भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार और उसके ऐतिहासिक पैमानों को लेकर दशकों से कई तरह के विमर्श चलते रहे हैं। इसी बहस के बीच दार्शनिक और विचारक आचार्य प्रशांत ने अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार को एक खास धार्मिक पहचान से जोड़ने वाली शब्दावली पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। उनका तर्क है कि विकास की गति मंद होने का दोष किसी धर्म या संस्कृति पर मढ़ना पूरी तरह अनुचित है और ऐसा संबोधन देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मानजनक नहीं कहा जा सकता। इसके साथ ही उन्होंने आजादी के दशकों बीत जाने के बाद भी देश के एक बड़े तबके में गरीबी बने रहने के बुनियादी सामाजिक व मानसिक पहलुओं का विश्लेषण पेश किया।
अर्थव्यवस्था की रफ्तार को धार्मिक पहचान से जोड़ने पर कड़ा ऐतराज
दशकों पहले देश की धीमी जीडीपी (GDP) वृद्धि दर को एक खास नाम दिया गया था, जिस पर सवाल उठाते हुए आचार्य प्रशांत ने कहा कि आर्थिक विफलता का ठीकरा किसी धर्म के सिर फोड़ना तर्कसंगत नहीं है। उनका कहना था कि इस तरह की परिभाषाएं यह गलत संदेश देती हैं कि नागरिकों की धार्मिक मान्यताओं की वजह से देश आगे नहीं बढ़ पाया। उनके मुताबिक किसी भी राष्ट्र की आर्थिक सुस्ती को धर्म विशेष का परिणाम बताना न केवल एक गलत व्याख्या है, बल्कि यह पूरी संस्कृति को नीचा दिखाने जैसा कदम है।
आचार्य प्रशांत ने यह स्पष्ट किया कि यद्यपि व्यक्तिगत स्तर पर किसी मनुष्य की आस्था और कार्यशैली में संबंध हो सकता है, क्योंकि विचार ही इंसान के श्रम और काम करने की लगन को प्रभावित करते हैं, फिर भी व्यापक आर्थिक आंकड़ों को किसी धर्म से जोड़ देना हास्यास्पद है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस किस्म की नामपद्धति एक तरह का भद्दा मजाक है और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की कमजोरियों का विश्लेषण व्यावहारिक व नीतिगत आधार पर किया जाना चाहिए, न कि धार्मिक चश्मे से।
देश में गरीबी टिके रहने के दो प्राथमिक पहलू
दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की आकांक्षाओं के बावजूद भारत में गरीबी की निरंतरता पर आचार्य प्रशांत ने साफ कहा कि यह संकट सिर्फ प्राकृतिक साधनों या धन की अनुपलब्धता का नहीं है। उनके विश्लेषण के अनुसार, इस गतिरोध की जड़ें समाज की आंतरिक प्राथमिकताओं और दृष्टिकोण में समाई हुई हैं। इस संदर्भ में उन्होंने दो प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित किया।
पहला पहलू जनसामान्य की कार्यशैली और दृढ़ संकल्प के अभाव से जुड़ा है। आचार्य प्रशांत के अनुसार, लोगों में आगे बढ़ने और परिस्थिति को पूरी ताकत से बदलने के लिए जिस प्रबल इच्छाशक्ति और आत्मबल की दरकार होती है, उसमें कमी देखी जाती है। समाज अक्सर अपनी मजबूरियों और अभावों की दुहाई देने में लगा रहता है, लेकिन जब अपनी बुनियादी आदतों और सोच में क्रांतिकारी बदलाव लाने का वक्त आता है, तब वह पीछे हट जाता है। जमीनी बदलाव के लिए ठोस कदमों की जगह सिर्फ शिकायत करने का रवैया देश को तेज विकास से वंचित रखता है।
दूसरा पहलू वित्तीय अनुशासनहीनता और अनियंत्रित प्रदर्शन की संस्कृति है। समाज में दिखावे की होड़ और दूसरों से आगे दिखने की अंधी चाहत बहुत तेजी से बढ़ी है। आम नागरिक अपनी वास्तविक हैसियत और आमदनी की सीमाओं को लांघकर गैरजरूरी चीजों पर भारी खर्च कर रहे हैं। संपन्न वर्गों से अपनी अंतहीन तुलना करने के इस चलन ने आम परिवारों को गंभीर आर्थिक संकट में धकेल दिया है। अपनी क्षमता से अधिक खर्च करने की यह प्रवृत्ति आर्थिक स्थिरता को कमजोर कर रही है।
विदेशी हुकूमत के असर और आर्थिक असमानता की वास्तविक स्थिति
देश के पिछड़ेपन के लिए अकसर औपनिवेशिक काल के शोषण को एकमात्र वजह मान लिया जाता है। इस पारंपरिक दलील पर अपनी राय रखते हुए आचार्य प्रशांत ने स्वीकार किया कि अंग्रेजों द्वारा लंबे अरसे तक संसाधनों की लूट किया जाना एक ऐतिहासिक तथ्य है। किंतु उन्होंने यह गंभीर प्रश्न भी उठाया कि दुनिया के कई अन्य देश भी अतीत में पराधीन रहे और उनका भी भयानक शोषण हुआ, फिर भी वे समय के साथ उन त्रासदियों से उबरकर समृद्धि की दौड़ में भारत से कहीं आगे निकल गए। केवल अतीत के शोषण का हवाला देकर वर्तमान की जिम्मेदारियों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता।
इसके अलावा उन्होंने समाज में तेजी से बढ़ रही गैरबराबरी को भी गरीबी का एक बड़ा कारक माना। उनका कहना था कि अतीत में संपन्न और विपन्न के बीच का अंतर इतना विकराल नहीं था, लेकिन मौजूदा दौर में यह खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है। बढ़ती हुई आर्थिक विषमता ने निर्धन तबके की मुश्किलें कई गुना बढ़ा दी हैं। देश में प्राकृतिक संपदा और बुनियादी संसाधनों का कोई अभाव नहीं है, बल्कि वास्तविक कमी उस सही दृष्टि और न्यायसंगत चेतना की है जो समाज को आत्मनिर्भर और सशक्त बना सके।



















