नागपुर के रेशिमबाग मैदान में आयोजित पारंपरिक विजयादशमी उत्सव के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत, हिंदू समाज और संघ को कमजोर करने या तोड़ने के लिए कुछ आसुरी ताकतें लगातार सुनियोजित तरीके से सक्रिय रहती हैं। इन ताकतों को समाज के भीतर से ही कुछ ऐसे लोगों का साथ मिलता है जिनकी प्रकृति वैसी ही होती है। इसके अलावा, छोटे राजनीतिक स्वार्थ और विवेक की कमी के चलते कुछ महत्वाकांक्षी नेता भी अनजाने में या जानबूझकर इन ताकतों के साथ खड़े हो जाते हैं।
पश्चिमी देशों की आंधी और सांस्कृतिक संकट
मोहन भागवत ने वैश्विक परिप्रेक्ष्य का जिक्र करते हुए बताया कि दुनिया भर में मानवीय मूल्यों, संस्कृति, भद्रता और सांस्कृतिक संस्कारों को समाप्त करने का संकल्प लेकर पश्चिम दिशा से एक वैचारिक आंधी उठी है। इस स्थिति से आज दुनिया के बड़े-बड़े और तथाकथित प्रगतिशील देश भी बुरी तरह जूझ रहे हैं और खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं। रिजीम चेंज यानी सरकार या व्यवस्था बदलने के मुद्दे पर उन्होंने दो टूक कहा कि केवल सत्ता परिवर्तन कर देने से मूल समस्याओं का अंत नहीं हो जाता है।
सनातन धर्म की रक्षा में संघ की भूमिका
आरएसएस के सरसंघचालक ने 20 अक्टूबर को अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इतिहास के लंबे संघर्षकाल के दौरान सनातन और हिंदू धर्म को जीवित और मजबूत बनाए रखने में एक ऐतिहासिक और निर्णायक भूमिका निभाई है। उन्होंने अतीत के घटनाक्रमों को याद करते हुए बताया कि भारत पर हुए इस्लामी आक्रमणों और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच हिंदू समाज को बिखरने से रोकने में संघ के सांस्कृतिक और संगठनात्मक अभियानों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।
सुरक्षा कवच के रूप में संघ का उभार
नागपुर में भारी जनसमूह को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि संघ सिर्फ एक साधारण संगठन भर नहीं है, बल्कि यह हर कठिन और विपरीत दौर में हिंदू संस्कृति, पहचान और आस्था की रक्षा करने वाला एक अचूक सुरक्षा कवच साबित हुआ है। संघ ने हमेशा समाज को एकजुट करने और उसके सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजने का काम किया है।
























