संतान की परवरिश के दौरान अमूमन हर माता-पिता की यह हार्दिक इच्छा रहती है कि उनका बच्चा संस्कारी बने, अनुशासन की मर्यादा समझे और आगे चलकर एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में उभरे। इस चाहत को पूरा करने के लिए अभिभावक प्रतिदिन बच्चों को तरह-तरह के अच्छे नियम सिखाने की जद्दोजहद में जुटे रहते हैं, उन्हें गलतियों पर टोकते हैं और कभी-कभी डांट-फटकार भी लगाते हैं। इसके बावजूद कई घरों में यह समस्या आम देखने को मिलती है कि तमाम प्रयासों और हिदायतों के बाद भी बच्चे उनकी बातों पर अमल नहीं करते। इस स्थिति का मूल कारण बच्चों का मनोवैज्ञानिक स्वभाव है, क्योंकि छोटे बच्चे सिर्फ कानों से सुनकर नहीं सीखते, बल्कि अपनी आंखों से जो देखते हैं, उसे सबसे पहले अपने जीवन में उतारते हैं। महात्मा गांधी का प्रसिद्ध कथन रहा है कि मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। इसका सीधा अर्थ यही है कि यदि आप किसी दूसरे व्यक्ति या अपने बच्चे में कोई बदलाव अथवा अच्छी आदत देखना चाहते हैं, तो उस आचरण की शुरुआत सबसे पहले आपको अपने निजी जीवन से करनी होगी। आइए उन तीन बुनियादी आदतों और बदलावों का विश्लेषण करें, जिन्हें बच्चों को सिखाने से पहले अभिभावकों को अपने रोजमर्रा के व्यवहार में शामिल कर लेना चाहिए।
स्वच्छता के प्रति संवेदनशीलता: उपदेश के बजाय आचरण से सिखाएं सफाई
अक्सर घरों में देखा जाता है कि माता-पिता बच्चों को खिलौने व्यवस्थित रखने, अपना कमरा साफ करने या बाहर से आने के बाद हाथ धोने का कड़ा निर्देश देते हैं। विडंबना यह होती है कि कई बार बड़े खुद अपने सामान को बिखरा हुआ छोड़ देते हैं, कचरे के डिब्बे का नियमित उपयोग करने के बजाय इधर-उधर रैपर या कागजात फेंक देते हैं, अथवा अपनी निजी साफ-सफाई को लेकर ढिलाई बरतते हैं। जब बच्चे अपने बड़ों को ही स्वच्छता के मानकों की अनदेखी करते देखते हैं, तो उनके मन में बड़ों के निर्देशों के प्रति गंभीरता नहीं रहती।
सफाई की आदत केवल दूसरों पर थोपने या भाषण देने से विकसित नहीं होती। इसकी ठोस शुरुआत अपने आसपास के वातावरण को स्वयं साफ-सुथरा रखने से ही हो सकती है। जब माता-पिता अपनी दिनचर्या में जूते, कपड़े और जरूरी कागजात सही जगह पर रखते हैं, भोजन के तुरंत बाद अपनी जूठी थाली और बर्तन सिंक में डालते हैं, तथा घर के साझा स्थानों को व्यवस्थित बनाए रखते हैं, तो बच्चों को बार-बार निर्देश देने की जरूरत नहीं पड़ती। वे अपने बड़ों के इस व्यवस्थित आचरण को सहज रूप से ग्रहण करते हैं और स्वयं भी सफाई पसंद बन जाते हैं।
समयबद्धता और दिनचर्या: अनुशासन की शुरुआत खुद से करें
बच्चों को सुबह जल्दी बिस्तर छोड़ने, समय पर अध्ययन करने और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से एक निश्चित दूरी बनाए रखने के लिए अक्सर कड़ी नसीहतें दी जाती हैं। दूसरी तरफ, यदि माता-पिता स्वयं देर रात तक जागते हैं, सुबह देर से उठते हैं, और फुर्सत का अधिकांश समय टेलीविजन देखने अथवा सोशल मीडिया स्क्रॉल करने में बिताते हैं, तो बच्चे इस दोहरे रवैये को तुरंत भांप लेते हैं। उनके भीतर यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि जो नियम उनके लिए अनिवार्य हैं, वे घर के बड़ों पर क्यों लागू नहीं होते।
अनुशासन कायम करने के लिए जरूरी है कि माता-पिता खुद समय की पाबंदी का सम्मान करें। घर में कुछ बुनियादी और निष्पक्ष नियम तय किए जाने चाहिए, जिनका पालन हर सदस्य के लिए अनिवार्य हो। उदाहरण के लिए, रात के भोजन की मेज पर किसी भी प्रकार के फोन का उपयोग पूरी तरह वर्जित किया जा सकता है, तथा सोने और जागने का एक निश्चित समय निर्धारित किया जा सकता है। जब माता-पिता इन नियमों का स्वयं निष्ठापूर्वक पालन करेंगे, तो बच्चे भी इसे अपने स्वभाव का हिस्सा बनाएंगे और अनुशासन को एक बोझिल बंदिश के बजाय जीवन की स्वाभाविक शैली समझने लगेंगे।
सादगी और संतोष: दिखावे की मानसिकता से दूरी बनाना जरूरी
वर्तमान समय के डिजिटल और उपभोक्तावादी परिवेश में हर छोटी-बड़ी बात पर दिखावा करना और अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह करना एक आम चलन बन चुका है। बच्चे जब अपने परिवेश में हर तरफ महंगे गैजेट्स, ब्रांडेड परिधान और फैंसी सामानों की होड़ देखते हैं, तो वे भी उन चीजों को पाने के लिए मचलने लगते हैं और जिद पर अड़ जाते हैं। यदि घर के बड़े भी भौतिक दिखावे को प्रतिष्ठा का पैमाना मानेंगे, तो बच्चों में सादगी का भाव कभी नहीं पनप सकता।
महात्मा गांधी का पूरा जीवन सादगी और उच्च विचारों का ज्वलंत उदाहरण रहा है। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे जीवन में सादगी और संतुलन का मूल्य समझें, तो घर के वातावरण को आडंबर और अनावश्यक प्रदर्शन से दूर रखना होगा। बच्चों को सीमित संसाधनों के भीतर संतोष का अनुभव कराना चाहिए, उन्हें पाई-पाई का मूल्य समझाना चाहिए और बचत की आदत डालनी चाहिए। उन्हें यह स्पष्ट संदेश मिलना चाहिए कि वास्तविक सुख और मानसिक शांति महंगी भौतिक वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत, संतोष और परिवार के साथ बिताए गए आत्मीय पलों में निहित है।
प्रभावी परवरिश का मूलमंत्र: उपदेश नहीं, स्वयं मिसाल बनें
बच्चों का लालन-पालन करना महज एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि निरंतर सीखने और खुद को संवारने का एक खूबसूरत सफर है। यदि अभिभावक चाहते हैं कि उनकी संतान संवेदनशील, परिपक्व और समाज के प्रति जवाबदेह बने, तो उन्हें अंतहीन उपदेश देने या डांटने की पद्धति से बाहर निकलना होगा। शब्दों का प्रभाव क्षणिक हो सकता है, लेकिन आंखों के सामने देखा गया आचरण जीवन भर के लिए मानस पटल पर अंकित हो जाता है। अत: बच्चों में किसी सुधार की अपेक्षा करने से पहले अपने स्वयं के व्यवहार का आत्मनिरीक्षण करना और उसमें आवश्यक सुधार लाना ही सबसे सफल और प्रभावशाली परवरिश की असली कुंजी है।



















