिसाव से बचाने के लिए पुरानी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। स्थानीय अनुभवी मिस्त्री शत्रुघ्न के अनुसार, जिस तरह पक्के मकानों में ईंटों को जोड़ने के लिए सीमेंट का प्रयोग होता है, ठीक उसी तरह खपरैल घर में मिट्टी का गीला घोल यानी गिलेवा बनाया जाता है। इस मिट्टी के घोल की मदद से खपरैल को बहुत बारीकी और सफाई से आपस में जोड़ा जाता है। इससे ढलान बनी रहती है और बारिश का पानी छत पर रुके बिना तेजी से नीचे गिर जाता है।
मौसम के अनुकूल खपरैल और एस्बेस्टस पर इसका नया इस्तेमाल
खपरैल के मकानों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये भीषण गर्मी में भी अंदर से काफी ठंडे रहते हैं और ठंड के मौसम में भी रहने में आरामदायक होते हैं। हालांकि, बदलते दौर के साथ अब नए खपरैल मकान बहुत कम बनते हैं और मिट्टी पकाने वाली पारंपारिक भट्टियां भी लगभग खत्म हो चुकी हैं। इसके बावजूद, जिन लोगों के पास पुरानी खपरैल बची होती है, वे अपने घरों को गर्मी से बचाने के लिए एस्बेस्टस की चादरों के ऊपर इन्हें फैला देते हैं, ताकि कमरा ज्यादा गर्म न हो।



















