मॉडर्न किचन में नॉन-स्टिक पैन, स्टील के बर्तन और प्रेशर कुकर भले ही दैनिक दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा बन चुके हों, लेकिन कुछ सदियों पहले भारतीय पाक कला का आधार सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि गहरा स्वास्थ्य विज्ञान था। दो सौ से पांच सौ वर्ष पहले रसोई में भोजन पकाने की प्रक्रिया शरीर को निरोगी रखने और संतुलित पोषण देने का वैज्ञानिक जरिया मानी जाती थी। हैदराबाद के 'वाईके एंटीक्स होम म्यूजियम' में सहेज कर रखे गए ऐतिहासिक बर्तनों की श्रृंखला यह स्पष्ट करती है कि उस दौर में धातुओं और भोजन के तत्वों के बीच सटीक तालमेल बिठाया जाता था।
पोषण में बर्तनों की अहम वैज्ञानिक भूमिका
संग्रहालय में प्रदर्शित दुर्लभ संग्रह इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पारंपरिक भारतीय रसोई में हर सामग्री के लिए धातु का चयन बिना सोचे-समझे नहीं होता था। इस संग्रह से जुड़े अध्ययनों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को मिलने वाले कुल शारीरिक पोषण में 80 प्रतिशत योगदान कच्चे अनाज और हरी सब्जियों का रहता है। इसके अलावा 15 प्रतिशत पोषण उस बर्तन से मिलता है जिसमें खाना पकाया जा रहा है, जबकि बाकी 5 प्रतिशत हिस्सा उस थाली या पात्र का होता है जिसमें भोजन परोसा जाता है। यही कारण था कि प्राचीन काल में अलग-अलग खाद्य पदार्थों को तैयार करने के लिए विशेष बर्तन निर्धारित थे।
दाल और चावल के लिए विशिष्ट धातुओं का चयन
वाईके एंटीक्स होम म्यूजियम के संस्थापक येल्लाप्रगदा कृष्ण राव के मुताबिक, पुराने समय में चावल पकाने के लिए मुख्य रूप से पीतल के बर्तनों को प्राथमिकता दी जाती थी। पीतल दरअसल तांबे और जस्ते का एक विशेष मिश्रण होता है। जब इसमें भात पकाया जाता था, तो भोजन के जरिए ये जरूरी खनिज प्राकृतिक रूप से शरीर तक पहुंच जाते थे। दूसरी ओर, प्रोटीन से भरपूर मगर पाचन में भारी मानी जाने वाली दालों को तैयार करने के लिए कांसे के बर्तनों का चलन था। कांसा तांबे और टिन का मिश्रण होता है, जो दाल के पोषक तत्वों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ शरीर को आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व भी मुहैया कराता था।
खट्टे व्यंजनों और सब्जियों के लिए सख्त नियम
प्राचीन पाक परंपरा में रासायनिक प्रतिक्रियाओं से बचाव को लेकर भी गहरी समझ थी। इमली, सांभर, रसम अथवा अन्य खट्टी सामग्रियों से तैयार होने वाले पकवानों को कभी भी धातु के बर्तनों में पकाने की अनुमति नहीं थी, ताकि धातु और अम्ल के बीच किसी भी नुकसानदेह रासायनिक क्रिया को पूरी तरह रोका जा सके। ऐसे खट्टे व्यंजनों को तैयार करने के लिए प्राकृतिक पत्थरों से तराशे गए पात्रों का उपयोग होता था, जिससे भोजन में कई प्रकार के खनिज खुद-ब-खुद घुल जाते थे। ठीक इसी तरह, सब्जियों को भूनने या फ्राई करने के लिए भारी लोहे की कड़ाही इस्तेमाल की जाती थी, जिससे शरीर को स्वाभाविक रूप से आयरन मिलता था और रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर दुरुस्त रहता था। यह पूरी जीवनशैली बिना किसी अतिरिक्त दवा के पूरे परिवार को तंदुरुस्त बनाए रखने में मदद करती थी।


















