मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर परिसर के भीतर नागपंचमी के पावन पर्व पर उस समय अफरा-तफरी का माहौल बन गया जब नागचंद्रेश्वर मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का भारी जनसैलाब उमड़ पड़ा। त्योहार के इस विशेष दिन पर नागचंद्रेश्वर मंदिर के साथ-साथ हरसिद्धि मंदिर और बड़े गणेश मंदिर के आसपास के रास्तों पर अचानक स्थिति पूरी तरह से बेकाबू हो गई। अचानक बढ़ी भीड़ के दबाव के कारण रास्ते में भयंकर धक्का-मुक्की शुरू हो गई, जिससे भगदड़ जैसी खतरनाक स्थिति पैदा हो गई और इस दौरान दबने से तीन लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।
प्रशासन की मुस्तैदी और घायलों का इलाज
घटना के तुरंत बाद मौके पर मौजूद स्थानीय प्रशासन और पुलिस बल ने मोर्चा संभाला और स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए त्वरित कार्रवाई शुरू की। इस हादसे में घायल हुए सभी तीनों लोगों को फौरन प्राथमिक सहायता दी गई और उसके बाद बेहतर चिकित्सीय देखभाल के लिए पास के ही जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है। इस घटना के सामने आने के बाद अब स्थानीय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन समिति त्योहारों के दौरान सुरक्षा इंतजामों और भीड़ को नियंत्रित करने के तौर-तरीकों को लेकर विशेष रूप से सतर्क हो गए हैं ताकि भविष्य में इस तरह की अव्यवस्था दोबारा न हो सके।
साल में केवल एक बार खुलते हैं इस अलौकिक धाम के कपाट
मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित पावन महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर परिसर की ठीक तीसरी मंजिल पर भगवान नागचंद्रेश्वर का यह अद्भुत और पवित्र धाम स्थापित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि इसके कपाट पूरे साल में केवल एक बार नागपंचमी के शुभ अवसर पर ठीक 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं। इसी एक दिन की अवधि में देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। नागपंचमी के इस विशेष दिन के अलावा शेष पूरे साल भर इस मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए पूरी तरह बंद रहते हैं, जिसके कारण इस एक दिन दर्शन के लिए भारी भीड़ जुटती है।
गर्भगृह में विराजमान है 11वीं शताब्दी की दुर्लभ प्रतिमा
मंदिर के गर्भगृह के भीतर स्थापित यह प्राचीन प्रतिमा 11वीं शताब्दी की है जो भारतीय वास्तुकला, प्राचीन कला और गहरी आस्था का एक अनूठा संगम पेश करती है। इस पवित्र स्थान पर देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती दस से ग्यारह फनों वाले एक विशाल शेषनाग के छत्र के नीचे विराजमान हैं। इस बेहद मनमोहक और दुर्लभ स्वरूप में विघ्नहर्ता प्रथम पूज्य भगवान गणेश भी उनके साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। धार्मिक जानकारों और इतिहासकारों का मानना है कि पूरी दुनिया में भगवान शिव का ऐसा अनोखा और दुर्लभ स्वरूप अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलता है।
समृद्ध इतिहास और पौराणिक मान्यताओं का अनूठा संगम
उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार इस अत्यंत दुर्लभ और अद्वितीय मूर्ति की स्थापना लगभग 1050 ईस्वी में परमार वंश के प्रतापी और महान राजा भोज के शासनकाल के दौरान कराई गई थी। इसके साथ ही कई पौराणिक मान्यताएं भी इस स्थान से जुड़ी हुई हैं जिनके अनुसार नागराज तक्षका ने इसी पवित्र स्थान पर बैठकर भगवान भोलेनाथ की अत्यंत कठोर तपस्या की थी। यही कारण है कि इस स्थान का धार्मिक और ऐतिहासिक दोनों दृष्टियों से बहुत बड़ा महत्व माना गया है।
नागपंचमी पर उमड़ता है दुनिया भर से श्रद्धालुओं का जनसैलाब
चूंकि इस पावन धाम के दर्शन साल भर में केवल एक ही दिन मिल पाते हैं, इसलिए देश और दुनिया के कोने-कोने से लाखों की संख्या में श्रद्धालु नागपंचमी के दिन उज्जैन पहुंचते हैं। सनातन धर्म की लोक आस्था के अनुसार नागपंचमी के इस पवित्र संयोग पर केवल नागचंद्रेश्वर देव के दर्शन मात्र से ही जातकों की जन्मकुंडली में मौजूद कालसर्प दोष, सर्प दोष और अन्य ग्रहों के सभी प्रकार के नकारात्मक प्रभाव पूरी तरह से समाप्त हो जाते हैं। इसी गहरी धार्मिक आस्था के चलते हर साल इस दिन यहां भारी भीड़ जमा होती है।





















