धार्मिक आयोजनों, दैनिक पूजा और मांगलिक त्योहारों के समापन पर घरों में चढ़ाए गए फूलों की मालाएं, तुलसी के डंठल, केले के पत्ते, फल और नैवेद्य बड़ी मात्रा में एकत्र हो जाते हैं। अधिकतर श्रद्धालु इस पवित्र अवशेष को या तो पास की नदियों अथवा जलाशयों में प्रवाहित कर देते हैं, या फिर विवश होकर कचरे के पात्र में डाल देते हैं। दोनों ही तरीके पर्यावरण के लिए चिंताजनक साबित होते हैं, क्योंकि पानी में विसर्जित करने से जल प्रदूषण बढ़ता है और डंपिंग यार्ड में पहुंचकर यह जैव अपशिष्ट हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का कारण बनता है। इन प्राकृतिक अवशेषों का सबसे सुंदर और प्रकृति सम्मत उपयोग यह है कि इन्हें अपने घरेलू बगीचे के लिए पोषक जैविक खाद में तब्दील कर दिया जाए।
पूजा अवशेषों को खाद में बदलना क्यों है जरूरी
पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियां जैसे गेंदा, गुलाब, तुलसी के पत्ते व डंठल, केले के पत्ते और भोग में चढ़ाए गए ताजे फल पूरी तरह प्राकृतिक और रसायनों से मुक्त होते हैं। जब इन्हें सामान्य कचरे के साथ फेंक दिया जाता है, तो ये लैंडफिल में सड़कर पर्यावरण को क्षति पहुंचाते हैं। इसके विपरीत, यदि इन अवशेषों से वैज्ञानिक विधि से खाद तैयार की जाए, तो यह न केवल पर्यावरण संरक्षण में बड़ा योगदान देता है बल्कि घरेलू पौधों को सभी आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व भी प्रदान करता है। यह आध्यात्मिक आस्था के सम्मान और प्रकृति के संवर्धन का एक उत्कृष्ट समन्वय है।
अवांछित सामग्री को अलग करना है पहला कदम
खाद बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ करने से पहले पूजा सामग्री की गहन छंटाई अत्यंत आवश्यक है। ताजे फूलों, पत्तियों और बिना पके हुए फल-प्रसाद को एक जगह एकत्र कर लें। इस दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखें कि फूलों की लड़ियों में लगे प्लास्टिक के धागे, सिंथेटिक रिबन, चमकीली पन्नी, स्टेपलर पिन अथवा धातु की पन्नी पूरी तरह हटा दी जाए। ये कृत्रिम वस्तुएं प्राकृतिक रूप से विघटित नहीं होती हैं और पूरी खाद की गुणवत्ता तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं।
कम्पोस्ट पात्र का सही चयन और वेंटिलेशन
खाद तैयार करने के लिए किसी विशेष या महंगी मशीन की आवश्यकता नहीं होती। बालकनी या छत पर उपलब्ध स्थान के अनुसार पुराने गमले, प्लास्टिक के बड़े ड्रम या कम्पोस्ट कंटेनर का उपयोग किया जा सकता है। कम जगह वाले फ्लैटों के लिए 10 से 20 लीटर क्षमता वाली सामान्य प्लास्टिक बाल्टी भी पर्याप्त सिद्ध होती है। इस पात्र के निचले हिस्से और चारों ओर किनारों पर छोटे-छोटे छेद बनाना अनिवार्य है। ये छिद्र कंटेनर के भीतर ऑक्सीजन का निरंतर प्रवाह बनाए रखते हैं और अतिरिक्त नमी को बाहर निकलने का मार्ग देते हैं, जिससे सड़न और दुर्गंध का खतरा न्यूनतम हो जाता है।
गीले और सूखे कचरे का सटीक संतुलन
गुणवत्तापूर्ण खाद निर्माण का मुख्य रहस्य कार्बन और नाइट्रोजन युक्त सामग्रियों का समुचित अनुपात है। केवल गीले फूल डालने से खाद चिपचिपी और बदबूदार हो सकती है। खाद की भाषा में ताजे फूल, हरी पत्तियां, तुलसी के डंठल और ताजे फल 'ग्रीन' सामग्री कहलाते हैं, जो नाइट्रोजन का स्रोत हैं। इसके विपरीत, सूखी पत्तियां, सूखे फूल, नारियल के रेशे व छिलके, केले के सूखे पत्ते और बिना स्याही वाले सादे अखबार के टुकड़े 'ब्राउन' सामग्री कहलाते हैं, जो कार्बन प्रदान करते हैं।
कंटेनर में सबसे पहले 2 से 3 इंच मोटी परत सूखी पत्तियों या अन्य ब्राउन सामग्री की बिछानी चाहिए। इसके ऊपर ताजे फूलों और हरी पत्तियों की ग्रीन परत फैलाएं। यदि केले के मोटे तने या नारियल की जटाएं मौजूद हैं, तो उन्हें कैंची या दरांती से छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर डालें। बारीक कटे टुकड़े तेजी से अपघटित होते हैं। प्रत्येक दो-तीन परतों के बाद थोड़ी सी पुरानी कम्पोस्ट या सामान्य बगीचे की मिट्टी छिड़कना बेहद लाभकारी होता है, क्योंकि इसमें मौजूद सूक्ष्म जीवाणु अपघटन की क्रिया को तेज कर देते हैं।
नमी का स्तर और हवा का आवागमन
कम्पोस्ट के ढेर में नमी का संतुलन बनाए रखना अनिवार्य है। सामग्री न तो अत्यधिक सूखी होनी चाहिए और न ही पानी से लथपथ। आदर्श स्थिति यह है कि जब आप मिश्रण को हाथ में लेकर दबाएं, तो वह निचोड़े हुए नम स्पंज जैसा महसूस हो। यदि मिश्रण में चिपचिपापन या अत्यधिक गीलापन दिखे, तो तुरंत सादे अखबार की कतरनें या सूखी पत्तियां मिला देनी चाहिए। प्रत्येक 4 से 5 दिनों के अंतराल पर किसी लकड़ी या छड़ी की सहायता से पूरे मिश्रण को ऊपर-नीचे अच्छी तरह उलट-पलट दें। ऐसा करने से मिश्रण के अंदरूनी हिस्सों तक ताजी हवा पहुंचती है और एरोबिक बैक्टीरिया सक्रिय रहते हैं।
खाद तैयार होने की पहचान और उपयोग
नियमित देखभाल के साथ लगभग 4 से 8 हफ़्तों के भीतर यह सारा कचरा गहरे काले-भूरे रंग के, दानेदार और भुरभुरे रूप में परिवर्तित हो जाएगा। इस तैयार खाद से किसी प्रकार की दुर्गंध नहीं आती, बल्कि पहली बारिश के बाद गीली मिट्टी जैसी सौंधी सुगंध मिलती है। इस तैयार मिश्रण को छलनी से छान लें, ताकि जो टुकड़े पूरी तरह नहीं गले हैं वे अलग हो जाएं और उन्हें अगली बार की खाद में डाला जा सके। इस पोषक खाद को गमलों, फूलों की क्यारियों और गृह वाटिका की सब्जियों में उपयोग किया जा सकता है। यह मिट्टी की जल धारण क्षमता को सुदृढ़ करती है और पौधों में नई शाखाएं, फूल और फल लाने में जादुई प्रभाव दिखाती है।
दुर्गंध और कीटों से बचाव के उपाय
यदि खाद के कंटेनर से तीखी सड़न की बदबू आने लगे या मक्खी-मच्छर पनपने लगें, तो यह स्पष्ट संकेत है कि मिश्रण में गीली यानी ग्रीन सामग्री की मात्रा अधिक हो गई है और हवा का संचार बाधित है। इस स्थिति से निपटने के लिए तत्काल कुछ सूखी पत्तियां अथवा अखबार के टुकड़े डालकर मिश्रण को अच्छी तरह मिला दें। कीटों के संक्रमण को रोकने और कम्पोस्ट को रोगाणुमुक्त रखने के लिए मिश्रण में एक से दो चम्मच हल्दी पाउडर या नीम की खली का पाउडर छिड़कना एक बेहद प्रभावी प्राकृतिक उपाय है।



















