राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित खींवासर गांव का ऊबली का बालाजी मंदिर अपनी सदियों पुरानी और असाधारण परंपरा के लिए पहचाना जाता है। सामान्य तौर पर हनुमान मंदिरों में लड्डू, पेड़े, हलवा या चूरमा का भोग लगाने की रीत देखी जाती है, परंतु इस प्राचीन धाम में पवनपुत्र को किसी भी प्रकार की मिठाई या तले-भुने पकवान नहीं परोसे जाते। यहां भगवान को पशु के पहले दूध से जमाया गया ताजा दही अर्पित करने का रिवाज है। स्थानीय निवासियों और पशुपालकों के मन में यह दृढ़ विश्वास है कि पशु के ब्याने के बाद उसके पहले दूध से तैयार दही जब बालाजी महाराज को समर्पित किया जाता है, तो उनके पशु पूरे साल हर प्रकार की संक्रामक और गंभीर बीमारियों से बचे रहते हैं। इसी गहरी आस्था के चलते केवल राजस्थान के विभिन्न कोनों से ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्य हरियाणा के ग्रामीण भी पूरे साल इस पवित्र स्थल पर दर्शन और पूजन के लिए पहुंचते हैं।
करीब दो सौ साल पुराना इतिहास और गांव की व्यावसायिक धुरी
पुजारी प्रदीप के अनुसार यह मंदिर लगभग 150 से 200 वर्ष पुराना है और यहां पहले दूध के दही का नैवेद्य चढ़ाने की परिपाटी अनवरत चली आ रही है। इस तीर्थ स्थल की लोकप्रियता और महत्ता इतनी व्यापक है कि पूरे गांव का सबसे प्रमुख व्यावसायिक इलाका भी मंदिर के नाम पर बालाजी स्टैंड कहलाता है। खींवासर की मूल आबादी और पंचायत मुख्यालय भले ही गांव के भीतरी हिस्से में स्थित हों, किंतु आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों का असली केंद्र बालाजी स्टैंड ही बन चुका है। यहां स्थानीय अनाज मंडी, बैंक, बाजार, प्राथमिक सहकारी समिति और आठवीं कक्षा तक का सरकारी विद्यालय संचालित हैं। इसके अलावा आसपास के गांव जैसे बजावा, रावतका, छावसरी और छऊ के ग्रामीण अपनी रोजमर्रा की जरूरतों, फसलों की बिक्री और जरूरी लेन-देन के लिए इसी स्टैंड पर आते हैं। कानून-व्यवस्था की देखरेख करने वाली स्थानीय पुलिस चौकी भी बालाजी स्टैंड खींवासर के नाम से ही दर्ज है और यह इलाका आसपास के देहाती इलाकों के लिए एक प्रमुख व्यापारिक हब बन चुका है।
खींवासर गांव की स्थापना और दो बीघा भूमि का दान
खींवासर गांव का खुद का इतिहास करीब 300 साल पुराना माना जाता है। पिपराली से आए मूंड गोत्र के खींवाराम जाट ने इस गांव की नींव रखी थी और उन्हीं के नाम पर इस बस्ती को खींवासर कहा जाने लगा। प्रशासनिक दृष्टि से यह गांव पहले छऊ ग्राम पंचायत के अंतर्गत आता था। वर्ष 2020 में एक बड़ा बदलाव हुआ, जब राजस्व गांव झाझड़िया की ढाणी को मिलाकर खींवासर को स्वतंत्र नई ग्राम पंचायत का दर्जा दे दिया गया। पंचायत बनने के बाद हुए पहले चुनाव में बिमला देवी यहां की पहली महिला सरपंच चुनी गईं। पदभार संभालते ही उन्होंने सार्वजनिक विकास को गति देने के लिए पंचायत भवन के निर्माण हेतु अपनी ओर से दो बीघा जमीन दान में देकर एक अनुकरणीय पहल की थी।
प्रसाद घर नहीं ले जाने का सख्त नियम और मनोकामना के प्रतीक
ऊबली का बालाजी मंदिर के महंत जगदीश प्रसाद शर्मा के अनुसार मंदिर की पूजा पद्धति में एक विशेष नियम का पालन अनिवार्य रूप से किया जाता है। श्रद्धालु जब बालाजी महाराज को पशु के पहले दूध से बना दही भोग के रूप में अर्पित करते हैं, तो उस प्रसाद को अपने घर वापस लेकर जाने की सख्त मनाही होती है। पूजा-अर्चना संपन्न होने के बाद बचे हुए दही के प्रसाद को मंदिर परिसर के भीतर ही मौजूद अन्य श्रद्धालुओं, आगंतुकों और ग्रामीणों के बीच पूरी तरह वितरित कर दिया जाता है। अपनी मुरादें पूरी करने के लिए भक्तजन यहां नारियल चढ़ाते हैं और मंदिर की वेदी व परिसर में लाल रंग की ध्वजा बांधकर सुख, समृद्धि और मवेशियों की सलामती की प्रार्थना करते हैं।
पंचायत बनने के पांच साल बाद भी दफ्तरों का अभाव
खींवासर को अलग ग्राम पंचायत का दर्जा मिले पांच साल का समय बीत चुका है, लेकिन बुनियादी प्रशासनिक सेवाओं की कमी से ग्रामीणों को निरंतर परेशानी उठानी पड़ रही है। गांव में अब तक कृषि विभाग का कोई कार्यालय नहीं खुल पाया है और न ही पटवार भवन का निर्माण हो सका है। नतीजतन, खेती-किसानी से जुड़े किसानों को प्रमाणित खाद-बीज की सलाह, तकनीकी मार्गदर्शन और गिरदावरी या जमीन के नामांतरण जैसे पटवारी से संबंधित छोटे-छोटे कामों के लिए भी सात से आठ किलोमीटर दूर छऊ पंचायत जाना पड़ता है। इस यात्रा में किसानों का कीमती समय और धन दोनों बर्बाद होते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब सरकार ने खींवासर को पंचायत मुख्यालय बना दिया है, तो इससे जुड़े सभी प्रशासनिक तंत्र और सरकारी दफ्तर यहीं सुचारू रूप से संचालित होने चाहिए ताकि आमजन को राहत मिले।
शिक्षा के लिए लंबी दूरी तय करने को विवश बच्चे
शिक्षा के क्षेत्र में भी खींवासर के सामने बुनियादी ढांचे की भारी कमी बनी हुई है। गांव में फिलहाल केवल आठवीं कक्षा तक का ही सरकारी स्कूल संचालित हो रहा है। आठवीं उत्तीर्ण करने के बाद छात्र-छात्राओं को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा हासिल करने के लिए गांव छोड़ना पड़ता है। आगे की पढ़ाई जारी रखने के लिए बच्चों को या तो निजी संस्थानों में भारी फीस देकर दाखिला लेना पड़ता है, या फिर प्रतिदिन छावसरी और बड़ागांव के सरकारी स्कूलों का लंबा सफर तय करना पड़ता है। ग्रामीण लंबे अरसे से इस सरकारी स्कूल को सीनियर सेकेंडरी स्तर तक क्रमोन्नत करने की मांग उठा रहे हैं, जिससे गांव के लड़के और लड़कियों को उच्च माध्यमिक शिक्षा अपने ही गांव में बिना किसी परेशानी के उपलब्ध हो सके।



















