मणिपुर के पहाड़ी अंचलों में रहने वाले कुकी और नागा समुदायों के बीच आपसी मेलजोल पूरी तरह ठप पड़ गया है। एक समय पर जो लोग गहरे दोस्त हुआ करते थे, वे अब एक-दूसरे की तरफ देखना भी पसंद नहीं करते। ताफू कुकी गांव के मुखिया लेंखोमांग चोंगलोई इन हालात का जिक्र करते हुए कहते हैं कि यह स्थिति बिल्कुल भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल जैसी जंग बन चुकी है।
शांति का छलावा और सोशल मीडिया की दूरी
घाटी और पहाड़ों की प्राकृतिक खूबसूरती किसी भी बाहरी व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर सकती है। नीले आसमान और हरे-भरे पेड़ों के बीच खड़े होने पर ऐसा आभास होता है कि वहां पूर्ण शांति है, लेकिन यह सुकून पूरी तरह भ्रामक साबित हो रहा है। राजधानी इंफाल से लगभग 65 किलोमीटर दूर स्थित इन इलाकों की बस्तियां एक-दूसरे के इतनी करीब बसी हैं कि बाहर से आने वाले लोग यह तक नहीं पहचान पाते कि कौन सा गांव कहां खत्म होता है। लेंखोमांग चोंगलोई के घर के पास ही आपी पमई का निवास है। पमई और चोंगलोई का बेटा कभी साथ में विद्यालय जाया करते थे और अक्सर एक-दूसरे के यहां आते-जाते थे। इस पुरानी नजदीकी को याद करते हुए 35 वर्षीय आपी पमई बताते हैं कि वे सब साथ बड़े हुए हैं और उस तरफ उनके कई मित्र हुआ करते थे। उनके अनुसार, पिछले साल मई से आपसी बातचीत पूरी तरह बंद हो चुकी है और अब वे केवल एक-दूसरे के व्हाट्सऐप स्टेटस देखते हैं लेकिन उनका कोई जवाब नहीं देते क्योंकि परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। सुरक्षा के लिहाज से दोनों बस्तियों के बीच अब कड़े सुरक्षा बैरियर खड़े कर दिए गए हैं।
हिंसा का नया मोर्चा और बंधक बनाने का सिलसिला
सेनापति और कांगपोकपी जिलों की सीमा पर स्थित इस क्षेत्र में इस वर्ष मई और जून के महीनों में लोगों को बंधक बनाए जाने की घटनाओं ने नागा और कुकी संघर्ष को एक नई दिशा दे दी है। सेनापति जिले में जहां मुख्य रूप से नागा समुदाय के लोग निवास करते हैं, वहीं कांगपोकपी में कुकी-जो आबादी बहुतायत में है, हालांकि वहां भी कुछ नागा गांव मौजूद हैं। मई 2023 से चल रहे इस जातीय संघर्ष में अब तक 300 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और लगभग 60,000 लोग बेघर हो चुके हैं। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, इस साल 31 अगस्त तक मृतकों का आंकड़ा 306 पहुंच चुका था, और इस तारीख के बाद भी हत्याओं का सिलसिला थमा नहीं है।
अपहरण से लेकर छह शवों की बरामदगी तक
इस साल 13 मई को कांगपोकपी जिले के भीतर एक सुनियोजित घात लगाकर किए गए हमले में कुकी-जो समुदाय के तीन चर्च नेताओं को मौत के घाट उतार दिया गया था। इस घटना के बाद कांगपोकपी और साथ लगते सेनापति जिले में दोनों पक्षों की तरफ से ग्रामीणों के अपहरण की घटनाएं सामने आईं। नागा प्रतिनिधियों का ऐसा तर्क था कि उनके लोगों को उठाया जाना दरअसल जवाबी कार्रवाई का हिस्सा था। हालांकि कुछ बंधकों को तो दो दिन के भीतर ही मुक्त कर दिया गया, लेकिन छह नागा पुरुष गायब ही रहे। इस बीच नागा संगठनों ने लगभग 14 कुकी पुरुषों को अपने नियंत्रण में रखा और लापता लोगों की सुरक्षित वापसी की मांग पर अड़े रहे। दूसरी तरफ कुकी समूहों ने किसी भी कुकी पुरुष को बंधक बनाकर रखने की बात से साफ इनकार किया। करीब एक महीने तक चले इस घटनाक्रम के बाद नौ जून को उन चौदह कुकी पुरुषों को रिहा कर दिया गया, लेकिन उसके ठीक अगले दिन उन छह लापता नागा पुरुषों के शव बरामद कर लिए गए। लियांगमाई नगा परिषद के महासचिव बेनवांग बो इस मामले पर बताते हैं कि चूंकि उन्होंने उनके लोगों का अपहरण किया था इसलिए उन्हें सेनापति से लोगों को उठाना पड़ा, और उन्होंने उन लोगों की अच्छी देखभाल करने के बाद उन्हें छोड़ भी दिया था लेकिन बदले में उनके छह साथियों की हत्या कर दी गई। मई 2023 के बाद से लगभग दो साल तक नागा समुदाय मुख्य तौर पर मेइती और कुकी संघर्ष से अलग बना रहा था, लेकिन भूमि, बस्तियों और राजनीतिक अधिकारों को लेकर दोनों के बीच पुराने मतभेद हमेशा से कायम रहे हैं। नब्बे के दशक में भी इन विवादों ने हिंसक रूप धारण किया था।
हथियारों की तैयारी और मालिकाना हक की जंग
ताफू कुकी गांव के स्वयंसेवक मिनथांग पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि नागा समुदाय के साथ उनके अच्छे संबंध हुआ करते थे। अब स्थिति यह है कि गांव के लोग अपनी बस्तियों की सुरक्षा के लिए खुद आगे आ रहे हैं और खुलकर स्वीकार करते हैं कि उनके पास आधुनिक ऑटोमैटिक हथियार और अन्य बंदूकें मौजूद हैं। उनका यह भी कहना है कि नब्बे के दौर के संघर्ष के समय कुकी पीढ़ी खुद को असहाय मानती थी, लेकिन इस बार उन्होंने पूरी तैयारी कर रखी है। दूसरी तरफ अहजापौ एमके का अपना अलग अनुभव है, जो इस साल 27 अगस्त को कांगपोकपी जिले की इंफाल-तामेंगलॉन्ग सड़क पर हुए एक घात हमले में बाल-बाल बच गए थे। उस हमले में चार नागा पुरुषों की मौत हो गई थी और वह खुद जंगल में भागकर कई घंटों तक छिपे रहे थे। कुकी समुदाय के बारे में उनका कहना है कि वे इस युद्ध को छेड़ने के लिए पहले से ही तैयार बैठे थे। दोनों ही पक्ष अपनी रक्षा तैयारियों को पूरी तरह अनिवार्य बताते हैं और विरोधी पक्ष की तैयारियों को सोची-समझी आक्रामकता का प्रमाण मानते हैं। अहजापौ के अनुसार यह लड़ाई केवल गांव की हिफाजत तक सीमित नहीं है, बल्कि इस बात पर भी है कि कुकी समुदाय इस क्षेत्र को अपना मूल निवास कैसे मान सकता है। उनका दावा है कि वे लोग बाहरी हैं और ताफू नाम भी असल में नागा नाम ही है जिसमें कुकी शब्द जोड़ दिया गया है।



















