मणिपुर में लंबे समय से जारी उथल-पुथल के बीच राष्ट्रीय राजमार्गों पर आवागमन बाधित होने और गैर-कानूनी वसूली की घटनाओं को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत से हस्तक्षेप की मांग की गई है। राज्य के दो नागरिक मंचों ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दाखिल की है। इस याचिका का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित कराना है कि राज्य की प्रमुख सड़क जीवनरेखाओं पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति और आम नागरिकों का आवागमन बिना किसी जातीय भेदभाव या खतरे के लगातार जारी रहे।
याचिका दायर करने वाले संगठनों में टीम मैतेई पर्सनालिटीज मणिपुर और मैतेई अलायंस ट्रस्ट शामिल हैं। इस कानूनी गुहार में मणिपुर की राज्य सरकार, केंद्रीय गृह मंत्रालय और नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया को पक्षकार बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत के सामने दलील दी है कि पूर्वोत्तर के इस संवेदनशील राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग ही खाद्यान्न, दवाइयां, ईंधन और अन्य अनिवार्य उत्पादों के परिवहन का एकमात्र प्रमुख जरिया हैं। जब भी इन मार्गों पर अवरोध उत्पन्न होता है, तो पूरी आबादी को भीषण किल्लत और आर्थिक संकट से जूझना पड़ता है।
जातीय आधार पर भेदभाव और अवैध जांच चौकियों को हटाने की मांग
याचिका में इस बात पर गहरा क्षोभ जताया गया है कि राजमार्गों पर आम मुसाफिरों और मालवाहकों को किसी व्यक्ति की पहचान, मूल निवास, जातीय पृष्ठभूमि या समुदाय के आधार पर रोका जाता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि भारत के हर नागरिक को देश के किसी भी सार्वजनिक रास्ते पर निर्बाध यात्रा करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है, जिसे किसी भी बहाने से छीना नहीं जा सकता।
याचिका के जरिए मांग की गई है कि राष्ट्रीय राजमार्गों पर निजी समूहों द्वारा खड़े किए गए अवैध द्वारों, बैरिकेड्स, अनधिकृत जांच चौकियों और चंदा वसूली बूथों को तत्काल प्रभाव से ध्वस्त किया जाए। इस संदर्भ में कंट्रोल ऑफ नेशनल हाईवेज (लैंड एंड ट्रैफिक) एक्ट, 2002 के कड़े प्रावधानों को लागू करने की अपील की गई है, जिसके तहत राजमार्गों की जमीन पर किसी भी किस्म के गैर-कानूनी कब्जे या रुकावट पर सख्त कानूनी पाबंदी है।
जबरन टैक्स और आर्थिक नाकेबंदी पर सख्त लगाम की जरूरत
जनहित याचिका में विभिन्न संगठनों द्वारा आहूत किए जाने वाले आर्थिक नाकेबंदी, बंद और हिंसक प्रदर्शनों के चलते पैदा होने वाले संकट को भी रेखांकित किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने साफ किया कि शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराना हर नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन इस अधिकार की आड़ में पूरे राज्य की जीवनरेखा को बंधक बनाना और व्यावसायिक वाहनों से मनमाना टैक्स अथवा रंगदारी वसूलना कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता।
ट्रांसपोर्टरों, चालकों और मुसाफिरों से अवैध टोल या जबरन चंदा वसूलने वालों पर नकेल कसने के लिए विशेष निगरानी की मांग रखी गई है। याचिका में कहा गया है कि वसूली से जुड़े मामलों में जबरन वसूली, धमकी देने, रास्ता रोकने, मारपीट और संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले असामाजिक तत्वों पर त्वरित रूप से प्राथमिकी दर्ज कर निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
चौबीसों घंटे काम करने वाले शिकायत तंत्र और समग्र सुरक्षा योजना का प्रस्ताव
राजमार्गों पर स्थायी शांति और निर्बाध आवागमन सुनिश्चित करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने एक बहुस्तरीय व्यवस्था की रूपरेखा अदालत के समक्ष पेश की है। इसके तहत केंद्र और राज्य प्रशासन को एक निश्चित समयसीमा के भीतर समग्र सुरक्षा व सुरक्षा गलियारा योजना तैयार करने का निर्देश देने की मांग की गई है। इस कार्ययोजना के तहत उन संवेदनशील हिस्सों की पहचान की जानी चाहिए जहां अक्सर नाकेबंदी या रंगदारी की घटनाएं सामने आती हैं।
इसके साथ ही, एक समर्पित चौबीस घंटे चालू रहने वाले नोडल निगरानी तंत्र की स्थापना का सुझाव दिया गया है। ऐसे तंत्र के जरिए संकट में फंसे चालक या यात्री तुरंत शिकायत दर्ज करा सकेंगे। याचिका में यह विशेष जोर दिया गया है कि शिकायतकर्ताओं और प्रत्यक्षदर्शियों की पहचान गुप्त रखने तथा उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाएं, ताकि लोग बिना किसी डर के गैर-कानूनी गतिविधियों की जानकारी प्रशासन तक पहुंचा सकें।
संवेदनशील हिस्सों पर निष्पक्ष सुरक्षा बलों की तैनाती की अपील
याचिका में संवेदनशील मार्गों पर पर्याप्त और निष्पक्ष सुरक्षाबलों को तैनात किए जाने का अनुरोध किया गया है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि सुरक्षाबलों की वास्तविक संख्या और उनकी तैनाती का सटीक स्थान तय करने का विशेषाधिकार पूरी तरह से सक्षम प्रशासनिक और सुरक्षा अधिकारियों के पास ही रहना चाहिए।
याचिका का अंतिम जोर इसी बात पर है कि विधि का शासन बहाल रखना और आम जनता की सुरक्षा की गारंटी देना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली जिम्मेदारी है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर शांति और खुली आवाजाही बनाए रखना केवल कानून-व्यवस्था का मसला नहीं है, बल्कि यह मणिपुर के लाखों निवासियों के सम्मानपूर्वक जीवन जीने और उनकी रोजी-रोटी से सीधा जुड़ा बुनियादी सवाल है।



















