घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार के कारोबारी सत्र के दौरान चौतरफा बिकवाली का माहौल देखने को मिला। सुबह के समय बाजार खुलते ही सूचकांकों पर दबाव बना हुआ था, जो दिन का कारोबार आगे बढ़ने के साथ और गहराता चला गया। इस तीव्र गिरावट के कारण सेंसेक्स 1,200 अंक से अधिक का गोता लगाकर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 23,100 के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे फिसल गया। इस बिकवाली की सबसे खास बात यह रही कि यह गिरावट किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि लगभग हर प्रमुख सेक्टर में लाल निशान के साथ समाप्ति देखी गई।
कारोबार समाप्त होने पर 24 सितंबर को सेंसेक्स 1,247.71 अंक अथवा 1.67% का बड़ा नुकसान उठाकर 73,580.54 के स्तर पर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी भी 383.70 अंक या 1.64% टूटकर 23,063.10 के स्तर पर आ गया। बाजार की चौड़ाई काफी कमजोर रही, जहां करीब 1,400 शेयरों में बढ़त दर्ज की गई, जबकि 2,772 शेयरों में गिरावट देखने को मिली। व्यक्तिगत शेयरों की बात करें तो निफ्टी बास्केट में बजाज फाइनेंस, एचडीएफसी लाइफ, बजाज फिनसर्व, एक्सिस बैंक और इंटरग्लोब एविएशन सबसे ज्यादा टूटने वाले शेयरों की सूची में शीर्ष पर रहे। इसके विपरीत, इस तेज बिकवाली के बीच केवल सिप्ला और एनटीपीसी ही हरे निशान में टिकने और बढ़त हासिल करने में कामयाब रहे।
चौतरफा दबाव में रहे सभी सेक्टोरल इंडेक्स
बाजार में बिकवाली का दायरा इतना व्यापक था कि हर प्रमुख सेक्टोरल इंडेक्स नुकसान के साथ बंद हुआ। सबसे ज्यादा मार वित्तीय और बैंकिंग शेयरों पर पड़ी, जिसके चलते निफ्टी प्राइवेट बैंक इंडेक्स में 2.2% की गिरावट दर्ज की गई। मेटल इंडेक्स में 1.9% और निफ्टी बैंक में 1.7% की कमजोरी देखी गई। इसके अलावा ऑटो और इंफ्रास्ट्रक्चर इंडेक्स 1.5% टूटे, जबकि ऑयल एंड गैस इंडेक्स में 1.3% की गिरावट रही। व्यापक बाजार में भी निवेशकों की धारणा कमजोर बनी रही, जिसके कारण मिडकैप इंडेक्स लगभग 2% और स्मॉलकैप इंडेक्स 1.5% नीचे लुढ़ककर बंद हुए।
गिरावट के पीछे रहे तीन प्रमुख कारण
बाजार में इस तेज गिरावट के पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरे कई नकारात्मक कारक जिम्मेदार रहे। सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी बॉन्ड बाजार में यील्ड की तेज बढ़ोतरी से पैदा हुई। अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 2007 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, जबकि 2 साल की ट्रेजरी यील्ड भी 4.9% के स्तर को पार कर गई। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों के लिए बॉन्ड और डेट इंस्ट्रूमेंट्स ज्यादा सुरक्षित और आकर्षक विकल्प बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में संस्थागत निवेशक इक्विटी जैसे जोखिम भरे एसेट्स से पूंजी निकालकर स्थिर आय वाले विकल्पों में स्थानांतरित करने लगते हैं, जिससे शेयर बाजार पर बिकवाली का गहरा दबाव बन जाता है।
दूसरा प्रमुख कारण मौद्रिक नीति को लेकर बढ़ती अनिश्चितता रहा। अमेरिका से आए मजबूत आर्थिक आंकड़ों के बाद बाजार में यह आशंका तेज हो गई कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व आने वाले समय में ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपना सकता है। दरों में लंबे समय तक सख्ती बने रहने की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इक्विटी बाजारों को हिला दिया, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार की धारणा पर भी पड़ा।
तीसरा बड़ा दबाव ऊर्जा बाजार से आया, जहां कच्चे तेल की कीमतों में अचानक जोरदार तेजी देखी गई। ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 102 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी घटनाक्रमों ने आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल की ऊंची कीमतें घरेलू महंगाई और चालू खाता घाटे की चिंताएं बढ़ा देती हैं, जिससे निवेशकों का मनोबल कमजोर हुआ।



















