मानसून का आगमन धान की खेती करने वाले किसानों के लिए राहत के साथ-साथ गंभीर चुनौतियों की घड़ी भी लेकर आता है। हरियाणा के फरीदाबाद जिले में स्थित डीग गांव के अनुभवी किसान मांगेराम के अनुसार, बरसात के दिनों में खेतों में पानी की उपलब्धता जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी खाद और उर्वरकों के इस्तेमाल में सावधानी बरतना भी है। कृषि कार्यों में की गई थोड़ी सी भी जल्दबाजी या अंधाधुंध खाद का प्रयोग पूरी की पूरी फसल को चौपट कर सकता है। लगभग 30 वर्षों से फरीदाबाद क्षेत्र में धान की पैदावार कर रहे मांगेराम का कहना है कि खेती में हर कदम बेहद नाप-तोलकर उठाना पड़ता है, क्योंकि प्रकृति और मौसम के मिजाज के आगे जरा सी लापरवाही बड़े आर्थिक संकट को जन्म दे सकती है। इस वर्ष बारिश की स्थिति संतोषजनक बनी हुई है, जिससे अच्छी उपज की उम्मीद जागी है, लेकिन इसके बावजूद फसल सुरक्षा के बुनियादी नियमों की अनदेखी भारी पड़ सकती है।
धान की फसल में यूरिया की संतुलित खुराक और मौसम का सही आंकलन
बरसात के मौसम में धान के खेतों में यूरिया डालते समय किसानों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए। मांगेराम के लंबे अनुभव के मुताबिक, एक एकड़ धान के खेत में सिर्फ 1 से डेढ़ कट्टा यूरिया ही पर्याप्त होता है। एक कट्टे में 40 किलोग्राम यूरिया आता है, और इससे अधिक मात्रा का इस्तेमाल फसल की सेहत बिगाड़ सकता है। अक्सर किसान इस मुगालते में रहते हैं कि ज्यादा उर्वरक डालने से पैदावार तेजी से बढ़ेगी या फसल अधिक लहलहाएगी, जबकि हकीकत इसके उलट है। आवश्यकता से अधिक यूरिया डालने से पौधों की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है और फसल में बीमारियां तथा कीट लगने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
मांगेराम ने अपने खेतों में धान की उन्नत किस्मों 1121 और 1509 की बुवाई की है। वे बताते हैं कि खाद का छिड़काव करने से पहले किसान को अपने खेत की मिट्टी में नमी की मात्रा, खड़े पानी का स्तर और आने वाले दिनों के मौसम के पूर्वानुमान का अच्छी तरह आंकलन कर लेना चाहिए। यदि खेत में पहले से ही बहुत अधिक पानी भरा हुआ है या भारी बारिश की संभावना है, तो यूरिया डालने से बचना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से खाद पानी में बहकर बर्बाद हो जाती है और पौधों को उसका कोई लाभ नहीं मिल पाता।
यमुना की बाढ़, नहर का सूखा और 8 लाख रुपये के नुकसान का कड़वा अनुभव
खेती में मौसम का चक्र और बुनियादी ढांचे की निर्भरता किस तरह किसान की कमर तोड़ सकती है, इसका दर्दनाक उदाहरण मांगेराम के पिछले साल के अनुभव में दिखाई देता है। फरीदाबाद में उनकी खेती दो अलग-अलग स्थानों पर फैली हुई है। इनमें से एक 12 एकड़ का खेत दिल्ली-आगरा नहर सिंचाई प्रणाली के ठीक बगल में स्थित है। इस 12 एकड़ की जमीन पर सिंचाई का एकमात्र जरिया नहर का पानी ही है और वहां ट्यूबवेल या अन्य कोई वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद नहीं है।
पिछले वर्ष जब यमुना नदी में भीषण बाढ़ आई, तो प्रशासनिक और सुरक्षा कारणों से दिल्ली-आगरा नहर में पानी की आपूर्ति पूरी तरह बंद कर दी गई। महीनों तक नहर में पानी न छोड़े जाने के कारण मांगेराम के 12 एकड़ खेत में खड़ी धान की पूरी फसल सूखकर राख हो गई। इस त्रासदी के चलते उन्हें लगभग 8 लाख रुपये का सीधा नुकसान उठाना पड़ा। इसमें से 5.5 लाख रुपये तो उन्हें जमीन के मालिक को पट्टे (लीज) के रूप में चुकाने पड़े थे। विडंबना यह रही कि पट्टे पर ली गई जमीन के इस भारी नुकसान का उन्हें प्रशासन से कोई मुआवजा भी नहीं मिला। पूरी मेहनत और पूंजी पानी के अभाव में स्वाहा हो गई।
खेती की लगातार बढ़ती लागत और 600 रुपये दैनिक मजदूर की चुनौती
आज के दौर में कृषि केवल मौसम की मार तक सीमित नहीं है, बल्कि लगातार बढ़ती उत्पादन लागत भी किसानों के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। मांगेराम के अनुसार, वर्तमान समय में धान की खेती करने पर प्रति एकड़ औसतन 20,000 रुपये का खर्च आता है। इस खर्च में बीज, जुताई, सिंचाई और खाद की लागत शामिल है। इसके अलावा खेतों में रोपाई, निराई और कटाई के लिए मजदूरों की आवश्यकता पड़ती है।
वर्तमान में फरीदाबाद क्षेत्र में एक कृषि मजदूर की दैनिक दिहाड़ी 600 रुपये तक पहुंच चुकी है। जब मौसम साथ नहीं देता या फसल का उचित बाजार मूल्य नहीं मिलता, तो प्रति एकड़ 20,000 रुपये का निवेश और मजदूरों की भारी लागत निकालना बेहद मुश्किल हो जाता है। ऐसे में यदि किसी कारणवश फसल खराब होती है, तो किसान कर्ज के दलदल में फंसने को मजबूर हो जाता है।
फसल निगरानी, जल निकासी और कृषि विशेषज्ञों की सलाह का महत्व
फसल को बीमारियों और नुकसान से बचाने के लिए निरंतर निगरानी सबसे असरदार उपाय है। मांगेराम का सुझाव है कि किसानों को हर दिन अपने खेतों का मुआयना करना चाहिए। यदि धान की पत्तियों का रंग पीला या असामान्य होने लगे, या पौधों का विकास अचानक रुक जाए, तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। खेत में किसी भी प्रकार के कीट आक्रमण या बीमारी के लक्षण दिखते ही बिना देरी किए उसकी सही वजह तलाशनी चाहिए।
बाजार से बिना जानकारी के मनमानी कीटनाशक दवाइयां या अत्यधिक मात्रा में खाद खरीदकर खेत में डालना फसल के लिए घातक साबित हो सकता है। किसान को हमेशा अपने नजदीकी सरकारी कृषि विभाग या प्रमाणित कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से संपर्क करके ही सही दवा और उचित मात्रा का चयन करना चाहिए। इसके साथ ही, भारी बारिश के दौरान खेतों में अतिरिक्त पानी जमा न होने पाए, इसके लिए जल निकासी की उचित व्यवस्था पहले से तैयार रखनी चाहिए।
क्या आने वाले समय में युवा करेंगे खेती? बढ़ते जोखिम पर गंभीर सवाल
कृषि क्षेत्र में बढ़ते आर्थिक जोखिम, अनिश्चित मौसम और सरकारी मदद के अभाव पर मांगेराम ने गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि यदि खेती में इसी तरह लगातार नुकसान का सामना करना पड़ा और लागत के मुकाबले मुनाफा न के बराबर रहा, तो आने वाले समय में नई पीढ़ी खेती के पेशे से पूरी तरह मुंह मोड़ लेगी। युवा अब खेती में अपना भविष्य देखने के बजाय अन्य रोजगारों की तरफ रुख करने को मजबूर होंगे।
8 लाख रुपये का भीषण घाटा सहने के बावजूद मांगेराम इस साल बेहतर बारिश के दम पर दोबारा उम्मीद बांधे हुए हैं। लेकिन उनका यह दृढ़ विश्वास है कि अनुशासन, खाद-पानी की सीमित और संतुलित खुराक, तथा समय पर सही फैसले ही किसान की मेहनत को सुरक्षित रख सकते हैं।





















