अंतरराष्ट्रीय मंच पर मध्य पूर्व का तनाव एक नए मोड़ पर पहुंच गया है, जहां डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य कार्रवाइयों को अस्थायी रूप से रोककर कूटनीतिक बातचीत का मार्ग प्रशस्त किया है। डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ईरान के साथ एक नए समझौते तक पहुंचने की संभावनाएं पूरी तरह से खुली हुई हैं और इस दिशा में बातचीत की प्रक्रिया जारी है। उनका कहना है कि कूटनीतिक आम सहमति बनाने के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध है, हालांकि भविष्य के परिणाम ही अंतिम दिशा तय करेंगे। सैन्य हमलों पर यह अस्थायी रोक क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
मध्य पूर्व का भू-राजनीतिक परिदृश्य और कूटनीतिक रुख
ईरान के साथ जारी बातचीत के संदर्भ में यह निर्णय लिया गया है कि सैन्य विकल्पों को फिलहाल रोककर कूटनीति को प्राथमिकता दी जाए। हालांकि, यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि यदि कूटनीतिक वार्ता किसी तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचने में विफल रहती है, तो व्यापक सैन्य अभियानों के रास्ते बंद नहीं हुए हैं। इस नीतिगत निर्णय का मुख्य उद्देश्य ईरान को बातचीत की मेज पर लाना है, जबकि रणनीतिक दबाव को बनाए रखा गया है।
इसके साथ ही, डोनाल्ड ट्रंप ने यह भी उल्लेख किया कि यदि हूती विद्रोहियों से जुड़ी समस्याएं और बढ़ती हैं, तो उसमें अमेरिका की भागीदारी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वहीं दूसरी ओर, उन्होंने इस बात की भी पुष्टि की कि फिलहाल सऊदी अरब के साथ प्रसिद्ध 'अब्राहम एकोर्ड्स' (Abraham Accords) को लेकर कोई नई चर्चा नहीं हुई है। इस भू-राजनीतिक घटनाक्रम ने वैश्विक बाजार में एक महत्वपूर्ण हलचल पैदा की है, जिससे निवेशकों की धारणा सीधे तौर पर प्रभावित हुई है।
बाजार की अवधारणाएं: रिस्क-ऑन और रिस्क-ऑफ का अर्थ
वित्तीय बाजार की शब्दावली में 'रिस्क-ऑन' (risk-on) और 'रिस्क-ऑफ' (risk-off) दो प्रमुख स्थितियां होती हैं, जो यह दर्शाती हैं कि किसी विशेष समय अवधि के दौरान निवेशक कितना जोखिम उठाने के लिए तैयार हैं। जब बाजार में रिस्क-ऑन का माहौल होता है, तो निवेशक भविष्य को लेकर बेहद आशावादी होते हैं। ऐसे समय में वे उच्च रिटर्न देने वाले लेकिन अधिक जोखिम वाले एसेट्स की ओर आकर्षित होते हैं।
इसके विपरीत, जब बाजार में रिस्क-ऑफ की स्थिति उत्पन्न होती है, तो निवेशक अनिश्चितता और जोखिम से बचने के लिए 'सुरक्षित संपत्तियों' (safe-haven assets) का सहारा लेते हैं। इस दौरान वे ऐसी संपत्तियों को तरजीह देते हैं, जहां भले ही रिटर्न सीमित हो, लेकिन पूंजी की सुरक्षा की गारंटी अधिक होती है।
विभिन्न संपत्तियों पर बाजार की धारणा का प्रभाव
जब वित्तीय बाजारों में रिस्क-ऑन की लहर चलती है, तो शेयर बाजारों में तेजी आती है। इस दौरान सोने को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख कमोडिटीज के भाव बढ़ते हैं, क्योंकि सकारात्मक आर्थिक विकास के कारण कच्चे माल की मांग में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जाता है। कमोडिटी का बड़े पैमाने पर निर्यात करने वाले देशों की मुद्राएं मजबूत होती हैं और क्रिप्टोकरेंसी में भी उछाल देखा जाता है।
वहीं दूसरी ओर, रिस्क-ऑफ की स्थिति में परिदृश्य बिल्कुल उल्टा हो जाता है। इस माहौल में बांड्स, विशेष रूप से प्रमुख सरकारों द्वारा जारी किए गए बांड्स के दाम बढ़ते हैं। सोने की कीमतों में चमक आ जाती है और अमेरिकी डॉलर (USD), जापानी येन (JPY) तथा स्विस फ्रैंक (CHF) जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली मुद्राओं की मांग काफी बढ़ जाती है।
निर्यात आधारित मुद्राओं पर असर
ऑस्ट्रेलियन डॉलर (AUD), कैनेडियन डॉलर (CAD), न्यूजीलैंड डॉलर (NZD) के साथ-साथ रशियन रूबल (RUB) और दक्षिण अफ़्रीकी रैंड (ZAR) जैसी छोटी विदेशी मुद्राएं रिस्क-ऑन के माहौल में मजबूत प्रदर्शन करती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि इन देशों की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक वृद्धि के लिए कमोडिटी निर्यात पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
जब वैश्विक आर्थिक गतिविधियों में तेजी की उम्मीद होती है, तो कच्चे माल की मांग बढ़ती है। इसी मांग के चलते कमोडिटी की कीमतें ऊपर जाती हैं, जिससे इन निर्यातक देशों की मुद्राओं को सीधा समर्थन मिलता है और निवेशकों का भरोसा बढ़ता है।
सुरक्षित संपत्तियों के रूप में अमेरिकी डॉलर, येन और स्विस फ्रैंक
रिस्क-ऑफ की स्थिति में दुनिया की तीन प्रमुख मुद्राएं सुरक्षित ठिकाने के रूप में उभरती हैं
- अमेरिकी डॉलर (USD): यह विश्व की प्राथमिक रिजर्व करेंसी है। संकट के समय निवेशक अमेरिकी सरकारी कर्ज (US Treasuries) में निवेश करते हैं, क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के कारण इसके डिफॉल्ट होने की संभावना न के बराबर मानी जाती है।
- जापानी येन (JPY): जापानी सरकारी बांड्स की भारी मांग के कारण येन मजबूत होता है। इन बांड्स का बड़ा हिस्सा जापान के घरेलू निवेशकों के पास होता है, जो किसी भी संकट के समय इन्हें आसानी से नहीं बेचते।
- स्विस फ्रैंक (CHF): स्विट्जरलैंड के सख्त बैंकिंग कानून और मजबूत वित्तीय नीतियां निवेशकों की पूंजी को बेहतरीन सुरक्षा प्रदान करती हैं, जिससे तनाव के समय स्विस फ्रैंक की मांग बढ़ जाती है।
फॉरेक्स मार्केट में ताजा हलचल: GBP/USD और EUR/USD का हाल
मध्य पूर्व में तनाव कम होने और कच्चे तेल की गिरती कीमतों के बीच वैश्विक फॉरेक्स मार्केट में कई महत्वपूर्ण बदलाव देखे गए हैं। GBP/USD की जोड़ी पिछले सप्ताह के अपने शुरुआती सुधार को गंवाते हुए 1.3300 के महत्वपूर्ण स्तर से नीचे आ गई और नए बहु-सप्ताह के निचले स्तर को छू लिया। मध्य पूर्व संघर्ष में रुकावट के बाद कच्चे तेल की घटती कीमतों और ब्रिटेन में मुद्रास्फीति के सुस्त आंकड़ों ने बैंक ऑफ इंग्लैंड (BoE) की आगामी मौद्रिक नीति बैठक से पहले ब्रिटिश पाउंड पर दबाव बना दिया है।
इसी तरह, EUR/USD की जोड़ी 1.1400 के स्तर से ऊपर जाने के बाद अपनी बढ़त को बरकरार नहीं रख सकी और 1.1370 के क्षेत्र की ओर फिसल गई। इसके बावजूद, अमेरिकी डॉलर में देखे गए अनिश्चित उतार-चढ़ाव के बीच यह जोड़ी दो दिनों से जारी गिरावट को रोकने में सफल रही। बाजार प्रतिभागी अब मध्य पूर्व के घटनाक्रमों पर करीब से नजर बनाए हुए हैं और कॉन्फ्रेंस बोर्ड द्वारा जारी किए जाने वाले अमेरिका के कंज्यूमर कॉन्फिडेंस आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं।



















