अंतरराष्ट्रीय बुलियन बाजार में सोने की कीमतों में एक बार फिर से भारी गिरावट का दौर देखने को मिल रहा है। लगातार चार दिनों की तेजी के बाद बाजार का रुख अचानक बदल गया है और मौजूदा समय में कीमत 4,057 डॉलर के आसपास कारोबार कर रही है। पिछले कारोबारी सत्र में 4,147 डॉलर पर बंद होने के बाद से इसमें दो प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। इस हफ्ते की शुरुआत में बाजार ने 4,185 डॉलर के ऊपरी स्तर को छूने की कोशिश की थी, लेकिन वहां से भारी बिकवाली का सामना करना पड़ा। यह ताजा गिरावट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कीमती धातुओं के लिए रास्ता फिलहाल काफी मुश्किलों भरा है और निवेशकों का भरोसा डगमगा रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में उबाल और महंगाई का डर
सोने की इस हालिया कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में आई अचानक तेजी है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल एक बार फिर 90 डॉलर प्रति बैरल के महत्वपूर्ण स्तर को पार कर गया है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बन जाती हैं क्योंकि इससे परिवहन, विनिर्माण और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की लागत सीधे तौर पर बढ़ जाती है। ऊर्जा के दाम बढ़ने से उन चिंताओं को फिर से बल मिला है कि महंगाई दर लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती है। जब महंगाई बढ़ने का अंदेशा होता है, तो बड़े निवेशक सुरक्षित निवेश के बजाय अन्य विकल्पों की ओर भागने लगते हैं, जिससे सोने जैसे एसेट्स पर सीधा असर पड़ता है।
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड का बढ़ता दबाव
महंगाई की इन नई चिंताओं का सीधा असर अमेरिका के बॉन्ड बाजार पर देखने को मिला है, जहां ट्रेजरी यील्ड नए उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। जब केंद्रीय बैंकों को महंगाई से लड़ने के लिए ब्याज दरें ऊंची रखनी पड़ती हैं, तो सरकारी बॉन्ड निवेशकों को अधिक रिटर्न देने लगते हैं। सोना एक ऐसा एसेट है जिस पर कोई ब्याज या लाभांश (यील्ड) नहीं मिलता है। इसलिए, जब बाजार में बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों के लिए सोने को अपने पोर्टफोलियो में रखना एक घाटे का सौदा लगने लगता है। ट्रेजरी यील्ड में यह ताजा उछाल कीमती धातुओं के लिए एक बहुत बड़े बोझ के रूप में काम कर रहा है, जो निवेशकों को अपनी पूंजी बॉन्ड बाजार में स्थानांतरित करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
टेक्निकल इंडिकेटर्स दे रहे हैं मंदी के संकेत
तकनीकी नजरिए से देखें तो सोने का चार्ट पूरी तरह से मंदी की गिरफ्त में नजर आ रहा है। मौजूदा लाइव डेटा के अनुसार, बाजार में 'डेथ क्रॉस' की स्थिति बन गई है, जहां 4,242 डॉलर का 50-दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) 4,269 डॉलर के 200-दिवसीय मूविंग एवरेज से नीचे खिसक गया है। यह एक क्लासिक मंदी का संकेत है जो लंबे समय तक बिकवाली के दबाव को दर्शाता है। इसके अलावा, रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) 45 के स्तर पर है, जो बाजार में खरीदारी की कमी को उजागर करता है। वहीं, MACD लाइन -54.49 पर है, जो इसके -71.83 के सिग्नल लाइन से काफी पीछे है। ट्रेडिंग वॉल्यूम अपने 20-दिवसीय औसत के मुकाबले 17.87 गुना तक बढ़ गया है, जो इस बिकवाली में भारी संस्थागत भागीदारी का स्पष्ट संकेत देता है। 79.73 का एवरेज ट्रू रेंज (ATR) यह भी बताता है कि बाजार में दैनिक उतार-चढ़ाव काफी प्रचंड है। हालांकि, इस भारी इंट्राडे गिरावट के बावजूद कीमतें 3,264 डॉलर से लेकर 5,586 डॉलर की अपनी व्यापक 52-सप्ताह की सीमा के भीतर सुरक्षित बनी हुई हैं।
सपोर्ट और रेजिस्टेंस के अहम स्तर
तकनीकी विश्लेषकों और ट्रेडर्स के लिए कुछ प्रमुख मूल्य स्तर इस समय बेहद अहम हो गए हैं। मौजूदा गिरावट के दौर में, पहला महत्वपूर्ण सपोर्ट पिवट लेवल 4,081 डॉलर पर था, जिसके टूटने के बाद अब 4,005 डॉलर के आसपास एक रिवर्स ट्रेंडलाइन सपोर्ट मौजूद है। इसके नीचे नजरें 4,018 डॉलर के पहले सपोर्ट (S1) और 3,980 डॉलर के दूसरे सपोर्ट (S2) पर टिकी हैं। अगर गिरावट और गहरी होती है, तो 3,963 डॉलर के 20-दिवसीय सपोर्ट और 3,940 डॉलर के आसपास मौजूद इस साल के निचले स्तर तक कीमतें जा सकती हैं। भारी बिकवाली की स्थिति में यह अक्टूबर 2025 के 3,900 डॉलर से ठीक नीचे वाले स्तर को भी छू सकता है। दूसरी ओर, अगर बाजार वापसी की कोशिश करता है, तो 4,120 डॉलर और 4,183 डॉलर पर उसे भारी रेजिस्टेंस का सामना करना पड़ेगा। बाजार की असली परीक्षा 4,200 डॉलर के स्तर पर होगी, जिसने जून के अंत और जुलाई की शुरुआत में तेजी को मजबूती से रोक दिया था। एक ठोस रिकवरी की पुष्टि करने और मध्य-जून के 4,385 डॉलर के उच्चतम स्तर तक पहुंचने के लिए इस 4,200 डॉलर के बैरियर को तोड़ना नितांत आवश्यक है।
बाजार के जानकारों और विश्लेषकों की राय
इस पूरे घटनाक्रम पर बाजार के विशेषज्ञों का नजरिया भी काफी सतर्कता भरा है। टीडी के विश्लेषकों ने सोने में हाल ही में आई उस तेजी को केवल एक 'करेक्टिव रिएक्शन' (सुधारात्मक प्रतिक्रिया) करार दिया है, जिसके लंबे समय तक टिकने की उम्मीद नहीं थी। उनका मानना है कि वह तेजी नए निवेशकों की आक्रामक खरीदारी का नतीजा नहीं थी, बल्कि यह शॉर्ट कवरिंग और निचले स्तरों पर की गई छिटपुट खरीदारी (डिप बाइंग) के कारण आई थी। जब बाजार में पहले से मौजूद तकनीकी सपोर्ट स्तरों ने काम किया, तो शॉर्ट सेलर्स ने अपना मुनाफा बुक किया, जिससे कीमतों में अस्थायी उछाल आया। लेकिन बुनियादी कारकों के कमजोर होने के कारण यह उछाल टिकाऊ साबित नहीं हो सका।
सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की ऐतिहासिक भूमिका
मौजूदा तकनीकी और बुनियादी दबाव के बावजूद, वैश्विक वित्तीय प्रणाली में सोने की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। मानव इतिहास में सोने ने हमेशा मूल्य के संचय और विनिमय के माध्यम के रूप में एक केंद्रीय भूमिका निभाई है। आभूषणों में इसके उपयोग के अलावा, आधुनिक दौर में इसे सबसे सुरक्षित एसेट माना जाता है। जब भी दुनिया में राजनीतिक अस्थिरता होती है, या युद्ध जैसे हालात बनते हैं, तो निवेशक अपनी पूंजी बचाने के लिए सोने का ही रुख करते हैं। इसके साथ ही, यह कागजी मुद्राओं (फिएट करेंसी) के अवमूल्यन और अनियंत्रित महंगाई के खिलाफ सबसे बेहतरीन बचाव के रूप में भी कार्य करता है, क्योंकि इसकी कीमत किसी एक सरकार या जारीकर्ता की नीतियों पर निर्भर नहीं करती है।
केंद्रीय बैंकों द्वारा सोने की रिकॉर्ड खरीदारी
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक सोने के सबसे बड़े धारक और खरीदार हैं, और उनका रुख बाजार की लंबी अवधि की दिशा तय करता है। आर्थिक उथल-पुथल के समय अपनी घरेलू मुद्राओं को समर्थन देने के लिए, केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाते हैं और सोने की हिस्सेदारी बढ़ाते हैं। किसी भी देश के पास जितना अधिक सोने का भंडार होता है, उसकी अर्थव्यवस्था उतनी ही मजबूत और विश्वसनीय मानी जाती है। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार, साल 2022 में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने रिकॉर्ड 1,136 टन सोना खरीदा था, जिसकी कीमत लगभग 70 अरब डॉलर थी। यह इतिहास की सबसे बड़ी वार्षिक खरीदारी थी। चीन, भारत और तुर्की जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के केंद्रीय बैंक विशेष रूप से अपने स्वर्ण भंडार में तेजी से इजाफा कर रहे हैं।
अमेरिकी डॉलर और शेयर बाजार से विपरीत संबंध
सोने के बाजार को समझने के लिए अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी बॉन्ड के साथ इसके विपरीत संबंध (इन्वर्स कोरिलेशन) को समझना बेहद जरूरी है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का व्यापार अमेरिकी डॉलर (XAU/USD) में होता है, इसलिए डॉलर की मजबूती सोने की कीमतों को दबा देती है। जब डॉलर महंगा होता है, तो अन्य मुद्राओं का उपयोग करने वाले विदेशी खरीदारों के लिए सोना खरीदना महंगा हो जाता है, जिससे वैश्विक मांग घटती है। इसके विपरीत, डॉलर के कमजोर होने पर सोने में उछाल आता है। इसके अलावा, शेयर बाजार जैसे जोखिम भरे एसेट्स के साथ भी सोने का विपरीत संबंध है। जब शेयर बाजार में भारी तेजी होती है, तो निवेशक सोने से पैसा निकालकर शेयरों में लगाते हैं। लेकिन जब शेयर बाजार क्रैश होते हैं, तो वही पैसा सुरक्षा के लिए वापस सोने में आ जाता है।
विदेशी मुद्रा बाजार का हाल: पाउंड और यूरो
सोने के बाजार को प्रभावित करने वाले यही वैश्विक कारक विदेशी मुद्रा बाजार (फॉरेक्स) में भी उथल-पुथल मचा रहे हैं। गुरुवार के यूरोपीय कारोबारी सत्र में ब्रिटिश पाउंड (GBP/USD) की रिकवरी थम गई और यह 1.3400 के स्तर से नीचे ही कारोबार करता दिखा। पाउंड पर यह दबाव अमेरिकी डॉलर में आए मामूली उछाल और ब्रिटेन के महंगाई आंकड़ों के कारण आया है, जो उम्मीद से अधिक ठंडे रहे हैं। इसके साथ ही मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव भी निवेशकों को सतर्क कर रहा है। दूसरी ओर, यूरो (EUR/USD) ने लगातार दूसरे दिन अपनी मजबूती बनाए रखी है और यह 1.1400 के स्तर से ऊपर टिका हुआ है। यूरो के निवेशक इस समय यूरोपियन सेंट्रल बैंक के आगामी ब्याज दर फैसलों का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, जो इसकी अगली दिशा तय करेगा।
क्रिप्टो बाजार की हलचल: बिटकॉइन और संस्थागत निवेश
पारंपरिक वित्तीय बाजारों से अलग, डिजिटल एसेट्स की दुनिया में भी एक नई कहानी आकार ले रही है। सबसे बड़ी क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन इस समय करेक्शन के दौर से गुजर रही है और 65,800 डॉलर के स्तर से नीचे ट्रेड कर रही है। हालांकि, कीमत में गिरावट के बावजूद संस्थागत निवेशकों का भरोसा कायम है। अमेरिका में लिस्टेड स्पॉट बिटकॉइन एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) में बुधवार को लगातार सातवें दिन निवेश का प्रवाह देखा गया। बिटवाइज़ के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर मैट होगन का मानना है कि अगला बड़ा क्रिप्टो बुल मार्केट ब्लॉकचेन आधारित वित्तीय ढांचे और पारंपरिक फाइनेंस के बढ़ते एकीकरण से प्रेरित होगा। उन्होंने कहा कि क्रिप्टो बाजार में बॉटम (निचले स्तर) बनने के शुरुआती संकेत दिख रहे हैं, क्योंकि 1 जुलाई के बाद से बिटकॉइन ने 9 प्रतिशत की बढ़त हासिल की है, जबकि उसी दौरान नैस्डैक 100 इंडेक्स में 6 प्रतिशत की गिरावट आई है।
भविष्य का नजरिया और भू-राजनीतिक जोखिम
आगे चलकर सोने की कीमतें कई जटिल कारकों के बीच झूलती नजर आएंगी। एक तरफ भू-राजनीतिक अस्थिरता और किसी गहरी आर्थिक मंदी का डर सोने को रातों-रात एक सुरक्षित पनाहगाह के रूप में ऊंचाइयों पर ले जा सकता है। विशेष रूप से मध्य पूर्व में किसी भी तरह का सैन्य तनाव बाजार में भय का माहौल पैदा कर सकता है। लेकिन दूसरी तरफ, ब्याज दरों का गणित लगातार सोने पर भारी पड़ रहा है। जब तक अर्थव्यवस्था में महंगाई के आंकड़े पूरी तरह से शांत नहीं हो जाते और ब्याज दरों में कटौती का चक्र ठोस रूप से शुरू नहीं होता, तब तक कर्ज की ऊंची लागत सोने जैसे बिना यील्ड वाले एसेट के लिए एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी। निवेशकों को डॉलर की चाल और बॉन्ड यील्ड के उतार-चढ़ाव पर पैनी नजर रखनी होगी।

















