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पश्चिम एशिया संघर्ष और करेंसी उतार-चढ़ाव ने बदला भारत का सोना आयात समीकरण, त्योहारों से पहले की स्थितिमनी
8 सित॰ 2026, 11:51 pm (49 मिनट पहले)· 2

पश्चिम एशिया संघर्ष और करेंसी उतार-चढ़ाव ने बदला भारत का सोना आयात समीकरण, त्योहारों से पहले की स्थिति

पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष और अमेरिकी डॉलर में मजबूती के बीच भारत का सोना आयात बिल FY26 में 72 अरब डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि आयात शुल्क में बढ़ोतरी और सोना न खरीदने की अपील के बावजूद आगामी त्योहारी सीजन को देखते हुए जुलाई में सोना आयात में फिर से बड़ा उछाल दर्ज किया गया है।

पश्चिम एशिया में जारी सैन्य संघर्ष अपने छठे महीने में प्रवेश कर चुका है, जहां अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव निकट भविष्य में शांत होता नहीं दिख रहा है। एक तरफ जहां वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां नाजुक बनी हुई हैं, वहीं अंतरराष्ट्रीय सर्राफा बाजार में जबरदस्त हलचल देखी जा रही है। भारत के संदर्भ में सोना केवल एक वित्तीय निवेश भर नहीं है, बल्कि इसका दशकों पुराना संबंध सांस्कृतिक परंपराओं, पारिवारिक समृद्धि और आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। इसी गहरी साख के कारण भारत दुनिया में सोने का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश बना हुआ है। हालांकि, भू-राजनीतिक संकट के समय सोने जैसी सुरक्षित संपत्तियों की मांग वैश्विक स्तर पर बढ़ती है, लेकिन इसके साथ ही भारत जैसे प्रमुख आयात करने वाले देशों के लिए व्यापक आर्थिक चुनौतियां भी पैदा होती हैं। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है, भारत का सोना आयात बिल अपने आप बढ़ जाता है।

मैक्रो-इकोनॉमिक दबाव और एक्सचेंज रेट का गणित

भारत दुनिया भर में चीन के बाद सोने का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में भारत में 711 टन सोने की खपत दर्ज की गई, जो चीन की 792 टन की कुल खपत के काफी करीब थी। हालांकि, भारत में इस्तेमाल होने वाले सोने का बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों से आयात किया जाता है। वित्त वर्ष FY26 के दौरान भारत के कुल 775 अरब डॉलर के व्यापारिक आयात बिल में अकेले सोने की हिस्सेदारी 9.29 प्रतिशत रही। पिछले वित्त वर्ष में देश ने कम से कम 72 अरब डॉलर मूल्य का सोना आयात किया, जो इससे पिछले साल की तुलना में 24 प्रतिशत की जोरदार बढ़ोतरी दर्शाता है।

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सोना आयात बिल में इस भारी बढ़ोतरी के पीछे मुख्य वजह अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये के बीच का एक्सचेंज रेट है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का कारोबार अमेरिकी डॉलर में किया जाता है, इसलिए पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद डॉलर सूचकांक में आई मजबूती ने भारत को विदेशी मुद्रा भंडार से अधिक रकम खर्च करने पर मजबूर कर दिया है।

रुपये की विनिमय दर में होने वाले बदलाव का घरेलू सोने की लागत पर कितना असर पड़ता है, इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रति ट्रॉय औंस 4,600 डॉलर के भाव पर एक उदाहरण के जरिए समझा जा सकता है

  • प्रति डॉलर 80 रुपये की दर पर: अगर एक्सचेंज रेट 80 रुपये प्रति डॉलर रहता है, तो भारत को एक ट्रॉय औंस सोना आयात करने के लिए 3,68,000 रुपये चुकाने पड़ते हैं।
  • प्रति डॉलर 95 रुपये की दर पर: यदि भारतीय रुपया कमजोर होकर 95 रुपये प्रति डॉलर पर आ जाता है, तो उसी एक ट्रॉय औंस सोने के लिए देश को 4,37,000 रुपये का भुगतान करना पड़ता है।

गणित का यह आंकड़ा साफ दर्शाता है कि भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सोने के दाम स्थिर रहें या उनमें मामूली गिरावट आए, लेकिन कमजोर रुपया और मजबूत डॉलर मिलकर भारत के लिए सोने का आयात अत्यंत खर्चीला बना देते हैं।

नीतिगत कदम और सीमा शुल्क में वृद्धि का असर

व्यापार घाटे को नियंत्रित करने और देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के उद्देश्य से सरकारी एजेंसियां अक्सर सीमा शुल्क यानी कस्टम ड्यूटी में बढ़ोतरी करती हैं और नागरिकों से सोना न खरीदने की अपील करती हैं। वित्तीय विश्लेषक संस्था आईसीआईसीआई डायरेक्ट के शोध के अनुसार, आयात शुल्क में बढ़ोतरी से सोने की लैंडिंग कॉस्ट यानी देश में पहुंचने की कुल लागत बढ़ जाती है, जिससे खुदरा खरीदारों, आभूषण निर्माताओं और निवेशकों की खरीदारी हतोत्साहित होती है।

सोना न खरीदने की सार्वजनिक अपील और कस्टम ड्यूटी में बढ़ोतरी का असर मई और जून के महीनों में साफ देखा गया था, लेकिन जुलाई के महीने में आयात आंकड़ों में अचानक बड़ा उछाल दर्ज किया गया। दो महीने की सुस्ती के बाद जुलाई में आयात में आई यह तेजी यह दर्शाती है कि आगामी त्योहारी सीजन को देखते हुए खुदरा विक्रेताओं और आभूषण निर्माताओं ने अपने स्टॉक को दोबारा भरना शुरू कर दिया था।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) द्वारा जारी आंकड़ों से पता चलता है कि जुलाई में भारत का सोना आयात मूल्य बढ़कर 4.16 अरब डॉलर पर पहुंच गया। यह आंकड़ा जून महीने के 1.97 अरब डॉलर के आयात मूल्य से दोगुने से भी अधिक है। अगर मात्रा की बात करें, तो जुलाई में सोने का आयात बढ़कर 40 से 45 टन के अनुमानित स्तर पर पहुंच गया, जबकि जून में यह केवल 20 टन रहा था।

सप्लाई का ढांचा, पुराना सोना और व्यापार घाटा

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि हालांकि पुराने सोने के आभूषणों को बदलकर नए आभूषण लेने की प्रक्रिया यानी रीसाइक्लिंग से बाजार में आपूर्ति बनी हुई है, फिर भी जुलाई में आयात में आई तेजी भौतिक मांग में सुधार का संकेत देती है। इस तेजी के बावजूद, कुल मर्चेंडाइज आयात में सोने का हिस्सा जुलाई में 5 प्रतिशत के आसपास रहा, जो जनवरी से मार्च तिमाही के दौरान दर्ज किए गए 11 प्रतिशत के औसत स्तर से काफी कम है।

ऑल इंडिया जेम एंड ज्वेलरी डोमेस्टिक काउंसिल के अनुमान के अनुसार, अगस्त महीने में सोने के आयात में एक बार फिर गिरावट आ सकती है। परिषद का मानना है कि अगस्त में सोना आयात 30 प्रतिशत घटकर 45 टन रह सकता है, जबकि एक साल पहले इसी महीने में 64.2 टन सोना आयात किया गया था। इसके साथ ही, संगठन का अनुमान है कि सोना खरीदने से बचने की अपील के चलते सितंबर 2026 में सोना आयात में लगभग 15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।

हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में सितंबर, अक्टूबर और नवंबर का समय त्योहारों से भरा होता है, जिसके तुरंत बाद शादियों का सीजन शुरू हो जाता है। चूंकि इन अवसरों पर सोना खरीदना शुभ माना जाता है, इसलिए साल 2026 के अंतिम चार महीनों में सोने की वास्तविक मांग का रुख देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा।

दूसरी ओर, बाजार में ऐसी चर्चाएं भी हैं कि केंद्र सरकार सोने और चांदी पर सीमा शुल्क में एक बार फिर कटौती करने पर विचार कर सकती है। यदि सीमा शुल्क में राहत दी जाती है, तो आने वाले महीनों में सोने की खरीदारी में फिर से तेजी आ सकती है।

इंटरनेशनल स्पॉट कीमतें और सर्राफा बाजार का रुख

पश्चिम एशिया युद्ध छिड़ने के बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और चांदी की स्पॉट कीमतों में बड़ा फेरबदल देखने को मिला है। युद्ध शुरू होने से पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 5,600 डॉलर प्रति औंस पर कारोबार कर रहा था, जो जून महीने में गिरकर 4,170 डॉलर प्रति औंस के निचले स्तर पर आ गया। अगस्त में थोड़ी रिकवरी के बाद, फिलहाल स्पॉट गोल्ड 4,400 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है।

चांदी की कीमतों में भी ऐसा ही रुख देखा गया है। मई के दौरान 85 से 90 डॉलर प्रति औंस पर बिकने वाली स्पॉट चांदी की कीमतें गिरकर फिलहाल 65 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर आ गई हैं।

अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले और रुपये की स्थिति

भारतीय बाजार के आउटलुक पर बात करते हुए ब्रिकवर्क रेटिंग्स के रिसर्च हेड राजीव शरण ने बताया कि अगले दो हफ्तों के दौरान सोने की कीमतों पर दबाव बना रहने की संभावना है। राजीव शरण के अनुसार, FCNR(B) डिपॉजिट में आए मजबूत प्रवाह से भारतीय रुपये को सहारा मिला है। मजबूत रुपया अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें स्थिर रहने पर भी घरेलू स्तर पर सोने के दामों को नियंत्रित रखने में मदद करता है।

वैश्विक सर्राफा बाजार के लिए सबसे बड़ा कारक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक है, जो 16 सितंबर को होने जा रही है। जैक्सन होल सम्मेलन में फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श के सख्त बयानों के बाद बाजार इस बात पर विभाजित है कि फेड ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी करेगा या दरों को 3.50 से 3.75 प्रतिशत के मौजूदा स्तर पर बरकरार रखेगा।

राजीव शरण ने स्पष्ट किया कि ब्याज दरों में कोई भी बढ़ोतरी या सख्त रुख अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड को बढ़ाएगा, जिससे निवेशक बिना ब्याज देने वाले सोने के बजाय सुरक्षित और उच्च रिटर्न देने वाले बॉन्ड की ओर आकर्षित होंगे। इससे सोने की कीमतें नरम रहने की उम्मीद है, हालांकि फेडरल रिजर्व की ओर से किसी भी राहत भरे संकेत से बाजार में तेजी लौट सकती है।

सवाल-जवाब

वित्त वर्ष FY26 में भारत ने कितना सोना आयात किया?
भारत ने वित्त वर्ष FY26 में 72 अरब डॉलर मूल्य का सोना आयात किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 24 प्रतिशत अधिक है। कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी 9.29 प्रतिशत रही।
डॉलर मजबूत होने से भारत में सोना क्यों महंगा हो जाता है?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का सौदा डॉलर में होता है। जब रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो भारत को समान मात्रा में सोना आयात करने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
जुलाई में सोने के आयात में उछाल क्यों आया?
आगामी त्योहारी और वैवाहिक सीजन को देखते हुए खुदरा विक्रेताओं और आभूषण निर्माताओं ने अपने स्टॉक की रीस्टॉकिंग की। इससे जुलाई का आयात बढ़कर 4.16 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
ऑल इंडिया जेम एंड ज्वेलरी काउंसिल का अगस्त और सितंबर के आयात पर क्या अनुमान है?
परिषद का अनुमान है कि अगस्त में सोना आयात 30 प्रतिशत घटकर 45 टन रहेगा, और सोना न खरीदने की अपील से सितंबर में आयात में 15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है।
पश्चिम एशिया युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के दामों में क्या बदलाव आया?
युद्ध से पहले स्पॉट गोल्ड 5,600 डॉलर प्रति औंस था, जो जून में गिरकर 4,170 डॉलर पर आ गया और वर्तमान में 4,400 डॉलर प्रति औंस के आसपास कारोबार कर रहा है।
16 सितंबर को अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले का सोने पर क्या असर पड़ेगा?
यदि फेड ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी करता है या सख्त रुख अपनाता है, तो बॉन्ड यील्ड बढ़ेगी जिससे बिना ब्याज वाले सोने की कीमतें नरम रह सकती हैं।
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