घर या बगीचे के लिए नया फर्नीचर बनवाते समय लोगों की सबसे बड़ी चिंता उसकी मजबूती और उम्र को लेकर होती है। खासकर जब बात खुले आंगन, बालकनी या पानी के संपर्क में आने वाली जगहों की हो, तो सामान्य लकड़ी बहुत जल्दी फूलने, सड़ने या दीमक की चपेट में आने लगती है। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि कौन से पेड़ की लकड़ी किस काम के लिए सबसे बेहतर नतीजे देती है और नमी वाले माहौल में अपनी बनावट को सुरक्षित रख पाती है।
फर्नीचर निर्माण के लोकप्रिय विकल्प और उनकी खासियत
आमतौर पर इनडोर साज-सज्जा के लिए सागौन, शीशम, साल, महोगनी, आम और नीम की लकड़ी को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। सागौन अपनी बेजोड़ मजबूती और प्रीमियम दर्जे के कारण फर्नीचर की दुनिया में शीर्ष पर माना जाता है। यह लकड़ी पानी और दीमक के हमले को आसानी से झेल लेती है, जिससे इसका ढांचा कई दशकों तक ज्यों का त्यों बना रहता है।
शीशम की बात करें तो यह अत्यंत सघन, वजनदार और मजबूत लकड़ी होती है। कारीगरों के लिए इस पर महीन नक्काशी करना काफी आसान होता है, यही कारण है कि भारतीय घरों में डाइनिंग टेबल, मजबूत अलमारियां और डबल बेड बनाने के लिए शीशम पहली पसंद रहता है। दूसरी ओर, साल की लकड़ी अपनी असाधारण कठोरता के लिए जानी जाती है। अत्यधिक वजन सहने की क्षमता के कारण इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल मकानों के भारी चौखटों, दरवाजों, खिड़कियों और बुनियादी निर्माण कार्यों में किया जाता है।
महोगनी एक ऐसा विकल्प है जो आधुनिक और पारंपरिक दोनों तरह की डिजाइनों में खूबसूरती से ढल जाता है। यह हवा में मौजूद नमी को काफी हद तक सोखने के बावजूद अपनी बनावट नहीं खोती और पानी के छीटों से जल्दी खराब नहीं होती। बजट के लिहाज से आम और नीम की लकड़ी किफायती मानी जाती है। नीम में प्राकृतिक कड़वाहट के कारण कीट-पतंगों का असर कम होता है, जबकि आम की लकड़ी कम लागत में साधारण फर्नीचर बनाने के काम आती है।
पानी और अत्यधिक नमी में सबसे ज्यादा टिकने वाली लकड़ियां
यदि फर्नीचर को सीधे पानी, बारिश या सीलन भरी जगह पर रखना हो, तो उसके लिए अलग श्रेणी की लकड़ियों को प्राथमिकता दी जाती है। इस मामले में सागौन, करदई, इपे, देवदार और गूलर सबसे आगे गिने जाते हैं। सागौन के भीतर कुदरती तौर पर सिलिका और प्राकृतिक तेल मौजूद रहते हैं। यह रासायनिक संरचना लकड़ी को सड़न पैदा करने वाले बैक्टीरिया और कीड़ों से बचाती है। इसी प्राकृतिक खूबी के कारण सागौन का उपयोग पानी पर तैरने वाली नावों और खुले मैदान के आउटडोर फर्नीचर में प्रमुखता से होता आया है।
करदई की लकड़ी भी पानी में डूबे रहने पर अपनी दृढ़ता नहीं खोती। ग्रामीण इलाकों में जल स्रोतों के पास होने वाले टिकाऊ और भारी निर्माण कार्यों में करदई का इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है। इसी तरह गूलर की लकड़ी की तासीर भी अनोखी मानी जाती है। इसके बारे में यह मान्यता रही है कि यह पानी सोखने के बाद और भी अधिक कठोर हो जाती है। प्राचीन और ऐतिहासिक निर्माण शैलियों में जल संरचनाओं और पानी के निकट स्थापित होने वाली मूर्तियों के आधार के लिए गूलर की लकड़ी उपयोग में लाई जाती रही है।
इपे और देवदार: ऐतिहासिक महत्व और प्राकृतिक सुरक्षा
अत्यधिक घनत्व और भारी वजन वाली इपे की लकड़ी पानी के भीतर टिके रहने के मामले में बेमिसाल मानी जाती है। इसका उपयोग पानी के नीचे रहने वाले खंभों और खुले वातावरण में बनने वाले मजबूत पुलों के निर्माण में किया जाता रहा है। पुराने जमाने में राजा-महाराजा भी भव्य महलों की छतों और जल पुलों को मजबूती देने के लिए इपे जैसी भारी लकड़ियों पर भरोसा करते थे।
देवदार, जिसे रेड सीडार के नाम से भी जाना जाता है, अपनी भीतरी संरचना में खास प्राकृतिक तेल संजोए रखता है। ये तेल लकड़ी को फंगस, नमी और सड़न से पूरी तरह सुरक्षित रखते हैं। पहाड़ी और सीलन वाले इलाकों में देवदार से बने उत्पाद इसी वजह से लंबे समय तक टिके रहते हैं।
दीमक और घुन से सुरक्षा के उपाय
लकड़ी की स्वाभाविक मजबूती के साथ-साथ उसकी लंबी उम्र सुनिश्चित करने के लिए कुछ रासायनिक उपचार भी किए जाते हैं। घुन और दीमक जैसे विनाशकारी कीटों से बचाने के लिए बोरिक और बोरेक्स जैसे रसायनों का लेप किया जाता है। यह सुरक्षा परत लकड़ी के रेशों को कीड़ों के हमले से सुरक्षित रखती है और फर्नीचर को सालों-साल नया बनाए रखने में मदद करती है। इसलिए अपनी जरूरत, जगह और बजट को ध्यान में रखकर सही प्रजाति की लकड़ी और सही उपचार का चुनाव करना चाहिए।



















