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मोहन भागवत बोले, भारत और हिंदू समाज के खिलाफ सक्रिय हैं आसुरी ताकतें, सत्ता परिवर्तन से नहीं सुलझेगी समस्यामहाराष्ट्र
20 अक्तू॰ 2026, 11:15 am (2 घंटे पहले)· 3

मोहन भागवत बोले, भारत और हिंदू समाज के खिलाफ सक्रिय हैं आसुरी ताकतें, सत्ता परिवर्तन से नहीं सुलझेगी समस्या

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने नागपुर में विजयादशमी उत्सव को संबोधित करते हुए कहा कि कुछ आसुरी ताकतें देश और हिंदू समाज को तोड़ने में जुटी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सत्ता परिवर्तन से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित पारंपरिक विजयादशमी उत्सव के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत, हिंदू समाज और संघ को कमजोर करने या तोड़ने के लिए कुछ आसुरी ताकतें लगातार सुनियोजित तरीके से सक्रिय रहती हैं। इन ताकतों को समाज के भीतर से ही कुछ ऐसे लोगों का साथ मिलता है जिनकी प्रकृति वैसी ही होती है। इसके अलावा, छोटे राजनीतिक स्वार्थ और विवेक की कमी के चलते कुछ महत्वाकांक्षी नेता भी अनजाने में या जानबूझकर इन ताकतों के साथ खड़े हो जाते हैं।

पश्चिमी देशों की आंधी और सांस्कृतिक संकट

मोहन भागवत ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य का जिक्र करते हुए बताया कि दुनिया भर में मानवीय मूल्यों, संस्कृति, भद्रता और सांस्कृतिक संस्कारों को समाप्त करने का संकल्प लेकर पश्चिम दिशा से एक वैचारिक आंधी उठी है। इस स्थिति से आज दुनिया के बड़े-बड़े और तथाकथित प्रगतिशील देश भी बुरी तरह जूझ रहे हैं और खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। रिजीम चेंज यानी सरकार या व्यवस्था बदलने के मुद्दे पर उन्होंने दो टूक कहा कि केवल सत्ता परिवर्तन कर देने से मूल समस्याओं का अंत नहीं हो जाता है।

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सनातन धर्म की रक्षा में संघ की भूमिका

आरएसएस के सरसंघचालक ने 20 अक्टूबर को अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इतिहास के लंबे संघर्षकाल के दौरान सनातन और हिंदू धर्म को जीवित और मजबूत बनाए रखने में एक ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिका निभाई है। उन्होंने अतीत के घटनाक्रमों को याद करते हुए बताया कि भारत पर हुए इस्लामी आक्रमणों और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच हिंदू समाज को बिखरने से रोकने में संघ के सांस्कृतिक और संगठनात्मक अभियानों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

सुरक्षा कवच के रूप में संघ का उभार

नागपुर में भारी जनसमूह को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संघ सिर्फ एक साधारण संगठन भर नहीं है, बल्कि यह हर कठिन और विपरीत दौर में हिंदू संस्कृति, पहचान और आस्था की रक्षा करने वाला एक अचूक सुरक्षा कवच साबित हुआ है। संघ ने हमेशा समाज को एकजुट करने और उसके सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने का काम किया है।

सवाल-जवाब

मोहन भागवत ने विजयादशमी उत्सव को कहां संबोधित किया?
मोहन भागवत ने नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित पारंपरिक विजयादशमी उत्सव को संबोधित किया।
संघ प्रमुख ने किस तारीख को यह बयान दिया?
मोहन भागवत ने यह संबोधन 20 अक्टूबर को दिया था।
रिजीम चेंज यानी सत्ता परिवर्तन को लेकर संघ प्रमुख का क्या रुख था?
उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सत्ता बदलना किसी भी समस्या का वास्तविक समाधान नहीं है।
किन ताकतों का जिक्र किया गया?
उन्होंने भारत, हिंदू समाज और संघ को तोड़ने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करने वाली आसुरी ताकतों का जिक्र किया।
संघ की ऐतिहासिक भूमिका क्या बताई गई?
संघ ने सदियों के संघर्ष के बीच सनातन और हिंदू धर्म को जीवंत और अडिग बनाए रखने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Li Wei@li-wei·22 मिनट पहले

वैश्विक भू-राजनीति और वैचारिक लड़ाइयों के दौर में हर देश अपनी संस्कृति और पहचान बचाने की बात कर रहा है। चीन में भी पारंपरिक मूल्यों और वैचारिक सुरक्षा पर ऐसा ही जोर रहता है, फर्क सिर्फ इतना है कि वहां इसका तरीका राजनीतिक नियंत्रण का होता है और यहां वैचारिक लामबंदी का।

Ravikash Gupta@ravikash·45 मिनट पहले

नागपुर में पिछले साल विजयादशमी पर जब मैं रेशिमबाग मैदान के पास से गुजर रहा था, तब ऐसा ही जनसैलाब देखा था। भागवत जी की बात सही है कि सिर्फ सरकार बदलने से समाज की अंदरूनी दिक्कतें खत्म नहीं हो जातीं, जब तक लोग खुद जागरूक न हों।

Riya Menon@riya-menon·44 मिनट पहले

रविकश जी, आप तो वहाँ से गुजरे थे, क्या वाकई भीड़ में इस तरह की बातों की कोई चर्चा हो रही थी?

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

पश्चिम से आने वाली सांस्कृतिक आंधी वाली बात पर सोचना पड़ेगा, बाकी दुनिया सचमुच बेबस है क्या?

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन भाई, पश्चिमी आंधी वाली बात पर मुझे वो दिन याद आ गया जब मैं एक विदेशी यूनिवर्सिटी में सेमिनार कवर करने गया था, वहाँ के professors खुद अपनी संस्कृति के पतन से परेशान दिखे थे।

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