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पुणे में डीजे की तेज आवाज पर बवाल, राज्यमंत्री माधुरी मिसाल ने सभी त्योहारों के लिए एक जैसे नियम की मांग रखीमहाराष्ट्र
8 सित॰ 2026, 9:54 pm (48 दिन पहले)· 1

पुणे में डीजे की तेज आवाज पर बवाल, राज्यमंत्री माधुरी मिसाल ने सभी त्योहारों के लिए एक जैसे नियम की मांग रखी

पुणे में तेज आवाज वाले डीजे सिस्टम के खिलाफ बढ़ते विरोध के बीच महाराष्ट्र की राज्यमंत्री माधुरी मिसाल ने गणेशोत्सव समेत सभी त्योहारों में डीजे पर रोक लगाकर पारंपरिक वाद्य यंत्रों के इस्तेमाल की वकालत की है.

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव नजदीक आते ही डीजे और तेज साउंड सिस्टम को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. पुणे में लोग ऊंची आवाज वाले डीजे बजाए जाने का विरोध कर रहे हैं और अब राज्य की एक मंत्री ने भी इस मुद्दे पर खुलकर अपनी राय रखी है.

माधुरी मिसाल ने डीजे पर पूरी तरह रोक की मांग की

महाराष्ट्र सरकार में सामाजिक न्याय एवं शहरी विकास राज्य मंत्री माधुरी मिसाल ने सोमवार को एक वीडियो संदेश जारी करके अपना पक्ष रखा. उन्होंने कहा कि वह त्योहारों के दौरान डीजे सिस्टम के इस्तेमाल की खुद पूरी तरह विरोधी हैं. उनका कहना है कि गणेशोत्सव हो या कोई और धार्मिक या सार्वजनिक आयोजन, हर त्योहार को पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ मनाया जाना चाहिए, न कि कानफाड़ू डीजे सिस्टम के भरोसे. मंत्री के मुताबिक तेज आवाज में बजने वाला संगीत आम लोगों के लिए मुसीबत बन जाता है, और इसका सबसे ज्यादा असर स्कूल-कॉलेज जाने वाले छात्रों, बुजुर्गों और बीमार मरीजों पर पड़ता है, जिन्हें शांत माहौल की जरूरत होती है.

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ढोल-ताशा से मनेगा उत्सव, डीजे की जरूरत नहीं

माधुरी मिसाल ने जोर देकर कहा कि गणेशोत्सव महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा त्योहार है, इसलिए इसे उसी पुरानी और पारंपरिक शैली में मनाया जाना चाहिए. उनके अनुसार ढोल, ताशा और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों से भी उत्सव की रौनक कम नहीं होती, ऐसे में तेज आवाज वाले डीजे सिस्टम की कोई जरूरत नहीं रह जाती.

विरोध को लेकर सफाई भी दी

अपने बयान पर उठ सकने वाले सवालों को भांपते हुए मंत्री ने साफ किया कि डीजे सिस्टम के विरोध का मतलब त्योहार मनाने के खिलाफ होना बिलकुल नहीं है. उनका आरोप है कि कुछ लोग जानबूझकर इस पूरे मसले को गलत तरीके से पेश कर रहे हैं और इसे त्योहारों पर पाबंदी लगाने की कोशिश जैसा दिखा रहे हैं. माधुरी मिसाल ने कहा कि गणेशोत्सव की गौरवशाली परंपरा और उसका उत्साह कम होने की कोई वजह नहीं बनती, बल्कि इसे अनुशासित और परंपरागत ढंग से मनाया जाना चाहिए ताकि किसी को परेशानी न हो.

पुणे के 32 गणेश मंडलों ने पहले ही दिखाई राह

अपनी बात को पुख्ता करने के लिए मंत्री ने पुणे के 32 गणेश मंडलों की मिसाल भी दी. इन मंडलों ने हाल में हुए दही हांडी उत्सव में डीजे सिस्टम का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया और पूरा आयोजन पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ ही संपन्न कराया. माधुरी मिसाल के अनुसार यह उदाहरण बताता है कि बिना तेज डीजे के भी उत्सव उतने ही जोश के साथ मनाया जा सकता है. उन्होंने उम्मीद जताई कि पुणे के लोग आने वाले गणेशोत्सव में भी यही परंपरा आगे बढ़ाकर पूरे महाराष्ट्र के सामने एक मिसाल पेश करेंगे.

सवाल-जवाब

माधुरी मिसाल ने क्या मांग की है?
उन्होंने गणेशोत्सव समेत सभी त्योहारों में तेज आवाज वाले डीजे सिस्टम पर पूरी तरह रोक लगाने और पारंपरिक वाद्य यंत्रों के इस्तेमाल की मांग की है.
माधुरी मिसाल महाराष्ट्र सरकार में किस पद पर हैं?
वह महाराष्ट्र सरकार में सामाजिक न्याय एवं शहरी विकास राज्य मंत्री हैं.
मंत्री ने यह बयान कब दिया?
उन्होंने सोमवार को जारी एक वीडियो संदेश में यह बयान दिया.
मंत्री के मुताबिक तेज डीजे से सबसे ज्यादा नुकसान किसे होता है?
उनके मुताबिक तेज आवाज का सबसे बुरा असर छात्रों, बुजुर्गों और बीमार लोगों पर पड़ता है.
क्या माधुरी मिसाल त्योहार मनाने के खिलाफ हैं?
नहीं, उन्होंने साफ किया कि उनका विरोध सिर्फ तेज डीजे सिस्टम से है, त्योहार मनाने से नहीं.
मंत्री ने अपनी मांग के समर्थन में कौन-सा उदाहरण दिया?
उन्होंने पुणे के 32 गणेश मंडलों का उदाहरण दिया, जिन्होंने हाल में दही हांडी उत्सव डीजे के बिना पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ मनाया.
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·48 दिन पहले

माधुरी मिसाल का यह बयान सिर्फ पुणे तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी आने वाले त्योहारों और कांवड़ यात्रा जैसे आयोजनों के दौरान डीजे के शोर पर प्रशासनिक सख्ती की बहस को हवा दे रहा है। जब कोई मंत्री पारंपरिक वाद्य यंत्रों की वकालत करते हुए छात्रों और मरीजों की परेशानी को रेखांकित करती है, तो यह शासन और जनहित के बीच संतुलन बनाने की एक प्रशासनिक कोशिश बन जाती है। आगे यह देखना अहम होगा कि क्या अन्य क्षेत्रीय निकाय भी पुणे के 32 गणेश मंडलों की तरह स्वेच्छा से ऐसा कोई कदम उठाते हैं या इसके लिए कानूनी दिशानिर्देशों की जरूरत पड़ेगी।

Karan Malhotra@karan-malhotra·48 दिन पहले

यह मामला केवल सांस्कृतिक प्राथमिकताओं का नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कानूनी प्रावधानों का भी है। जब सार्वजनिक आयोजनों में डेसिबल सीमा का उल्लंघन होता है, तो पुलिस और प्रशासन के लिए यह न्यायालय के निर्देशों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लागू करने की एक गंभीर परीक्षा बन जाता है।

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