हाथों में कूंची थामे और रंगों के तालमेल से कैनवास पर जीवन की अनुभूतियां उकेरती झांसी की सुमन द्विवेदी कला प्रेमियों के लिए एक अनोखी मिसाल बन चुकी हैं। 85 वर्ष की उम्र पार कर लेने के बावजूद चित्रकारी के प्रति उनका गहरा अनुराग रत्ती भर भी कम नहीं हुआ है। उम्र के इस पड़ाव पर जहां अधिकांश लोग दैनिक गतिविधियों से भी दूरी बना लेते हैं, वहीं सुमन द्विवेदी हर दिन रंगों के संसार में खोकर अपनी कल्पनाओं को नए आकार और रूप देती हैं। उनके लिए ब्रश उठाना और कोरे पन्नों या कैनवास को जीवंत बनाना केवल एक आदत नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और रचनात्मक पहचान का एक अटूट हिस्सा बन चुका है।
धैर्य, बारीकियां और रंगों का अनूठा सामंजस्य
चित्रकारी एक ऐसी विधा है जिसमें हर रंग का अपना अलग महत्व, अर्थ और मानवीय संवेदना होती है। कोई भी कलाकार अपनी गहन सोच और अंतर्मन की भावनाओं को जब किसी धरातल पर उतारता है, तो वह रचना एक नया रूप धारण कर लेती है। इस पूरी प्रक्रिया में बेहद धैर्य, एकाग्रता और सूक्ष्म बारीकियों पर लगातार ध्यान देने की आवश्यकता होती है। सुमन द्विवेदी द्वारा तैयार की गई कलाकृतियों में भी रंगों का यही अद्भुत संयोजन और गहरी कलात्मक सूझबूझ साफ तौर पर झलकती है। उनकी बनाई गई पेंटिंग्स इस बात का पुख्ता प्रमाण हैं कि वे हर रेखा और रंग के चयन में कितनी सतर्कता और संजीदगी बरतती हैं।
अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनती चित्रकारी
पेंटिंग केवल एक आकर्षक तस्वीर बना देने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह अपने विचारों, दृष्टिकोण और भावों को अभिव्यक्त करने का एक बेहद सशक्त जरिया भी है। एक संवेदनशील कलाकार अपनी असीम कल्पना के सहारे विभिन्न आकृतियों और रंगों को एक सूत्र में पिरोता है, जिससे एक सर्वथा नई रचना का जन्म होता है। सुमन द्विवेदी इसी कलात्मक माध्यम से अपनी स्वतंत्र रचनात्मक पहचान को मजबूती से संजोए हुए हैं। इस उम्र में भी उनका लगातार चित्रकारी में रमे रहना यह स्पष्ट संदेश देता है कि किसी भी रचनात्मक कार्य या अपने पसंदीदा शौक से जुड़े रहने के लिए उम्र का कोई तय पैमाना या बंदिश कभी आड़े नहीं आ सकती।
जीवन के हर दौर में बरकरार रहा कला का सफर
किसी भी इंसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात उस कला के प्रति उसका आंतरिक लगाव, समर्पण और उसे अनवरत जारी रखने की दृढ़ इच्छाशक्ति होती है। वक्त तेजी से बदलता रहता है और जीवन की जिम्मेदारियां बढ़ती जाती हैं, लेकिन यदि मन में अपने शौक के प्रति सच्चा समर्पण बना रहे तो व्यक्ति उम्र भर अपनी पसंद की दुनिया में पूरी सक्रियता से रचा-बसा रह सकता है। सुमन द्विवेदी के इस लंबे कलात्मक सफर को समझने के लिए यह देखना बेहद महत्वपूर्ण है कि उनके भीतर पेंटिंग का विचार सबसे पहले कैसे उपजा, उन्होंने अपने जीवन में पहली बार ब्रश कब थामा और इस कला को सीखने का सिलसिला किस तरह आगे बढ़ा।
अनुभवों से निखरता रचनात्मक संसार
बीते कई दशकों में उनकी चित्रकारी के तौर-तरीकों, शैलियों और माध्यमों में क्या बदलाव आए तथा वर्तमान समय में उन्हें किस प्रकार के चित्र बनाना सर्वाधिक सुहाता है, यह उनके कलात्मक विकास को दर्शाता है। साथ ही उनकी बनाई तमाम कलाकृतियों में से कौन सी रचना उनके दिल के सबसे करीब है और 85 साल की उम्र में भी उन्हें घंटों रंगों के बीच समय बिताने की ऊर्जा कहां से मिलती है, ये सारे पहलू उनकी कला यात्रा के साथ-साथ उनके व्यक्तिगत अनुभवों को भी सामने लाते हैं। सुमन द्विवेदी की यह कहानी यह साबित करती है कि वास्तविक रचनात्मकता कभी उम्र की मोहताज नहीं होती। जिंदगी के किसी भी पड़ाव पर व्यक्ति अपनी पसंद के कार्य को जारी रख सकता है और रंगों के जरिए अपनी एक खूबसूरत दुनिया गढ़ सकता है।



















