मुंबई की सड़कों पर 18 अक्टूबर 2026 को अभिनेता टाइगर श्रॉफ के वाहन पर हुई गोलीबारी की वारदात ने हिंदी सिनेमा जगत में एक बार फिर उस पुराने खौफ को जिंदा कर दिया है, जिसे फिल्म उद्योग लंबे समय से पीछे छोड़ने की कोशिश करता रहा है। इस सनसनीखेज घटना के तुरंत बाद हरकत में आई मुंबई पुलिस ने कई संदिग्धों को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है, ताकि संगठित अपराध गिरोहों के साथ जुड़े संभावित तारों को खोला जा सके। जांच एजेंसियों के सामने मुख्य चुनौती यह पता लगाना है कि इस जानलेवा हमले का मुख्य साजिशकर्ता कौन था और पर्दे पर एक्शन हीरो के तौर पर पहचाने जाने वाले अभिनेता को आखिर किस मकसद से निशाना बनाया गया।
यह घटना भले ही हालिया दिनों की हो, लेकिन मायानगरी और जुर्म की दुनिया का नाता दशकों पुराना और बेहद पेचीदा रहा है। किसी जमाने में यह रिश्ता महज मेलजोल, सामाजिक रसूख और फिल्मी पार्टियों की चकाचौंध तक सीमित दिखाई देता था, मगर धीरे-धीरे इसने जबरन वसूली, जान से मारने की धमकियों और फिल्मों के निर्माण पर नियंत्रण स्थापित करने जैसे भयावह रूप अख्तियार कर लिए। समय के साथ गिरोहों के चेहरे और तरीके बदलते रहे हैं। जिस दौर में हाजी मस्तान और करीम लाला जैसे नामों का दबदबा था, वह अलग था। इसके बाद 1990 के दशक में दाऊद इब्राहिम और उसकी डी-कंपनी का खौफ छाया, फिर अबू सलेम का नाम सुर्खियों में आया और मौजूदा दौर में लॉरेंस बिश्नोई के गिरोह से जुड़ी धमकियों ने कलाकारों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
शुरुआती दौर का मेलजोल और ग्लैमर का आकर्षण
बंबई के अंडरवर्ल्ड के शुरुआती अध्यायों पर नजर डालें तो हाजी मस्तान और करीम लाला का समय अपराध जगत के आधुनिक स्वरूप से भिन्न था। उस कालखंड में गैरकानूनी धंधों में शामिल शख्सियतों का सिनेमाई हस्तियों के साथ संपर्क मुख्य रूप से सामाजिक मेलजोल, जलसों और महफिलों के जरिए दिखाई देता था। हर संबंध अनिवार्य रूप से सीधे अपराध या हिंसा से नहीं जुड़ा होता था, लेकिन सिनेमाई दुनिया का ग्लैमर और उसका सामाजिक प्रभाव हमेशा से ऐसे लोगों को आकर्षित करता रहा है जो समाज में स्वीकार्यता, रुतबा और शोहरत हासिल करना चाहते थे।
इसके साथ ही फिल्मों का व्यवसाय आर्थिक रूप से भारी निवेश की मांग करता था। एक समय ऐसा था जब फिल्म निर्माताओं के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से औपचारिक ऋण प्राप्त करने के रास्ते पूरी तरह बंद या बेहद सीमित थे। ऐसे संकट के दौर में व्यक्तिगत नेटवर्क, अनौपचारिक कर्जदाताओं और निजी स्तर पर मिलने वाले पैसों पर उद्योग की निर्भरता बढ़ गई। इस व्यवस्था ने हर पृष्ठभूमि के निवेशकों और फाइनेंसरों के लिए फिल्म निर्माण में अपनी पूंजी लगाने और उसके बदले बड़ा मुनाफा कमाने का एक खुला मैदान तैयार कर दिया। जुर्म से जुड़े लोगों ने इसे अपनी काली कमाई को खपाने और फिल्म जगत के जरिए भारी लाभ कमाने के सबसे मुफीद जरिए के रूप में देखा।
नब्बे का दशक: डी-कंपनी, अबू सलेम और वसूली का खौफनाक जाल
समय के साथ यह रिश्ता सिर्फ पैसे लगाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संगठित गिरोहों ने फिल्म निर्माताओं, संगीत कंपनियों और चोटी के कलाकारों को सीधे तौर पर ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया। 1990 के दशक तक आते-आते यह समस्या पूरे उद्योग के लिए एक गंभीर संकट बन गई थी। आधिकारिक जांचों और विभिन्न खुलासों से यह तथ्य सामने आया कि दाऊद इब्राहिम की अगुवाई वाली डी-कंपनी और उसके गुर्गों ने मनोरंजन जगत को रंगदारी वसूलने का आसान जरिया बना लिया था।
इस पूरे दौर में दाऊद इब्राहिम और बाद में अबू सलेम जैसे गैंगस्टरों के नाम लगातार सामने आते रहे। देश के बड़े निर्देशकों, निर्माताओं और कलाकारों को फोन पर जान से मारने की धमकियां देकर करोड़ों रुपयों की मांग की जाने लगी। जो लोग इन मांगों के आगे झुकने से इनकार करते, उन्हें हिंसक हमलों के जरिए डराने की कोशिश की जाती थी। नब्बे के दशक में घटी दो प्रमुख घटनाओं ने इस कड़वे सच को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया कि जोखिम केवल कैमरे के सामने काम करने वाले सितारों तक सीमित नहीं था, बल्कि संगीत कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों, पर्दे के पीछे काम करने वाले फिल्मकारों और निर्माण से जुड़े लोगों की जान भी हर वक्त खतरे में थी।
आपराधिक गिरोह केवल मुनाफे का हिस्सा नहीं मांग रहे थे, बल्कि वे यह भी तय करने की कोशिश करने लगे थे कि किस फिल्म में कौन सा कलाकार काम करेगा, फिल्मों के विदेशी वितरण अधिकार किसे मिलेंगे और संगीत के अधिकार किस कंपनी को बेचे जाएंगे। अंडरवर्ल्ड का कोई एक स्थिर ढांचा नहीं था, बल्कि अलग-अलग गिरोहों के बीच आपसी वर्चस्व की जंग और आए दिन बदलते गठबंधनों ने फिल्म जगत के लोगों के सामने दोहरे खतरे खड़े कर दिए थे।
1998 में उद्योग का दर्जा और आर्थिक सुधारों का असर
सिनेमा पर मंडराते काले साए और बढ़ते वित्तीय संकट के बीच भारत सरकार ने 1998 में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए फिल्म निर्माण को आधिकारिक रूप से उद्योग का दर्जा प्रदान किया। इस महत्वपूर्ण फैसले ने फिल्म निर्माण की पूरी वित्तीय रीढ़ को बदल कर रख दिया। अब फिल्म निर्माता सीधे बैंकों और मान्यता प्राप्त वित्तीय संस्थानों से पारदर्शी तरीके से कर्ज लेने के पात्र हो गए, जिससे निजी व संदिग्ध फाइनेंसरों पर उनकी निर्भरता में भारी कमी आई।
हालांकि औपचारिक वित्तपोषण उपलब्ध होने के बावजूद संगठित अपराध का खतरा रातों-रात खत्म नहीं हुआ। सुरक्षा एजेंसियों की कड़ी कार्रवाई, पुलिस छापों, प्रमुख अपराधियों की गिरफ्तारियों और अदालती मुकदमों के चलते पुराने गिरोहों की कमर जरूर टूटी और बंबई की पुरानी आपराधिक व्यवस्था का प्रभाव काफी हद तक कमजोर पड़ा। इसके बावजूद मशहूर हस्तियों को निशाना बनाकर त्वरित चर्चा में आने की प्रवृत्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी।
पुराने तौर-तरीकों से अलग सोशल मीडिया और अंतरराज्यीय गिरोहों का उभार
वर्तमान समय में अपराध का स्वरूप मुंबई की स्थानीय गलियों से निकलकर पूरी तरह बदल चुका है। हाल के वर्षों में लॉरेंस बिश्नोई के गिरोह से जुड़े घटनाक्रमों ने संगठित अपराध के एक बिल्कुल अलग चेहरे को उजागर किया है। जहां पुराने जमाने का अंडरवर्ल्ड मुंबई के स्थानीय इलाकों में अपने प्रभाव, जमीन पर मौजूद संपर्कों और पारंपरिक हफ्ता वसूली के मॉडल पर काम करता था, वहीं आज के नए सिंडिकेट कई राज्यों की सीमाओं के पार फैले नेटवर्क के जरिए संचालित हो रहे हैं।
इस नए दौर में धमकियों को फैलाने और खौफ पैदा करने के लिए सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल किया जा रहा है। इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों के जरिए किसी भी हमले की जिम्मेदारी लेना या धमकी भरे संदेश प्रसारित करना बेहद आसान हो गया है। 18 अक्टूबर 2026 को टाइगर श्रॉफ की कार पर हुए हमले के मामले में भी पुलिस इसी नजरिए से पड़ताल कर रही है। जांचकर्ताओं के लिए यह साफ करना जरूरी है कि मौके पर गोली चलाने वाले कौन थे, उन्हें किसके निर्देश पर भेजा गया था और क्या इसके पीछे वास्तविक मकसद फिरौती था, कोई व्यापारिक विवाद था या फिर केवल सनसनी फैलाकर पब्लिसिटी बटोरने की साजिश रची गई थी।
अपराधियों के निशाने पर क्यों रहते हैं फिल्म स्टार
सिनेमा के सितारों पर निशाना साधे जाने के पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हमेशा से रहे हैं: अथाह पैसा, समाज में व्यापक पहुंच और देशव्यापी प्रचार। किसी साधारण नागरिक के मुकाबले जब किसी बड़े अभिनेता या फिल्म हस्ती को धमकी दी जाती है, तो वह खबर चंद मिनटों में पूरे देश के मीडिया और आम जनता का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। गिरोहों के लिए यह पहचान अपने प्रभाव को साबित करने और दहशत कायम करने का एक बेहद कारगर हथियार बन जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि हर घटना को एक ही चश्मे से देखना जांच के लिहाज से सही नहीं हो सकता। किसी मामले में जबरन वसूली मुख्य वजह हो सकती है, तो कहीं निजी रंजिश, व्यावसायिक लेन-देन या केवल नाम चमकाने की कोशिश हो सकती है। यही कारण है कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को केवल घटना के बाद की गिरफ्तारियों तक सीमित रहने के बजाय विभिन्न राज्यों की पुलिस के साथ खुफिया जानकारी साझा करने, रंगदारी के सिंडिकेट्स पर सख्त निगरानी रखने और पुख्ता सबूतों के आधार पर अदालत में मामले दर्ज करने की जरूरत है। वहीं दूसरी ओर, फिल्म जगत को भी अपनी निजी सुरक्षा मजबूत करने और किसी भी संदिग्ध धमकी को बिना छिपाए तुरंत पुलिस के संज्ञान में लाने की सक्रियता दिखानी होगी, ताकि सिनेमा और अपराध का यह पुराना चक्र हमेशा के लिए तोड़ा जा सके।



















