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सड़कों पर गुजरती जिंदगी और अपनों से महीनों का फासला, जानिए हाईवे पर दिन-रात पहिए घुमाने वाले ड्राइवरों का संघर्षजीवनशैली
4 नव॰ 2026, 2:41 pm (4 मिनट पहले)· 0

सड़कों पर गुजरती जिंदगी और अपनों से महीनों का फासला, जानिए हाईवे पर दिन-रात पहिए घुमाने वाले ड्राइवरों का संघर्ष

पूर्णिया के मरंगा औद्योगिक इलाके में तैनात ट्रक चालकों ने हाईवे पर अपनी अनिश्चित दिनचर्या, लंबे दौरों और परिवार से दूर रहने के भारी मानसिक व शारीरिक दबाव का हाल साझा किया।

दैनिक जीवन की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने और आजीविका जुटाने की खातिर हर इंसान पसीना बहाता है, लेकिन कुछ पेशे ऐसे होते हैं जिनमें काम की शर्तें सामान्य सामाजिक जीवन को पूरी तरह बदल देती हैं। आम तौर पर दफ्तरों में नौकरी करने वाले लोग या दिहाड़ी मजदूरी करने वाले श्रमिक पूरे दिन श्रम करने के बाद शाम को अपने घर, परिवार और बच्चों के बीच लौट आते हैं। इसके ठीक उलट, भारी व्यावसायिक वाहन चलाने वाले चालकों की दिनचर्या इस पारंपरिक ढर्रे से पूरी तरह जुदा होती है।

मरंगा औद्योगिक परिसर में सैकड़ों वाहनों का जमघट

बिहार के पूर्णिया स्थित मरंगा क्षेत्र में रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं और जीवनशैली से जुड़े सामान तैयार करने वाली कई बड़ी फैक्ट्रियां और कारखाने संचालित हैं। इन निर्माण इकाइयों में कच्चा माल पहुंचाने और तैयार माल को देश के विभिन्न हिस्सों में ले जाने के लिए हर दिन सैकड़ों ट्रक इस परिसर में कतारबद्ध खड़े रहते हैं। इसी औद्योगिक क्षेत्र में मौजूद चालकों से जब बातचीत की गई, तो उन्होंने अपने काम के दबाव और घर-गृहस्थी से लगातार बने रहने वाले अलगाव के बारे में विस्तार से चर्चा की।

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महीनों लंबे दौरे और अनिश्चित पड़ाव

कार्यस्थल पर मौजूद चालक अनिल कुमार, लव कुश गुप्ता, सूरज कुमार और ज्ञानेंद्र पासवान सहित अन्य कई चालकों ने बताया कि कमाई के लिए उन्हें लगातार अपने परिजनों, सगे संबंधियों और मित्रों से दूरी बनाकर रखनी पड़ती है। ड्राइवरों ने स्पष्ट किया कि कई बार उनके लंबे टूर दो-दो महीने तक खिंच जाते हैं। इस पूरी अवधि के दौरान उन्हें यह तक नहीं पता होता कि उनका अगला दिन कहां शुरू होगा और रात किस शहर या हाईवे के किनारे कटेगी। सड़कों पर लगातार दौड़ते रहना ही उनकी तय नियति बन चुका है।

सड़क किनारे चूल्हा और केबिन ही आशियाना

सफर के दौरान खान-पान और विश्राम का इंतजाम भी खुद ड्राइवरों को ही संभालना पड़ता है। वाहन को किसी ढाबे या सुनसान सड़क के किनारे खड़ा करके वे खुद ही खाना पकाते हैं और भोजन समाप्त होते ही गाड़ी के केबिन में विश्राम करते हैं। परिवार की याद सताने पर वे केवल कुछ मिनट फोन पर बात करके घर का हालचाल जान लेते हैं, और फिर तुरंत अगले गंतव्य के लिए स्टीयरिंग संभाल लेते हैं। इन कामगारों के अनुसार, ट्रक ही उनका घर, रसोई और बिस्तर बन चुका है, जहां जागने, सोने और जीने का एकमात्र मकसद सफर को पूरा करना होता है।

सवाल-जवाब

पूर्णिया के मरंगा क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में ट्रक क्यों जमा रहते हैं?
मरंगा में दैनिक उपयोग और लाइफस्टाइल उत्पादों की कई बड़ी फैक्ट्रियां हैं, जिनके कच्चे माल और तैयार उत्पादों की ढुलाई के लिए रोजाना सैकड़ों ट्रक वहां पहुंचते हैं।
ट्रक चालकों के लंबे दौरे सामान्यतः कितने समय तक चलते हैं?
चालकों के अनुसार माल ढुलाई के लंबे टूर अक्सर दो-दो महीने तक खिंच जाते हैं, जिस दौरान वे घर से दूर रहते हैं।
सफर के दौरान चालक अपने भोजन और सोने की व्यवस्था कैसे करते हैं?
चालक सड़क किनारे अपनी गाड़ी खड़ी करके खुद ही भोजन पकाते हैं और ट्रक के केबिन को ही सोने और रहने के लिए इस्तेमाल करते हैं।
मरंगा परिसर में किन प्रमुख चालकों ने अपने अनुभव साझा किए?
अनिल कुमार, लव कुश गुप्ता, सूरज कुमार और ज्ञानेंद्र पासवान सहित कई अन्य चालकों ने अपने दिन-प्रतिदिन के संघर्षों की जानकारी दी।
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