झारखंड के घने अरण्य और प्राकृतिक संपदा से समृद्ध पलामू के जंगलों ने एक बार फिर पूरे हिंदुस्तान का ध्यान अपनी ओर खींचा है। देश के सर्वाधिक लोकप्रिय क्विज शो 'कौन बनेगा करोड़पति' के मंच से जब महानायक अमिताभ बच्चन ने प्रतिभागियों के सामने प्रोजेक्ट टाइगर की नींव से जुड़ा सवाल रखा, तो पलामू टाइगर रिजर्व अचानक राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आ गया। इस शो में पूछा गया कि वर्ष 1973 में जब भारत सरकार ने देश भर में बाघों को विलुप्त होने से बचाने के लिए प्रोजेक्ट टाइगर लॉन्च किया था, तब चुने गए शुरुआती नौ संरक्षित क्षेत्रों में शुमार पलामू अभयारण्य किस राज्य की धरती पर स्थित है। इस एक सवाल ने न केवल टीवी दर्शकों को रोमांचित किया, बल्कि झारखंड के इस इकलौते टाइगर रिजर्व के स्वर्णिम इतिहास, गौरवशाली अतीत और वर्तमान चुनौतियों पर एक नई बहस छेड़ दी है।
प्रोजेक्ट टाइगर के शुरुआती दौर की अमूल्य धरोहर
पलामू के जंगलों का दर्जा देश के वन्यजीव नक्शे पर बेहद विशिष्ट रहा है। रिजर्व के उप निदेशक प्रजेश कांत जैना के अनुसार, यह समूचे झारखंड का एकमात्र टाइगर रिजर्व है और इसका चयन 1973 में तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा चिन्हित शुरुआती नौ टाइगर रिजर्व में किया गया था। इस अभयारण्य का चयन इस बात का स्पष्ट प्रमाण था कि यहां की जैव विविधता, घने साल और पर्णपाती वन तथा वन्यजीवों का पर्यावास अत्यंत समृद्ध था। जब देश में बाघों की घटती संख्या को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंताएं जताई जाने लगीं, तब पलामू को संरक्षण के सबसे मजबूत स्तंभों में गिना गया था।
उप निदेशक ने इस बात पर विशेष प्रसन्नता जाहिर की कि इतने बड़े और प्रतिष्ठित टेलीविजन मंच पर रिजर्व का नाम लिया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के प्रसारण से दूर-दराज के नागरिकों, विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं में पलामू के इतिहास को गहराई से जानने की स्वाभाविक जिज्ञासा पैदा होती है। राष्ट्रीय स्तर की इस चर्चा से झारखंड की समृद्ध विरासत को पहचान मिलती है और इससे पलामू के पुनरुद्धार की कार्ययोजनाओं को व्यापक समर्थन मिलने की राह आसान हो सकती है।
दुनिया में पगमार्क से गणना की पहली ऐतिहासिक शुरुआत
बाघ संरक्षण की वैज्ञानिक तकनीकों का इतिहास खंगालें तो पलामू का योगदान विश्व स्तर पर मील का पत्थर माना जाता है। वर्ष 1973 के प्रोजेक्ट टाइगर से कई दशक पहले, पलामू के ही जंगलों में बाघों की उपस्थिति दर्ज करने का एक अनूठा प्रयोग हुआ था। प्रजेश कांत जैना ने बताया कि वर्ष 1932 में तत्कालीन वन अधिकारी जे. डब्ल्यू. निकोलसन ने पलामू के वनक्षेत्र में पहली बार बाघों के पगमार्क यानी पंजों के निशानों के आधार पर गणना की वैज्ञानिक प्रणाली तैयार की थी।
निकोलसन की इस अभिनव सोच से पहले जंगली जीवों की सटीक संख्या का अंदाजा लगाना लगभग असंभव माना जाता था। पलामू की पगडंडियों और जलस्रोतों के किनारे पाए जाने वाले पंजों की छाप का अध्ययन करके बाघों के विचरण क्षेत्र और उनकी आबादी का खाका खींचा गया था। आने वाले दशकों में यही पगमार्क तकनीक समूचे भारत और दुनिया के कई वन्यजीव अभयारण्यों में गणना और निगरानी का प्राथमिक आधार बनी। इस ऐतिहासिक घटना ने पलामू को वन्यजीव विज्ञान के इतिहास में अमर बना दिया।
औपनिवेशिक काल का क्रूर नजरिया और शिकार को प्रोत्साहन
पलामू के जंगलों का दस्तावेजी इतिहास 19वीं सदी के अंत तक जाता है। अंग्रेजी हुकूमत के समय वर्ष 1898 में डी. एच. आई. सैंडर्स द्वारा तैयार किए गए 'सर्वे ऑफ सेटलमेंट' के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में इस अंचल की भौगोलिक और प्राकृतिक स्थिति का विस्तृत ब्योरा दर्ज मिलता है। हालांकि, उस दौर में ब्रिटिश हुकूमत का वन्यजीवों के प्रति नजरिया संरक्षणवादी नहीं बल्कि विनाशकारी था। तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था में बाघों और अन्य बड़े हिंसक जीवों को खतरनाक जानवर माना जाता था।
ब्रिटिश राज में बाघों को मार गिराने वाले शिकारियों को नकद इनाम और प्रशस्ति पत्र दिए जाते थे। सरकारी स्तर पर दी जाने वाली इस शह के कारण न सिर्फ अंग्रेज अफसरों ने बल्कि स्थानीय रियासतों ने भी बाघों का अंधाधुंध शिकार किया। जंगलों को इंसानी बस्तियों और कृषि भूमि के विस्तार के लिए खाली कराने की नीति ने बाघों के प्राकृतिक रहवास को भारी नुकसान पहुंचाया, जिससे वन्यजीवों की संख्या में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज की जाने लगी।
आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन और वन्यजीवों पर गहराया संकट
ब्रिटिश शासन की समाप्ति के बाद भी पलामू के जंगलों की मुसीबतें खत्म नहीं हुईं। प्रसिद्ध वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. डी. एस. श्रीवास्तव के अनुसार, वर्ष 1951 में जब देश में जमींदारी प्रथा का कानूनी रूप से खात्मा किया गया, तो संरक्षण की व्यवस्था में एक खतरनाक शून्य पैदा हो गया। वर्ष 1951 से लेकर 1965 के बीच के कालखंड में वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा की कोई पुख्ता और सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था लागू नहीं रह पाई थी।
नतीजतन, इस दौर में पलामू सहित देश के अनेक जंगलों में बड़े पैमाने पर अवैध शिकार और अंधाधुंध कटाई हुई। बाघों की चमड़ी, हड्डियों और शिकार के शौकीनों के चलते जंगली जीवों की तादाद तेजी से रसातल में चली गई। किसी का ध्यान इस मूक तबाही की ओर नहीं गया। जब 1960 के दशक के उत्तरार्ध में यह महसूस किया गया कि अगर सख्त कदम नहीं उठाए गए तो भारतीय बाघ हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में सिमट जाएंगे, तब जाकर देश में राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण की सुनियोजित कार्ययोजना तैयार की गई, जिसने आखिरकार 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर का रूप लिया।
1974 के आंकड़े और वर्तमान दौर की कड़ी चुनौतियां
प्रोजेक्ट टाइगर लागू होने के तुरंत बाद जब संरक्षित वन क्षेत्रों में नियमित सर्वेक्षण शुरू हुए, तब वर्ष 1974 में पलामू के दायरे में 22 बाघों की सुरक्षित मौजूदगी आधिकारिक रूप से दर्ज की गई थी। उस समय पलामू देश के सबसे आशाजनक बाघ पर्यावासों में शुमार था। परंतु दशकों के प्रशासनिक उतार-चढ़ाव, वन विखंडन और सुरक्षा से जुड़ी विभिन्न स्थानीय दिक्कतों के कारण समय बीतने के साथ यहां बाघों का कुनबा लगातार घटता चला गया।
वर्तमान समय में पलामू टाइगर रिजर्व में बाघों की मौजूदगी बेहद सीमित या नगण्य स्तर पर सिमट चुकी है। आज राज्य वन विभाग और पर्यावरणविदों के सम्मुख सबसे विकट चुनौती इस ऐतिहासिक रिजर्व को उसका खोया हुआ गौरव वापस लौटाने की है। ग्रासलैंड के विकास, शाकाहारी जीवों की संख्या में इजाफा, वनकर्मियों की नियमित गश्त और स्थानीय समुदायों के सहयोग से ही इस जंगल में बाघों की दहाड़ दोबारा गूंज सकती है।
पर्यावरण पर्यटन और नई पीढ़ी में चेतना का नया संचार
टेलीविजन के सबसे बड़े क्विज कार्यक्रम में पलामू का जिक्र आना महज एक सवाल-जवाब तक सीमित नहीं है, बल्कि यह झारखंड के पर्यटन और संरक्षण के लिए एक बड़ा अवसर है। यह रिजर्व अपनी सुरम्य पहाड़ियों, घने जंगलों, मनोहारी झरनों और दुर्लभ जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। यदि इस राष्ट्रीय मंच से मिली लोकप्रियता को सही दिशा दी जाए, तो यहां नियंत्रित और प्रकृति के अनुकूल इको-टूरिज्म को व्यापक बढ़ावा मिल सकता है।
इसके साथ ही, झारखंड और देश की युवा पीढ़ी को यह समझने का स्वर्णिम मौका मिला है कि उनका अपना राज्य देश में पर्यावरण संरक्षण के इतिहास की जननी रहा है। 1932 की पगमार्क गणना से लेकर 1973 के प्रोजेक्ट टाइगर तक पलामू की भूमिका निर्विवाद रही है। अब जरूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इस अभयारण्य के पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत करें ताकि पलामू की यह ऐतिहासिक धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित और समृद्ध बनी रहे।



















