अक्सर माता-पिता यह शिकायत करते हैं कि उनका बच्चा किताब खोलकर बैठता तो है, लेकिन थोड़ी देर बाद पूछने पर सब भूल जाता है। कई बार स्कूल में पढ़ाई गई बातें भी अगले दिन तक उसके दिमाग से गायब हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में अभिभावक आमतौर पर मान लेते हैं कि बच्चा लापरवाह है या उसका मन पढ़ाई में नहीं लग रहा है। हालांकि, हर बार इसे लापरवाही से जोड़ना उचित नहीं है। बच्चों की स्मरण शक्ति और एकाग्रता भी निरंतर अभ्यास से सुधरती है। इसके लिए उन्हें घंटों किताब थमाकर बैठाए रखना जरूरी नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन के छोटे-छोटे खेल और स्वस्थ आदतें उनके मस्तिष्क को अधिक सक्रिय बना सकती हैं।
वर्किंग मेमोरी और दिमागी विकास को समझें
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑन द डेवलपिंग चाइल्ड के अनुसार, बच्चों में किसी भी नई जानकारी को कुछ देर मस्तिष्क में सहेजकर रखने और उसका सही इस्तेमाल करने की क्षमता जिसे 'वर्किंग मेमोरी' कहा जाता है, अचानक नहीं बनती। इसके साथ ही ध्यान लगाने और स्वयं के व्यवहार को नियंत्रित करने जैसे आवश्यक कौशल समय के साथ धीरे-धीरे विकसित होते हैं। जब बच्चे सार्थक बातचीत करते हैं, तरह-तरह के खेल खेलते हैं या ऐसी गतिविधियों में भाग लेते हैं जिनमें सोचना और याद रखना पड़ता है, तो इन कार्यकारी क्षमताओं का निरंतर अभ्यास होता है।
याददाश्त की कसरत को बनाएं मनोरंजक खेल
बच्चों की स्मरण शक्ति सुधारने का सबसे सरल उपाय यह है कि अभ्यास को पढ़ाई का बोझ बनाने के बजाय एक मजेदार खेल का रूप दे दिया जाए। उदाहरण के तौर पर, एक मेज पर 5 से 6 अलग-अलग वस्तुएं सजाएं और बच्चे को लगभग 30 सेकंड तक उन्हें ध्यान से देखने के लिए कहें। इसके बाद उन वस्तुओं को हटा लें या ढक दें और बच्चे से पूछें कि उसे कौन-कौन सी चीजें याद हैं। जैसे-जैसे बच्चे का अभ्यास बढ़े, मेज पर रखी जाने वाली वस्तुओं की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
इसी तरह की तकनीक रोजमर्रा की सामान्य दिनचर्या में भी अपनाई जा सकती है। बाजार से घर लौटते समय बच्चे से पूछ सकते हैं कि रास्ते में उसने कौन-सी दुकानें या गाड़ियां देखी थीं। भोजन के समय मेज पर रखे बर्तनों या व्यंजनों के नाम याद करने की गतिविधि कराई जा सकती है। इस तरह के सहज अभ्यासों से बच्चे पर किसी परीक्षा का दबाव नहीं पड़ता और उसका मस्तिष्क जानकारी को सहेजने का आदी होने लगता है।
किताबें पढ़ने और सवाल पूछने का सही तरीका
बच्चे को कहानी सुनाना या उसके साथ मिलकर कोई बाल साहित्य पढ़ना केवल उसकी भाषा शैली या उच्चारण सुधारने तक सीमित नहीं है। किसी भी कहानी के अलग-अलग पात्रों, उसमें घटने वाली घटनाओं और उनके सही क्रम को याद रखने के लिए बच्चे को गहरा ध्यान लगाना पड़ता है।
जब कहानी पूरी हो जाए, तो बच्चे से सीधे सवाल करें कि कहानी में कौन-कौन से किरदार थे, शुरुआत में क्या हुआ था और बाद में क्या बदलाव आया। इसके बाद बच्चे को पूरी कहानी अपने शब्दों में दोबारा सुनाने को कहें। जब बच्चा अपने तरीके से कहानी बयां करता है, तो वह सुनी गई बातों को गहराई से समझता है और उन्हें व्यवस्थित रूप से याद करने का प्रयास करता है।
शारीरिक सक्रियता और खेलकूद भी हैं जरूरी
अक्सर यह मान लिया जाता है कि बच्चे का दिमाग केवल मेज-कुर्सी पर बैठकर किताबें पढ़ने से तेज होता है, लेकिन खेलकूद और शारीरिक गतिविधियां भी उसके समग्र दिमागी विकास का अनिवार्य हिस्सा हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का सेंटर इस बात पर जोर देता है कि खेल बच्चों के कार्यकारी कौशल को निखारने का एक बेहतरीन माध्यम है।
इसी वजह से हर दिन बच्चे के लिए दौड़ने, साइकिल चलाने, गेंद से खेलने, तैराकी करने या उसकी उम्र के अनुकूल किसी अन्य मैदानी खेल के लिए निश्चित समय निकालना आवश्यक है। बच्चे के खाली समय को केवल मोबाइल स्क्रीन या टेलीविजन के सामने बीतने से बचाना चाहिए, क्योंकि शारीरिक सक्रियता मस्तिष्क के रक्त संचार और सतर्कता को बेहतर करती है।
सवालों को दबाने के बजाय बढ़ाएं संवाद
छोटे बच्चे अक्सर बहुत जिज्ञासु होते हैं और एक ही विषय को लेकर बार-बार तरह-तरह के सवाल पूछते रहते हैं। ऐसी स्थिति में झल्लाकर उन्हें चुप कराने के बजाय बातचीत को आगे बढ़ाना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि बच्चा पूछता है कि आसमान से बारिश क्यों गिरती है, तो सीधे वैज्ञानिक उत्तर देने के बजाय पलटकर उससे पूछें कि उसे क्या लगता है।
जब बच्चे से उसका विचार पूछा जाता है, तो वह खुद उत्तर खोजने की कोशिश करता है, अपने विचारों को शब्दों में पिरोता है और पहले से सीखी गई बातों को नई स्थिति से जोड़ता है। इस तरह का दोतरफा संवाद सीखने की पूरी प्रक्रिया को बहुत सक्रिय और विचारशील बना देता है।
पहेलियां और दिमागी खेल सुलझाने की आदत
शब्दों वाले खेल, तरह-तरह की पहेलियां, शतरंज, सुडोकू या उम्र के अनुसार गणित के छोटे-छोटे पहेलीनुमा सवाल बच्चों को एकाग्रता बढ़ाने और समस्या सुलझाने का व्यावहारिक अभ्यास कराते हैं। हार्वर्ड के शोध के अनुसार, कार्यकारी कौशल के अंतर्गत किसी जानकारी को दिमाग में बनाए रखना, किसी काम पर ध्यान केंद्रित रखना और बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपनी सोच में लचीलापन लाना शामिल है।
इन खेलों का चयन करते समय हमेशा बच्चे की उम्र और उसकी मानसिक क्षमता का ध्यान रखना चाहिए। यदि शुरुआत में ही बहुत कठिन पहेली थमा दी जाएगी, तो बच्चा निराश हो सकता है। इसलिए खेल को आसान स्तर से शुरू करें और धीरे-धीरे उसकी कठिनाई बढ़ाएं ताकि उसकी रुचि बनी रहे।
रटने के बजाय अपने शब्दों में समझाने दें
जब बच्चा किसी पाठ या अध्याय को पूरा पढ़ ले, तो तुरंत दूसरा अध्याय शुरू कराने की जल्दबाजी न करें। उससे शांत मन से पूछें कि उसने उस पाठ से क्या समझा। उसे केवल 3 से 4 वाक्यों में पूरी बात अपने शब्दों में रखने का अवसर दें।
यह अभ्यास बच्चे को केवल पंक्तियों को रटने की आदत से दूर रखता है और विषय को गहराई से समझने के लिए प्रेरित करता है। सीखी गई बात को जब बच्चा खुद अपनी जुबान से दोहराता है, तो वह जानकारी उसकी स्मृति में पक्की हो जाती है। यह आदत आगे चलकर परीक्षाओं की तैयारी और उत्तर लेखन में भी बेहद मददगार साबित होती है।
भरपूर नींद और मानसिक विश्राम का महत्व
याददाश्त को मजबूत करने में नियमित और गहरी नींद की भूमिका को नजरअंदाज करना बहुत भारी पड़ सकता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के हेल्दीचिल्ड्रन के अनुसार, पर्याप्त नींद बच्चों को दिनभर ध्यान लगाने में सक्षम बनाती है और रात में सोते समय उनका मस्तिष्क दिनभर अर्जित की गई जानकारियों को व्यवस्थित करके दीर्घकालिक स्मृति में संचित करता है।
इसी कारण देर रात तक बच्चे को जबरन पढ़ाने के बजाय एक निश्चित दिनचर्या बनाना जरूरी है, ताकि वह समय पर सोए और समय पर जागे। उसकी उम्र के अनुसार जरूरी नींद मिलने पर उसका दिमाग तरोताजा रहेगा और सीखने की गति स्वाभाविक रूप से तेज होगी।
सार्थक अभ्यास और धैर्य ही असली समाधान
किसी भी बच्चे की याददाश्त को जादुई रूप से रातोंरात अत्यधिक तेज करने का कोई कृत्रिम शॉर्टकट नहीं होता। वास्तविक उद्देश्य यह होना चाहिए कि बच्चा बातों को ध्यानपूर्वक सुने, समझे, उसे सही समय पर याद कर सके और जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल कर सके। इसके लिए रोजाना केवल 15 से 20 मिनट के छोटे खेल, रोचक कहानियां, खुला संवाद और दिमागी गतिविधियां पर्याप्त आधार तैयार कर देती हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने बच्चे की तुलना कभी किसी अन्य सहपाठी या बच्चे से न करें। हर बच्चे के मस्तिष्क के विकास की अपनी गति होती है। पढ़ाई को डर या सजा बनाने के बजाय सीखने को दैनिक जीवन का एक खुशनुमा हिस्सा बनाएं, जिससे उसकी स्मरण शक्ति, ध्यान और समझने की क्षमता निरंतर मजबूत होती रहे।

















