मध्य प्रदेश के सीधी जिले में मानसून की चाल धीमी पड़ने से किसानों की धड़कनें बढ़ गई हैं। विंध्य क्षेत्र में अब तक जरूरत के मुताबिक बारिश नहीं हुई है, जिसका सीधा असर धान समेत खरीफ सीजन की बुवाई पर पड़ रहा है। खेतों में नमी की कमी के चलते कई किसान असमंजस में हैं कि आगे की रणनीति क्या हो। इसी बीच रीवा जिले के वीरखाम गांव के प्रगतिशील किसान राजेंद्र प्रसाद सिंह ने मौसम के हिसाब से खेती का तरीका बदलने की सलाह दी है।
कम अवधि की किस्मों पर जोर
राजेंद्र प्रसाद सिंह का कहना है कि अगर आने वाले दिनों में बारिश कम रहने की आशंका बनी रहती है, तो किसानों को लंबी अवधि वाली धान की किस्मों से दूरी बनानी चाहिए। इसकी जगह कम समय में पककर तैयार होने वाली किस्मों की बुवाई करना कहीं ज्यादा सुरक्षित विकल्प है। उनके मुताबिक मानसून के देरी से आने की वजह से खेतों में अभी तक पर्याप्त नमी नहीं बन पाई है। ऐसी स्थिति में यदि किसान परंपरागत रूप से लंबी अवधि वाली धान की किस्में लगा देते हैं, तो मौसम की मार पड़ने पर पूरी फसल का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसके उलट कम अवधि वाली किस्में न सिर्फ जोखिम घटाती हैं बल्कि समय पर बेहतर पैदावार देने में भी मददगार साबित होती हैं।
धान के साथ दलहन-तिलहन की सलाह
राजेंद्र प्रसाद सिंह ने किसानों को यह भी सुझाव दिया कि वे धान के अलावा अरहर, सोयाबीन, मूंग और तिल जैसी दलहन और तिलहन फसलों की भी बुवाई जरूर करें। उनका तर्क है कि अगर बारिश सामान्य से कम रहती है, तो यही फसलें अतिरिक्त कमाई का जरिया बन जाएंगी और धान में होने वाले संभावित घाटे की भरपाई करने में मदद करेंगी। यानी किसानों के पास सिर्फ एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय जोखिम बांटने का विकल्प रहेगा।
अच्छी बारिश हुई तो हरी खाद का फायदा
राजेंद्र प्रसाद सिंह बताते हैं कि अगर आगे चलकर अच्छी बारिश हो जाती है और धान की फसल संतोषजनक स्थिति में पहुंच जाती है, तो उस स्थिति में इन दलहन और तिलहन फसलों को उखाड़ने के बजाय खेत में ही मिलाकर हरी खाद के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसा करने से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, जमीन की उर्वरा शक्ति सुधरती है और आने वाले सीजन की फसलों के लिए खेत पहले से ज्यादा उपजाऊ बन जाता है। यानी नुकसान की आशंका में बोई गई ये फसलें बेकार नहीं जातीं, बल्कि हर हाल में किसान के काम आती हैं।
नाइट्रोजन स्थिर कर बढ़ाती हैं उर्वरता
कृषि विशेषज्ञों का भी यही मानना है कि दलहन फसलें वातावरण की नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करने का काम करती हैं। इसी वजह से इनकी खेती से जमीन की उर्वरता अपने आप बढ़ जाती है और किसानों की रासायनिक खाद पर निर्भरता घटने लगती है। इसका सीधा फायदा यह होता है कि खेती की लागत कम होती है और लंबे समय में जमीन की उत्पादन क्षमता भी बेहतर बनी रहती है। यानी यह तरीका सिर्फ मौजूदा सीजन का ही नहीं, बल्कि आने वाले कई सीजन का फायदा भी देता है।
अनिश्चित मानसून में दोहरा सुरक्षा कवच
बदलते मौसम और अनिश्चित मानसून के इस दौर में धान के साथ दलहन और तिलहन की अंतरवर्ती खेती किसानों के लिए एक तरह का दोहरा सुरक्षा कवच बनकर सामने आ रही है। बारिश कम होने की स्थिति में यह किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनती है, तो वहीं अच्छी बारिश होने पर यही फसलें खेत की सेहत सुधारकर आगे की खेती को और लाभकारी बनाने में मदद करती हैं। यही वजह है कि विंध्य क्षेत्र के किसान इस सलाह को अपनाकर मौसम की अनिश्चितता के बीच भी अपनी आमदनी और मिट्टी दोनों को सुरक्षित रखने की कोशिश में जुटे हैं।




















